राजस्थान में 1913 में ही विधान सभा का हो गया था गठन

राजस्थान में 1913 में ही विधान सभा का हो गया था गठन

नई दिल्ली. राजस्थान के सिंहासन के लिए रणभेरी बज चुकी है. सत्ता हासिल करने के लिए राजनीति के योद्धा मैदान में आ डटे हैं लेकिन यहां पर जीत-हार का फैसला तो 7 दिसंबर के चुनाव के बाद 11 दिसंबर के दिन पता चलेगा. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि राजस्थान में लोकतंत्र की जड़ें आजादी के पहले ही स्थापित हो गईं थीं. राजस्थान विधान सभा भले ही मार्च, 1952 में अस्तित्व में आई थी लेकिन राजस्थान की जनता ने रियासत काल में ही संसदीय लोकतंत्र का अनुभव कर लिया था. बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह एक ऐसे ही प्रगतिशील शासक थे जिन्होंने बीकानेर की जनता को वर्ष 1913 में विधान सभा का उपहार दिया था.

राजस्थान विधानसभा की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार राजस्थान जिसे पूर्व में राजपूताना के नाम से जाना जाता था, में जन-प्रतिनिधि सभा की स्थापना राजपूताना में बाईस छोटी और बड़ी रियासतें थीं. यद्यपि 15 अगस्त, 1947 को ही समस्त रियासतें भारतीय संघ से संबंधित घोषित हो चुकी थीं किन्तु समस्त रियासतों के भारत में विलय और इनके एकीकरण की प्रक्रिया पांच चरण में वर्ष 1947 के माह अप्रेल तक पूरी हुई.

विलय के प्रथम चरण में मत्स्य संघ का निर्माण अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली को मिलाकर किया गया और इसका उद्घाटन 17 मार्च, 1948 को किया गया. शोभाराम के नेतृत्व में संघ का मंत्रिमंडल गठित किया गया. राजस्थान संघ का उद्घाटन 25 मार्च, 1948 को हुआ जिसमें बांसवाड़ा, बूंदी, डूंगरपुर, झालावाड़, किशनगढ़, प्रतापगढ़, शाहपुरा, टोंक, कोटा सम्मिलित थे. कोटा को इस संघ की राजधानी होने का सौभाग्य मिला. कोटा नरेश को राजप्रमुख पद पर व गोकुल लाल असावा को मुख्यमंत्री पद पर आसीन किया गया. किन्तु इस उद्घाटन के तीन दिन बाद ही उदयपुर महाराणा ने संघ में सम्मिलित होने का निर्णय लिया. जिसे भारत सरकार ने सहर्ष स्वीकार कर लिया.

उदयपुर महाराणा को इस राजस्थान संघ का राजप्रमुख व कोटा नरेश को उप राजप्रमुख बनाया गया व माणिक्यलाल वर्मा के नेतृत्व में मंत्रिमंडल का गठन किया गया. इस संघ का उद्घाटन पं. जवाहरलाल नेहरू ने 18 अप्रेल, 1948 को किया. राजस्थान संघ की स्थापना के साथ ही बीकानेर, जैसलमेर, जयपुर और जोधपुर जैसी बड़ी रियासतों के संघ में विलय और वृहत्तर राजस्थान के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया था. 30 मार्च, 1949 को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इसका विधिवत् उद्घाटन किया. जयपुर महाराजा को राज प्रमुख, कोटा नरेश को उप राजप्रमुख के पद का भार सौंपा गया और हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व में मंत्रिमंडल बनाया गया. मत्स्य संघ का वृहत्तर राजस्थान में 15 मई, 1949 को विलय किया गया.

राजस्थान निर्माण के अंतिम चरण में ही विधान परिषद की स्थापना की प्रक्रिया आरम्भ हो गई थी. यह प्रक्रिया वर्ष 1952 के आरम्भ तक चलती रही. इसी दौरान हीरालाल शास्त्री ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और 26 अप्रेल, 1951 को अंतरिम सरकार का गठन किया गया.

बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह का अहम योगदान

बीकानेर के महाराजा, गंगा सिंह ने 1913 में विधान सभा का गठन किया. वर्ष 1937 में विधान सभा की स्थापना के दौरान इसमें कुछ सुधार किए गए. सदन के सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 51 कर दी गई जिसमें से 26 सदस्य चुने जाने थे और 25 को नामित किया जाना था. 26 सदस्यों में से 3 सदस्य ताजीमी सरदारों द्वारा चुने जाने थे, 10 सदस्य राज्य जिला बोर्डो द्वारा चुने जाने थे, 12 सदस्य नगरपालिकाओं द्वारा चुने जाने थे और एक सदस्य व्यापार तथा उद्योगपतियों द्वारा चुना जाना था. वर्ष 1942 में ये परिवर्तन लागू किए गए.

वर्ष 1947 के बीकानेर अधिनियम संख्या 3 में विधान मंडल, जिसमें राज सभा और धारा सभा शामिल थे, का प्रावधान किया गया था. राज सभा व धारा सभा के चुनाव के लिये 28 सितम्बर, 1948 का दिन निश्चित किया गया किन्तु बीकानेर प्रजा मंडल द्वारा दिनांक 8 अगस्त, 1948 को चुनाव का बहिष्कार करने का निर्णय लिये जाने के कारण बीकानेर अधिनियम संख्या 3, वर्ष 1947 का प्रवर्तन व इसके अध्यधीन राज सभा व धारा सभा का गठन स्थगित कर दिया गया.

राज्य की जनता में राजनीतिक जागृति आने के बावजूद जोधपुर के महारा उम्मेद सिंह ने 1940 के दशक में ही प्रशासन में जनता की भागीदारी को स्वीकार करते हुए केन्द्रीय और जिला सलाहकार बोर्डों की स्थापना की मंजूरी दे दी.

उन्नीसवीं शताब्दी के पांचवें दशक के दौरान महाराजा रामसिंह द्वारा राजनीतिक, सामाजिक और शिक्षा के क्षेत्रों में किए गए कार्यों को देखते हुए जयपुर राज्य को एक प्रगतिशील राज्य माना जाने लगा था. देश के अन्य भागों में चल रही राजनीतिक गतिविधियों का इस राज्य की जनता पर इतना गहन प्रभाव था कि सरकारी और गैर-सरकारी सदस्यों वाली विधान समिति (1923) के गठन से भी उनकी अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं हुई.

जनहित और लोक महत्व के मामलों पर जन-प्रतिनिधियों के माध्यम से जनमत मालूम करने के उद्देश्य से महाराजा मानसिंह ने 1939 में केन्द्रीय सलाहकार मंडल का गठन किया. इसमें 13 मनोनीत और 35 गैर-सरकारी सदस्य रखे गये और इसको मुख्यत: चिकित्सा सुविधा, सफाई, सार्वजनिक निर्माण, सड़कों, कुओं व भवनों, जन शिक्षण, ग्रामीण उत्थान, विपणन, वाणिज्य तथा व्यापार आदि विषयों पर सलाह देने का अधिकार दिया गया. इसका उद्घाटन 18 मार्च, 1940 को हुआ.

1944 में ही विधान परिषद का हो गया था गठन

जयपुर शासन अधिनियम, 1944 के अनुसार 1 जून, 1944 को जन-प्रतिनिधि सभा और विधान परिषद का गठन किया गया. प्रतिनिधि सभा में 145 सदस्यों में से 120 निर्वाचित व पांच मनोनीत गैर-सरकारी सदस्य होने थे और विधान सभा के 51 सदस्यों में से 37 सदस्य निर्वाचित तथा 14 सदस्य मनोनीत किये जाने थे. इनका कार्यकाल तीन वर्ष निश्चित किया गया था. दोनों सभाओं का पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री को बनाया गया था और कार्यपालिका परिषद के वरिष्ठतम मंत्री को प्रतिनिधि सभा का उपाध्यक्ष और वरिष्ठ मंत्री को विधान परिषद का उपाध्यक्ष होना था. इनका निर्वाचन संयुक्त मतदाता सूची के आधार पर होना था. मुसलमानों के लिये भी स्थान सुरक्षित रखे गये थे. यह अनिवार्य था कि चुनाव में भाग लेने वाला उम्मीदवार स्वयं भी मतदाता हो. उसमें, आयु, शिक्षा और नागरिकता संबंधी आवश्यक योग्यताएं हों. विधायकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी और वे सदन की बैठकों को दौरान गिरफ्तार नहीं किया जा सकते थे.

