गायब हो रहे कौवे, कैसे तरेंगे पितृ

नई दिल्ली. सोमवार से पितृ पक्ष शुरू हो गया, जो 8 अक्टूबर तक चलेगा. भारत में हिन्दू धर्म में श्राद्ध पक्ष के समय कौओं का विशेष महत्त्व है. प्रत्येक श्राद्ध के दौरान पितरों को खाना खिलाने के तौर पर सबसे पहले कौओं को खाना खिलाया जाता है. मान्यता है कि कौओं को खाना खिलाने से पितरों को खाना मिलता है लेकिन देश में कौओं की संख्या लगातार घट रही है. स्थिति यह है कि घर की मुंडेर पर बैठकर आगंतुक के आने की सूचना देने वाला काला कागा यानि कौआ अब मुंडेर पर बैठकर किसी मेहमान के आने की सूचना देने के लिए कांव-कांव नहीं करता.

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के 12 फीसदी पक्षी लुप्त होने की कगार पर हैं, इनमें कौआ प्रमुख है. आवासीय क्षेत्रों में घटते पेड़ों की तादाद से इन्हें काफी परेशानी हो रही है. कौवे ज्यादातार अपना घोंसला ऊँचे पेड़ों पर बनाते हैं लेकिन अब ऐसे पेड़ बहुत कम बचे हैं. इनके घटने का एक बड़ा कारण चूहे भी हैं.

पक्षी वैज्ञनिक रजा तहसीन बताते हैं कि लोग घरों में जहर देकर मारे गए चूहों को खुले में फेंक देते हैं जिसे खाकर कौवे अकाल मौत के शिकार हो रहे हैं. सामाजिकी वन प्रभाग द्वारा कराए गए सर्वे के अनुसार पिछले 31 वर्षो में करीब साढ़े 26 लाख कौवे विलुप्त हो चुके हैं.

आधी से ज्यादा प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर

ऊंची-ऊंची इमारतों की छत पर लगे टीवी एंटीना के कोने पर अब कौवे नहीं बैठते. उनकी कांव-कांव का शोर अब कानों को नहीं बेधता. एक समय था जब कौए सभी जगह आसानी से दिखाई दे जाते थे, किंतु आज इनकी तेज़ी से घटती संख्या के कारण ही अब इनकी गणना एक दुर्लभ पक्षी के रूप में की जा रही है. इसे प्रकृति की मार कहें या पर्यावरण में आया बदलाव मगर आज कौवे की आधी से अधिक प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं. शेष बची प्रजातियों में से करीब 20 प्रतिशत कौवे जंगलों में जाकर बस गए हैं. आज शहरी वातावरण में कौवे बहुत कम पाए जाते हैं.

कौआ कोवीडी परिवार का पक्षी है. यह भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, बर्मा आदि देशों के साथ ही विश्व के अनेक देशों में पाया जाता है. भारत में इसकी आठ प्रजातियां देखने को मिलती हैं, जिनमें पहाड़ी कौआ, जंगली कौआ तथा घरेलू कौआ प्रमुख हैं. पहाड़ी कौआ आकार में सबसे छोटा होता है. इसकी लंबाई लगभग 10 इंच होती है तथा शरीर का रंग चमकीला काला होता है. पहाड़ी कौवे के गले में भूरे रंग की एक पट्टी होती है, जिसकी सहायता से इसे सरलता से पहचाना जा सकता है. यह एशिया के पश्चिमी पहाड़ी भागों में पाया जाता है. सर्दियों में पहाड़ी कौओं के झुंड जम्मू, पंजाब तथा हरियाणा के अनेक भागों में देखे जा सकते हैं. यूनिवर्सिटी डेस्क एनसायक्लोपीडिया के अनुसार पहाड़ी कौआ बुद्धिमान पक्षी है तथा प्रशिक्षण देने से यह मनुष्य की आवाज़ की नकल भी कर सकता है.

