मनरेगा भाग 1: मानव इतिहास का सबसे विशाल रोजगार कार्यक्रम

मनरेगा भाग 1: मानव इतिहास का सबसे विशाल रोजगार कार्यक्रम - Panchayat Times

नई दिल्ली/रांची. 7 सितंबर, 2005 को लागू हुई महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) 2005 ने मानव इतिहास में सबसे विशाल रोजगार कार्यक्रम को सफल बनाया है. यह अपनी व्यापकता, संरचना और उद्देश्य में किसी अन्य मजदूरी रोजगार कार्यक्रम से अलग है. इसकी नीचे से ऊपर, जन-केंद्रित, मांग आधारित, स्व-चयनित, अधिकार आधारित डिजाइन विशिष्ट और अद्वितीय है.

क्या है इतिहास

इस अधिनियम को 2 फरवरी, 2006 से पहले चरण में 200 जिलों में अधिसूचित किया गया था, और बाद में वित्त वर्ष 2007-2008, में इसे और 130 जिले में लागू किया गया (113 जिले 1 अप्रैल, 2007 से अधिसूचित किए गए और उत्तर प्रदेश में 17 जिले 15 मई, 2007 से अधिसूचित किए गए थे). मनरेगा के अंतर्गत शेष बचे जिलों की अधिसूचना 1 अप्रैल, 2008 को जारी की गई थी. इस प्रकार, मनरेगा संपूर्ण देश में लागू है. इसमें उन जिलों को छोड़ दिया गया है जहां शत-प्रतिशत शहरी आबादी है.

न्यूनतम साधनों से अपना गुजारा करते हैं ज्यादातर ग्रामीण

देश के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले ज्यादातर गरीब लोग अकुशल, दिहाड़ी, शारीरिक मजदूरी से मिलने वाली मजदूरी पर आश्रित रहते हैं. वे अकसर न्यूनतम साधनों से अपना गुजारा करते हैं और गहन गरीबी की निरंतर आशंका में जीते हैं. श्रम की अपर्याप्त मांग तथा प्राकृतिक आपदा अथवा बीमारी जैसे अनपेक्षित संकट, ये सभी उनके रोजगार अवसरों पर बहुत बुरा असर डालते हैं.

क्या है मनरेगा उद्देश्य

इस अधिनियम का उद्देश्य ऐसे प्रत्येक ग्रामीण परिवार जिनके वयस्क सदस्य अकुषल शारीरिक श्रमकार्य करना चाहते हैं, को एक वित्त वर्ष में कम से कम 100 दिनों का गारंटी युक्त मजदूरी रोजगार उपलब्ध कराना है.

क्या है मनरेगा के लक्ष्य

रोजगार के अवसर उपलब्ध कराके ग्रामीण भारत में रहने वाले सर्वाधिक लाभवंचित लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा. टिकाऊ स्वरूप की परिसंपत्तियों के सृजन, उन्नत जल सुरक्षा, मृदा संरक्षण और उच्च भूमि उत्पादकता के जरिए निधर्नों के लिए आजीविका सुरक्षा. ग्रामीण भारत में सूखा रोधन और बाढ़ नियंत्रण.

अधिकार आधारित कानूनी प्रक्रिया के जरिए सामाजिक रूप से लाभवंचित, विशेषकर महिलाओं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को अधिकार संपन्न बनाना. विभिन्न गरीबी उपशमन और आजीविका संबंधी पहलों में तालमेल के जरिए विकेंद्रीकृत, भागीदारी-पूर्ण नियोजन को सुदृढ़ करना.

पंचायती राज संस्थाओं को सुदृढ़ करके जमीनी स्तरों पर लोकतंत्र को मजबूत करना. शासन में बेहतर पारदर्शिता और जवाबदेही लाना. इस प्रकार, मनरेगा सामाजिक सुरक्षा, आजीविका सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारिता पर अपने प्रभाव के जरिए ग्रामीण भारत में समावेशी विकास सुनिश्चित करने का एक सशक्त माध्यम हो

विकसित और विकासशील देशों में गरीबी और बेरोजगारी से निपटने के लिए ऐसे रोजगार कार्यक्रम

विकसित और विकासशील देशों में गरीबी और बेरोजगारी से निपटने के लिए ऐसे रोजगार कार्यक्रम बहुत लंबे समय से काफी महत्वपूर्ण रहे हैं. इन कार्यक्रमों में सिंचाई, वृक्षारोपण, जल संरक्षण एवं सड़क निर्माण जैसी सार्वजनिक परियोजनाओं में सीमित अवधि के लिए अकुशल शारीरिक श्रम मुहैया कराया जाता है.

रोजगार कार्यक्रमों का औचित्य कुछ बुनियादी मान्यताओं पर आधारित है. इस तरह के कार्यक्रम संकट के समय गरीब परिवारों को आय का जरिया उपलब्ध कराते हैं और उन्हें उपभोग स्तर बनाए रखने में मदद देते हैं. ये कार्यक्रम उन दिनों या सालों में खासतौर से उपयोगी साबित होते हैं जब खेतिहर रोजगार कम होते हैं.

भारी बेरोजगारी वाले देशों में रोजगार कार्यक्रमों से मिलने वाले ये आय स्थानांतरण लाभ गरीबी को बढ़ने से रोकते हैं. इन कार्यक्रमों के कारण स्थाई संपदाओं का निर्माण होता है जिनके कारण दूसरे चक्र के रोजगार भी पैदा होने लगते हैं क्योंकि उनके लिए जरूरी बुनियादी ढांचा अस्तित्व में आ जाता है.