विधान परिषद को प्रश्न पूछने, प्रस्ताव स्वीकार करने और अधिक स्थगन प्रस्ताव प्रस्तुत करने और कानून बनाने के अधिकार थे. इसे बजट पर चर्चा करने और मत देने का अधिकार दिया गया था. किन्तु इसे महाराजा व रियासत की सेना के संबंध में कानून बनाने की शक्ति नहीं थी.

उदयपुर में बदलती राजनैतिक परिस्थिति के दबाव के अन्तर्गत मई, 1946 में गोपाल सिंह की अध्यक्षता में एक सुधार समिति का गठन किया गया. इस समिति में प्रजा मंडल के पांच प्रतिनिधियों सहित सभी सरकारी और गैर-सरकारी सदस्य थे. समिति ने 29 सितम्बर, 1946 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की. इस रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई थी कि मेवाड़ के लिये संविधान तैयार करने के लिये एक संविधान सभा का गठन किया जाये और इस संविधान सभा में 50 सदस्य होंगे और प्रत्येक सदस्य का चुनाव 15 हजार मतदाता वाले निर्वाचन क्षेत्र से होगा.

चेयरमैन पद का पदभार स्वयं महाराणा ग्रहण करेंगे और वाईस-चेयरमैन का चुनाव सदस्यों द्वारा किया जायेगा. सन् 1946 में गठित सुधार समिति ने महाराणा को यह भी सिफारिश की थी कि मेवाड़ में एक जिम्मेदार सरकार की स्थापना की जाये और महाराणा अपनी शक्तियां उस सरकार को सौंप दे. लेकिन महाराणा ने यह सिफारिश स्वीकार नहीं की.

इसके बाद महाराणा को अक्टूबर, 1946 में एक कार्यकारी परिषद की स्थापना के लिये सहमत होना पड़ा जिसमें उन्होंने मोहन लाल सुखाड़िया और हीरालाल कोठारी को प्रजामंडल के प्रतिनिधियों के रूप में और रघुबीर सिंह को क्षेत्रीय परिषद के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया. इसके अतिरिक्त महाराणा ने संवैधानिक सुधार तीव्रगति से लागू करने की घोषणा की. वायदे के अनुसार महाराणा ने 16 फरवरी, 1946 को विधान सभा के गठन का वायदा किया.

महाराणा भूपाल सिंह ने 3 मार्च, 1947 को कुछ सुधारों की घोषणा की. इन सुधारों की रूपरेखा के अनुसार 46 निर्वाचित तथा कुछ गैर-सरकारी सदस्यों की विधान सभा गठित की गई थी. विधान सभा को उन सभी विषयों पर कानून बनाने का अधिकार दिया गया था जो विशेषतया इसके अधिकार क्षेत्र से बाहर न रखे गये हों. कुछ प्रतिबन्धों के साथ विधान सभा को बजट पर वाद-विवाद करने तथा मतदान का अधिकार दिया गया था. विधान सभा द्वारा लिये गये निर्णयों को लागू करने की जिम्मेदारी मंत्रियों को सौंपी गई थी.

18 अक्टूबर, 1943 को बूंदी के महाराजा ईश्वरसिंह ने धारा सभा की स्थापना की. इसमें कुल 23 सदस्य थे जिनमें 12 सदस्य निर्वाचित तथा 11 सदस्य मनोनीत थे.

राज्य के तहसील सलाहकार मंडलों तथा नगर परिषद के सदस्य सभा के सदस्यों का निर्वाचन करते थे. धारा सभा को सरकार से लोक हित विषयक प्रश्न करने तथा प्रस्ताव स्वीकृत करने का अधिकार था. समिति को कोई संवैधानिक तथा आर्थिक अधिकार नहीं थे. इसका दर्जा एक सलाहकार समिति से अधिक नहीं था.