जंगली कौआ आकार में चील से कुछ छोटा होता है. इसके शरीर का रंग गहरा चमकीला व चोंच भारी होती है. यह सामान्यतः गांवों के निकट रहना पसंद करता है. अतः शहरों में कम ही दिखाई पड़ता है। जंगली कौआ बहुत साहसी होता है तथा मरे हुए जानवरों का मांस गिद्ध आदि के साथ मिलकर खाता है. इसकी सहायता से बाघ या अन्य हिंसक जीव द्वारा मारे गए शिकार का पता आसानी से चल जाता है. जंगली कौवे का प्रजनन काल उत्तरी भारत, असम तथा बर्मा में मार्च से मई तक तथा शेष भारत में दिसंबर से अप्रैल तक होता है. मादा एक बार में चार से छह अंडे देती है. इसके अंडे सामान्य कौओं के अंडों से कुछ बड़े होते हैं.

घरेलू कौआ आकार में कबूतर से कुछ बड़ा होता है. इसकी लंबाई डेढ़ फुट तक होती है तथा यह हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों को छोड़कर पूरे भारत में पाया जाता है. इसकी आवाज़ बड़ी कर्कश होती है तथा अक्सर यह कांव-कांव करता रहता है. घरेलू कौआ सामान्यतः झुंड में रहता है और रात झुंड के साथ ही पेड़ों पर व्यतीत करता है. मानव के बहुत अधिक निकट रहने के कारण यह काफी चालाक तथा धूर्त माना जाता है. यह सब कुछ खाता है. इसके भोजन में मरे हुए चूहे, सड़ा-गला मांस, टिड्डी, दीमक, छोटे-छोटे अंडे तथा चिड़िया, कूड़ा-करकट, चौके की जूठन, अनाज आदि शामिल हैं.

घरेलू कौवे का प्रजनन काल सामान्यतः अप्रैल से जून तक होता है. इनमें नर तथा मादा दोनों मिलकर पेड़ों की टहनियों पर तिनकों, पंखों, घास-फूस, चिथड़ों तथा रस्सी के रेशों से कटोरे के आकार का घोंसला बनाते हैं, जो भीतर से मुलायम, गद्देदार किंतु काफी मज़बूत होता है. इसी घोंसले में मादा हरे चित्तीदार या भूरी धारी वाले चार-पांच अंडे देती है, जिनका पोषण नर तथा मादा दोनों मिलकर करते हैं.

सारे कौओं में कुछ सामान्य विशेषताएं होती हैं. जैसे, इनमें नर और मादा का रूप-रंग और आकार एक जैसा होता है. पहाड़ी कौवे को छोड़कर सभी कौवे पेड़ों पर लगभग एक जैसे घोंसले बनाते हैं. इनकी सभी प्रजातियों में प्रजनन काल तो अलग-अलग होता है, किंतु प्रत्येक प्रजाति की मादा एक बार में चार से छह तक अंडे देती है.

कौआ बड़ा ही उपेक्षित पक्षी है. गहराई से उसका अध्ययन करने पर पता चलता है कि वह अत्यंत बुद्धिमान, धीर गंभीर और संवेदनशील पक्षी है. रोटी का एक टुकड़ा मिलने पर भी कौआ अपने साथियों के साथ बांटकर खाता है. कहते हैं कि किसी कौवे की मौत होने पर सैकड़ों कौए इकट्ठे होकर उसका मातम मनाते हैं और अंतिम संस्कार तक करते हैं. इनकी अपनी एक पंचायत होती है, जो दोषी कौओं को दंड भी देती है.

कौओं की लगातार कम होती संख्या के दो कारण है. पहला कारण तो यह है कि वातावरण में अचानक जो परिवर्तन हो रहा है और खाद्य पदार्थों में जो ज़हरीली चीज़ें आ रही हैं, उनकी वजह से कौओं की प्रजनन क्षमता में कमी आने लगी है. दूसरी वजह यह है कि वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से इनके लिए आवास की समस्या उत्पन्न हो गई है. कौओं का स्वभाव है कि वे एकांत में अपना घोंसला बनाते हैं जो आजकल उन्हें कम मिल पा रहा है.