हिमाचल में शासन-प्रशासन की नाकामी का परिचायक है ‘लुथर दत्त’

मंडी. मुसीबत क्या होती है अगर ये जानना है तो लुथर दत्त से पूछिये - Panchayat Times
लुथर दत्त

मंडी. मुसीबत क्या होती है अगर ये जानना है तो लुथर दत्त से पूछिये. इनसे पूछिये कि भाई तुम इस पहाड़ जैसी जिंदगी को कैसे काट रहे हो. आखिर तुम्हें क्या गम है. पर न तो वो बता पाएगा. न ही शायद आप समझ पाएंगे. क्यों कि न तो लुथर कुछ सुन सकता है न जुबां से कुछ बयां कर पाता है. जन्म से ही इन कमियों के साथ दुनिया में आया है.

मुसीबत का सबब यहीं नहीं थमा है. पहाड़ में पत्थर तोड़ते हुए एक आंख ने भी साथ छोड़ दिया है. विकलांगता की हर श्रेणी में आने के बावजूद हिमाचल प्रदेश की सरकार और ये फेल सिस्टम इसे विकलांगता भत्ता देने को तैयार नहीं है. इस मामले को सिस्टम से लड़ते हुए शिमला हाई कोर्ट तक पहुंचाने वाले का नाम लेना भी जरूरी है. लुथर जिला मंडी के बल्ह तहसील में कैहड़ पंचायत का रहने वाला है. इस पंचायत के उप-प्रधान देशमित्र के ही भरसक प्रयासों का नतीजा है कि अब हाईकोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए संबंधित विभाग से जवाब-तलब किया है.

मंडी. मुसीबत क्या होती है अगर ये जानना है तो लुथर दत्त से पूछिये - Panchayat Times
उप-प्रधान देशमित्र, कैहड़

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कई सालों के अथक प्रयासों के बावजूद विकलांगता भत्ता नहीं मिल पाया है. लुथर दत्त के पास एक बुढ़ी मां है, जिसे टीबी की बीमारी है. वो फिलहाल अपने भाई के पास रहता है. उम्र 47 पार हो चुकी है, पर जिंदगी में सहारा कुछ नहीं है. अगर इसे विकलांगता भत्ता मिलने लगता है तो जिंदगी में कम से कम अपना पेट तो पाला ही जा सकता है. उप-प्रधान ने इस मामले को पंचायत स्तर से लेकर हिमाचल हाईकोर्ट तक पहुंचा दिया. पर सिस्टम तो अपनी रफ्तार से ही चलता है.

किसी को विकलांगता भत्ता देने से पहले नियम है कि उसका मेडिकल प्रमाणपत्र बना होना चाहिए. और ये टेस्ट केवल शिमला आईजीएमसी और टांडा मेडिकल कॉलेज, कांगड़ा में ही होती है. दोनों अस्पतालों ने कई साल तक चक्कर कटवाया पर टेस्ट नहीं किया. जी हां ये है हिमाचल प्रदेश का प्रशासनिक रवैया. उप प्रधान ने इस पूरे घटना क्रम को सिलसिलेवार ढ़ंग से लिखा है, उसे आप सबको जरूर पढ़ना चाहिए.