‘नर्मदा नहर परियोजना’ क्या सुसाइड प्वाइंट बन गई है

नर्मदा नहर परियोजना के तहत जालौर जिले के कई -Panchayat Times
प्रतीक चित्र

जालोर. नर्मदा नहर परियोजना के तहत जालौर जिले के कई इलाकों में पेयजल और सिंचाई का पानी पहुंचा रही नर्मदा नहर अब सुसाइड प्वाइंट बनती जा रही है. गुजरे पांच वर्षों में हुई मौत की घटनाएं इस बात की गवाह हैं. मामले में प्रशासन उदासीन है. एक ही जगह पर बार-बार मौत की घटना के बावजूद यहां सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की जा रही है. पिछले पांच सालों में 100 से ज्यादा लोगों की नहर में डूबने से मौत हो चुकी है.

इतनी बड़ी संख्या में मौत होने के बावजूद प्रशासन ने अधिकारियों ने सुरक्षा को लेकर कोई कदम नहीं उठाए हैं. साथ ही नर्मदा नहर विभाग भी उदासीन है, उसके पास ना तो तैराक हैं और ना ही सुरक्षा के अन्य संसाधन उपलब्ध हैं, जिसके चलते लोग मौत के मुंह में जा रहे हैं. पिछले एक महीने में करीब 10 लोगों की नहर में डूबने से मौत हो चुकी है, जिनमें अधितकर के शव मिल चुके हैं. आए दिन नहरों में हो रही मौतों के चलते नर्मदा योजना चर्चा में हैं. स्थानीय प्रशासन और नर्मदा विभाग के पास में ऐसे संसाधन भी नहीं है कि नहर में गिरे व्यक्ति को आसानी से सुरक्षित निकाला जा सके.

2008 में पहली बार नर्मदा नहर में आया था पानी

नर्मदा नहर परियोजना का कार्य पूरा होने के बाद मार्च 2008 में सीलू गेट से नहर में पानी छोड़ा गया था. यह कार्य मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के कार्यकाल में किया गया था, लेकिन दस साल बाद भी यहां लोगों के लिए सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए गए हैं. सूचना के बावजूद नहर में गिरने वाले व्यक्तियों को खोजने में 3 से 7 दिन का समय लग जाता है. स्थानीय तैराक अपनी जान जोखिम में डाल कर नहर के पानी में शवों को खोज कर निकालते हैं. कुछ दिन पहले अगड़ावा गांव के पास एक विवाहिता नहर में कूद गई थी. जिसका शव खोजने में सात दिन का समय लग गया था. इन सात दिनों में नहर की वितरिका भरी थी. पानी को खाली करके शव को खोजा गया था. इसके बाद नहर के तल में जमी काई में फंसा शव मिला था.

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कुछ समय पहले सांचौर के तत्कालीन डीवाईएसपी सुनील के. पंवार ने मामले में पत्र लिखकर शासन को अवगत कराया था. पत्र में उन्होंने नहर के लिए सुरक्षा उपकरण की मांग की थी. पंवार ने वाटर विजन कैमरा, वाटर विजन टॉर्च, लाइफसेविंग जैकेट, फाइबर रस्से, हाईविजन टॉर्च, पानी में जगह-जगह लगाने के लिए जालियां, तलाशी के लिए कल्टी वैटर सिस्टम, प्रशिक्षित गोताखोर, मोटर नाव, वाटर गैज मीटर, एम्बुलेंस, पेट्रोलिंग वाहन, वाटर विजन चश्मे सहित अन्य संसाधनों उपलब्ध कराने की मांग की थी, लेकिन अभी तक कोई उपकरण स्थानीय प्रशासन को उपलब्ध नहीं हो सका है. नर्मदा मुख्य नहर के दोनों ओर सडक़ बनी होने से लोग शॉर्टकट के चक्कर में नहर के मार्ग से सीधे जाने का प्रयास करते हैं, लेकिन नहर व सडक़ के बीच कोई सुरक्षा दीवार नहीं होने से मोड़ पर कई बार वाहन नहर में गिर जाते हैं. क्षेत्र के लालपुर, अगार, पालड़ी, डेडवा, परावा, सिवाड़ा सहित आस- पास के इलाके में आए दिन वाहनों के नहर में गिरने के हादसे होते रहते हैं.

चौकाते हैं सांचौर और चितलवाना के आंकड़े

नहर सांचौर और चितलवाना उपखंड क्षेत्र से होकर गुजरती है. अकेले सांचौर उपखंड में पांच वर्षों में 54 लोगों की मौत हो चुकी है, जिसमें वर्ष 2013 में सात, वर्ष 2014 में 13, वर्ष 2015 में 14, वर्ष 2016 में 12, वर्ष 2017 में छह और 2018 में अब तक दो लोगों की मौत हो चुकी है. इसके अलावा चितलवाना क्षेत्र में भी करीबन 50 लोगों की नहर में डूबने से मौत हुई है. कुल मिलाकर पिछले 10 साल में मौतों का आंकड़ा 100 के पार पहुंच चुका है. सरकारी तैराक नहीं होने के चलते कई प्रशासन शव की खोजबीन में निजी तैराकों की सहायता लेता है. बिना प्रशिक्षण के निजी तैराक अपनी जान पर दांव लगाकर शव खोजने का काम करते हैं. सफलता नहीं मिलने पर प्रशासन को जोधपुर, थराद और धानेरा से तैराकों को बुलाना पड़ता है. हादसे के समय ग्रामीण स्वयं रस्से की व्यवस्था करते हैं.