मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया…

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया...

नई दिल्ली. गुलाम भारत में कराची के सेंट पैट्रिक्स स्कूल में पढ़ रहा एक छात्र आजादी के बाद भारत का एक बड़ा राजनेता बनने के साथ एक हिंदूवादी पार्टी के सबसे शीर्ष पर पहुंचेगा, यह किसी ने सोचा भी नहीं था. 8 नवंबर, 1927 को कराची के एक व्यवसायी हिंदू सिंधी परिवार में जन्म लेने वाला यह नेता आज अपना 91वां जन्मदिन मना रहे हैं. कुछ साल पहले तक देश में सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शख्स‍ियतों में शुमार लाल कृष्ण आडवाणी ने एक रेडियो इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि वह बाइचांस राजनीति में पहुंच गए, उनकी अधिक दिलचस्पी तो पुस्तकों और फ़िल्मों में थी. इस बातचीत में लाल कृष्ण आडवाणी ने बताया था कि ‘हम दोनों’ फिल्म के लिए जयदेव का गाया हुआ गाना ”मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया...” उन्हें बहुत पसंद है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ लाल कृष्ण आडवाणी

उपन्यास पढ़ने के शौकीन

लाल कृष्ण आडवाणी की किताबों और फिल्मों में बहुत दिलचस्पी रही है. उम्र के इस पड़ाव पर भी वह पढ़ना और फिल्म देखना पसंद करते हैं. उन्होंने अपने रेडियो इंटरव्यू में बताया था कि कि उनको 1942 से ही पुस्तकों को पढ़ने का शौक शुरू हो गया था, जब वह कॉलेज में आए भी नहीं थे.

उन्होंने बताया था कि 1942 के आंदोलन के कारण कॉलेज बंद रहता था और इस कारण पूरा का पूरा समय उनका लाइब्रेरी में बीतता था. उन्हीं दिनों मैंने कॉलेज लाइब्रेरी में जितने भी क्लासिक उपन्यास उपलब्ध थे, सब उन्होंने पढ़े. चार्ल्स डिकिंस की सब पुस्तकें, विक्टर हू गो की ‘द मिज़रेबल्स’ से लेकर बहुत सारे उपन्यास पढ़ डाले. यहाँ तक कि साइंस फ़िक्शन की ‘जूल्स वर्न’ के सारे सीरीज़ भी उन्होंने उन्हीं दिनों पढ़ी थी. इस इंटरव्यू में आडवाणी जी ने सभी गार्जियंस खासकर मां-बाप को सलाह दी थी कि लोग अपने बच्चों को उपन्यास पढ़ने से रोकें नहीं, क्योंकि उपन्यास पढ़ने से पुस्तक पढ़ने की आदत बनती है.

बचपन में अपने पिता किशनचंद आडवाणी और मां ज्ञानी देवी के साथ आडवाणी

‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इनफ्लूएंस पीपुल्स’ को अपनी जिंदगी में उतारा

लाल कृष्ण आडवाणी की जिंदगी पर पुस्तकों की गहरी छाप रही है. उन्होंने अपने रेडियो इंटरव्यू में बताया था कि जब मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक 14 वर्ष की उम्र में बना. उस समय सिंध के प्रांत प्रचारक राजपाल पुरी थे. उन्होंने मुझे डेल कारनेगी की ‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इनफ्लूएंस पीपुल्स’ दे दी. उस पुस्तक का मेरे ऊपर बहुत असर पड़ा. आडवाणी जी के अनुसार उनकी अपनी प्रकृति के कुछ पहलुओं को वह उससे रिलेट करते हैं. साथ ही तब से लेकर आज तक उन्हें लगता है कि किसी से बेकार बहस नहीं करनी चाहिए.

अमिताभ बच्चन के जबर्दस्त फैन

लाल कृष्ण आडवाणीको अमिताभ बच्चन के बड़े प्रशंसक हैं. उन्होंने अपने इंटरव्यू में बताया था कि फ़िल्म इंडस्ट्री में कई अच्छे कलाकार हैं लेकिन अमितभ बच्चन के अलावा इतने लंबे समय तक टॉप पर बने रहना किसी और के बस की बात है क्या ? उन्होंने बताया था कि उन्हें कोई दूसरा नहीं दिखाई देता जो अमिताभ के बराबर खड़ा हो सके. इसमें कोई संशय नहीं कि अमिताभ अपने आप में एक आयाम हैं. इस बातचीत में उन्होंने बताया था कि अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘ब्लैक’ काफी पसंद आई थी.

अपनी स्कूल की क्रिकेट टीम के साथ आडवाणी

क्रिकेट खेलने और देखने का था जुनून

लाल कृष्ण आडवाणीको क्रिकेट का भी काफी शौक रहा है. अपने रेडियो इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि जब वह करांची में स्कूल में पढ़ रहे थे, तब महत्वपूर्ण मैच देखने के लिए स्कूल से भाग जाते थे. साथ ही उन्होंने बताया था कि चह सचिन तेंदुलकर के बहुत बड़े प्रशंसक हैं.

