नई दिल्ली. Iran और Israel के बीच बढ़ते संघर्ष और इसमें United States की भूमिका का असर अब भारत तक महसूस किया जाने लगा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव से भारत की ऊर्जा आपूर्ति, खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों और कूटनीतिक संतुलन पर दबाव बढ़ सकता है।
तेल और गैस सप्लाई पर खतरा
भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग आधा हिस्सा Strait of Hormuz से होकर गुजरता है। यही मार्ग भारत के लिए एलएनजी और एलपीजी की बड़ी आपूर्ति का भी रास्ता है।
अगर इस अहम समुद्री मार्ग पर संघर्ष के कारण बाधा आती है तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति और ईंधन कीमतों पर सीधा असर पड़ सकता है।
खाड़ी देशों से आने वाली रेमिटेंस
पश्चिम एशिया के खाड़ी देशों में करीब 1 करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं। ये प्रवासी हर साल बड़ी मात्रा में पैसा भारत भेजते हैं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था और लाखों परिवारों की आय को सहारा मिलता है।
विश्लेषकों के अनुसार मध्य पूर्व क्षेत्र भारत के कुल रेमिटेंस का लगभग 38% प्रदान करता है। यदि क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो इन पैसों के प्रवाह पर भी असर पड़ सकता है।
व्यापार और आर्थिक संबंध
भारत के पश्चिम एशिया के साथ आर्थिक रिश्ते काफी मजबूत हैं। यह क्षेत्र भारत के 17% निर्यात का बाजार है और देश की 55% कच्चे तेल की जरूरत पूरी करता है। ऐसे में खाड़ी क्षेत्र में युद्ध या तनाव बढ़ने से भारत की अर्थव्यवस्था कई मोर्चों पर प्रभावित हो सकती है।
भारत की कूटनीतिक चुनौती
भारत को इस संकट में सावधानी से कदम बढ़ाने पड़ रहे हैं। विश्लेषकों का कहना है कि भारत के अरब देशों के साथ संबंध ऊर्जा, व्यापार और भारतीय प्रवासी समुदाय के कारण काफी गहरे हैं।
इसलिए नई दिल्ली को एक तरफ Iran और दूसरी तरफ Israel तथा अरब देशों के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।
रणनीतिक परियोजनाओं पर भी असर
तनाव बढ़ने की स्थिति में Iran में भारत की रणनीतिक परियोजनाओं, खासकर Chabahar Port पर भी असर पड़ सकता है। यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक व्यापार का महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है।
कुल मिलाकर, यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबा चलता है तो इसका असर भारत में तेल की कीमतों, रेमिटेंस, प्रवासी भारतीयों और कूटनीतिक रिश्तों पर दिखाई दे सकता है।
