मनरेगा एक बड़ी योजना लेकिन आड़े आ रही है बढ़ती वित्तीय चुनौतियां

मनरेगा: एक बड़ी योजना लेकिन आड़े आ रही है बढ़ती वित्तीय चुनौतियां - Panchayat Times

नई दिल्ली. मौजूदा आर्थिक मंदी ने खासतौर पर देश के ग्रामीण क्षेत्रों को प्रभावित किया है और रोजगार के अवसरों को काफी कम कर दिया है, जबकी इससे मनरेगा के तहत मिलने वाले काम की मांग अचानक बढ़ गई है, जिसके कारण राज्यों के समक्ष बजट की चुनौती उत्पन्न हो गई है.

बजट 2020-21

बजट 2020-21 में मनरेगा के लिए 61500 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है, जबकि 2019-20 में बजट का संशोधित अनुमान (आरई) 71001.81 करोड़ रुपए था. हालांकि बजट में असल अनुमान 60 हजार करोड़ रुपए का लगाया गया था. यानि कि संशोधित अनुमान के हिसाब से बात की जाए तो सरकार ने लगभग 10 हजार करोड़ रुपए (15 फीसदी) घटा दिया है.

वित्तीय विवरण में 15 राज्यों को लाल रंग

26 जनवरी को मनरेगा के वित्तीय विवरण में 15 राज्यों को लाल रंग के रूप में दिखाया गया है. एक प्रमुख अखबार (The Hindu) की रिपोर्ट में कहा गया है कि राजस्थान में 620 करोड़ रुपये का सबसे अधिक ऋणात्मक शुद्ध ऋण है जबकी उत्तर प्रदेश में 323 करोड़ रुपये का ऋणात्मक (Negative) ऋण है. योजना के लिए इस वर्ष का बजट आवंटन केवल 60,000 करोड़ रुपये था, जो पिछले वर्ष में खर्च की गई राशि से कम था.

अखबार के अनुसार, राजस्थान में, अक्टूबर के अंत से श्रमिकों के वेतन का भुगतान नहीं किया गया है. इस महीने की शुरुआत में, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मांग की थी कि केंद्र तुरंत 1,950 करोड़ रुपये का बकाया जारी करे.

मनरेगा से संबंधित बड़ी चुनौतियां

खराब मजदूरी दर

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के आधार पर मनरेगा की मजदूरी दर निर्धारित न करने के कारण मजदूरी दर काफी स्थिर हो गई है. वर्तमान में अधिकांश राज्यों में मनरेगा के तहत मिलने वाली मजदूरी न्यूनतम मजदूरी से काफी कम है. यह स्थिति कमजोर वर्गों को वैकल्पिक रोजगार तलाशने को विवश करता है.

भ्रष्टाचार


वर्ष 2012 में कर्नाटक में मनरेगा को लेकर एक घोटाला सामने आया था जिसमें तकरीबन 10 लाख फर्जी मनरेगा कार्ड बनाए गए थे, जिसके परिणामस्वरूप सरकार को तकरीबन 600 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था. भ्रष्टाचार मनरेगा से संबंधित एक बड़ी चुनौती है जिससे निपटना आवश्यक है. अधिकांशतः यह देखा जाता है कि इसके तहत आवंटित धन का अधिकतर हिस्सा मध्यस्थों के पास चला जाता है.

अपर्याप्त बजट आवंटन

पिछले कुछ वर्षों में मनरेगा के तहत आवंटित बजट काफी कम रहा है, जिसका प्रभाव मनरेगा में कार्यरत कर्मचारियों के वेतन पर देखने को मिलता है. वेतन में कमी का प्रत्यक्ष प्रभाव ग्रामीणों की शक्ति पर पड़ता है और वे अपनी मांग में कमी कर देते हैं.

मजदूरी भुगतान में देरी

एक अध्ययन में पता चला कि मनरेगा के तहत किये जाने वाले 78 प्रतिशत भुगतान समय पर नहीं किये जाते और 45 प्रतिशत भुगतानों में विलंबित भुगतानों के लिये दिशा-निर्देशों के अनुसार मुआवजा शामिल नहीं था, जो अर्जित मजदूरी का 0.05 प्रतिशत प्रतिदिन है. आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2017-18 में अदत्त मजदूरी 11,000 करोड़ रुपए थी.