अटल जी के भाषणों को लेकर थी हीन भावना

लाल कृष्ण आडवाणीने अपनी इस बातचीत में बताया था कि उन्हें इस बात का मलाला रहा कि वह अटल बिहारी वाजपेयी के जैसा भाषण नहीं सकते. उन्होंने अटल जी के साथ अनले संबंधों के बारे में चर्चा करते बताया था कि अटल जी वो शख्स हैं जिनसे मुझे शुरुआत से ही एक तरह का कॉम्पलेक्स रहा है. अपने भाषणों से अटल जी जिस प्रकार से लाखों लोगों को मंत्र मुग्ध करके रखते थे, मेरे मन में एक कम्प्लेक्स डेवलप (हीन भावना पैदा) हुआ. मुझे लगा कि मैं भी राजनीति में हूँ पर राजनीति में व्याख्यान देना एक महत्वपूर्ण गुण है जो मुझे मेरे बस की बात नहीं लगती थी.

लाल कृष्ण आडवाणी ने इस रेडियो इंटरव्यू में बताया था कि पहली लोकसभा में वह बतौर पत्रकार लोकसभा कवर कर रहे थे. उस लोकसभा में दो आउटस्टैंडिंग अंग्रेज़ी के वक्ता थे- एक श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दूसरे हिरेन मुखर्जी. दूसरी लोकसभा में दो हिंदी के आउटस्टैंडिंग वक्ता रहे- एक अटल बिहारी वाजपेयी और दूसरे प्रकाश वीर शास्त्री.

ऐसी है लाल कृष्ण आडवाणी की जिंदगी

आठ नवंबर, 1927 को वर्तमान पाकिस्तान के कराची में लाल कृष्ण आडवाणी का जन्म हुआ था. पिता का नाम था किशनचंद आडवाणी और माँ का नाम ज्ञानी देवी आडवाणी था. विभाजन के बाद भारत आ गए आडवाणी ने 25 फ़रवरी, 1965 को कमला आडवाणी को अपने पारिवारिक जीवन का हमसफ़र बनाया. आडवाणी के दो बच्चे हैं. लालकृष्ण आडवाणी की शुरुआती शिक्षा तो लाहौर में ही हुई पर बाद में भारत आकर उन्होंने मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से लॉ में स्नातक किया.

वर्ष 1951 में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की. तब से लेकर 1957 तक आडवाणी पार्टी के सचिव रहे. वर्ष 1973 से 1977 तक आडवाणी ने भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष का दायित्व संभाला. वर्ष 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद से 1986 तक लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के महासचिव रहे. इसके बाद 1986 से 1991 तक पार्टी के अध्यक्ष पद का ज़िम्मा भी उन्होंने संभाला. इसी दौरान वर्ष 1990 में राममंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा निकाली. हालांकि आडवाणी को बीच में ही गिरफ़्तार कर लिया गया पर इस यात्रा के बाद आडवाणी का राजनीतिक कद और बड़ा हो गया.

पत्नी कमला आडवाणी और बेटी प्रतिभा आडवाणी के साथ होली खेलते आडवाणी

1990 की रथयात्रा ने लाल कृष्ण आडवाणी की लोकप्रियता को चरम पर पहुंचा दिया था. वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जिन लोगों को अभियुक्त बनाया गया है उनमें आडवाणी का नाम भी शामिल है. लालकृष्ण आडवाणी तीन बार भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद पर रह चुके हैं.

लाल कृष्ण आडवाणी चार बार राज्यसभा के और छह बार लोकसभा के सदस्य रहे. वर्तमान में भी वो गुजरात के गांधीनगर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के सांसद हैं. वर्ष 1977 से 1979 तक पहली बार केंद्रीय सरकार में कैबिनेट मंत्री की हैसियत से लालकृष्ण आडवाणी ने दायित्व संभाला. आडवाणी इस दौरान सूचना प्रसारण मंत्री रहे. आडवाणी ने अभी तक के राजनीतिक जीवन में सत्ता का जो सर्वोच्च पद संभाला है वह है एनडीए शासनकाल के दौरान उप प्रधानमंत्री का.

लाल कृष्ण आडवाणी वर्ष 1999 में एनडीए की सरकार बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेत़ृत्व में केंद्रीय गृहमंत्री बने और फिर इसी सरकार में उन्हें 29 जून, 2002 को उप प्रधानमंत्री पद का दायित्व भी सौंपा गया. भारतीय संसद में एक अच्छे सांसद के रूप में आडवाणी अपनी भूमिका के लिए कभी सराहे गए तो कभी पुरस्कृत भी किए गए.