“झारखंड में किसान भाई अब धान की रोपाई नहीं, रक्षा करें”

रांची. मानसून की देरी की वजह से झारखंड में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस बार 68 प्रतिशत धान की ही रोपाई हो पाई है. ऐसे में अगस्त महीने में होने वाली बारिश पर ही धान की खेती अब निर्भर है. क्योंकि धान की अच्छी पैदावार के लिए अच्छी बारिश का होना बेहद जरुरी है. झारखंड में मानसून जून महीने से अक्टूबर तक रहता है लेकिन इस बार मानसून का आगाज जून के पहले सप्ताह के बजाय अंतिम सप्ताह में हुआ. जिसकी वजह से धान की रोपाई सही तरीके से नहीं हो पाई.

झारखंड में प्रतिवर्ष धान की रोपाई का लक्ष्य 18 लाख हेक्टेयर होता है लेकिन मानसून की देरी की वजह से राज्य अपने लक्ष्य से पीछे है. अब तक 60 से 65 प्रतिशत ही धान की रोपाई हो पाई है. अब अगस्त के अच्छी बारिश पर ही बची हुई धान की रोपाई निर्भर करेगी. अगर बारिश अच्छी होती है तो पैदावार भी अच्छी होगी. हालांकि जितनी भी रोपाई हुई है उसे कीड़े से बचना सबसे ज्यादा जरूरी है. इसलिए अब रोपाई का काम करना सही नहीं होगा. ऐसे में कृषि वैज्ञानिक किसानों को सलाह दे रहे हैं कि इस समय कीड़े लगने का ज्यादा खतरा रहता है. इसलिए सही दवाई का छिड़काव करें और फसल को बचाएं.

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बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञ असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. परवेज ने बताया कि इस वर्ष मानसून देर से आया है और बारिश समय से नहीं हुई. जिसकी वजह से धान की खेती 25-30 प्रतिशत कम हुई है. उन्होंने कहा कि अब किसानों के लिए धान की निराई का समय आ गया है, मतलब धान के पौधे अब थोड़े बड़े हो गए हैं उसमें बाली आने का समय हो गया है. ऐसे में अब धान लगाने के बारे में सोचना सही नहीं होगा.

उन्होंने कहा कि अगर धान की रोपाई का 20-25 दिन हो गया हो तो खेतों से खरपतवार को निकालने के बाद यूरिया का टॉप ड्रॉपिंग करने की जरूरत है. डॉ. परवेज ने कहा इस समय धान में वर्णा छेदक नामक कीड़ा लगने का सबसे ज्यादा खतरा रहता है. इसके लिए किसानों को धान में दानेदार क्रोफियुरण दवा का छिड़काव चार किलो प्रति एकड़ के हिसाब से करना चाहिए, ताकि फसल को बचाया जा सके.