पांगी की जनता करेगी लोकसभा चुनाव का बहिष्कार

पांगी की जनता करेगी लोकसभा चुनाव का बहिष्कार
साभार इंटरनेट

शिमला. हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के जनजातीय क्षेत्र पांगी की लोकसभा चुनाव का बहिष्कार 16 पंचायतों के निवासियों ने लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करने का ऐलान किया है. पांगी में सुरंग निर्माण को लेकर कोई पहल नहीं होने के कारण स्थानीय लोगों ने यह फैसला लिया है. राजनीतिक पार्टियों ने घाटी की जनता को सुरंग निर्माण का लालच देकर उन्हें मात्र वोट बैंक के रूप में ही इस्तेमाल किया है.

इसके चलते अब चंबा जिला के जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी की जनता का लोकतंत्र से विश्वास उठ गया है. स्थानीय लोगों ने इस बार लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है. यह बात पांगी संघर्ष समिति के संयोजक डॉ. हरीश शर्मा ने सोमवार को पत्रकार वार्ता के दौरान कही.

डॉ. हरीश वर्मा ने कहा कि विकास के बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकारों के दावे जिला चंबा के पांगी घाटी में खोखले नजर आते हैं. पांगी घाटी की लगभग 30 हजार की जनसंख्या आज भी छह महीने का कारावास झेलने को मजबूर हैं. लोगों का जीवन कालापानी के समान हो गया है. सरकारें आती-जाती हैं और हर बार यहां के लोगों को झूठे वादे कर दिए जाते हैं. करीब पांच दशक की चिरलंबित सुरंग की मांग को अब तक कोई सरकार अमलीजामा नहीं पहना सकी है.

हर बार चुनाव का बहिष्कार किया जाएगा

उन्होंने कहा कि इस बार ईवीएम मशीन का एक भी बटन लोगों की ओर से नहीं दबाया जाएगा. जब तक सुरंग नहीं बनती तब तक हर बार चुनाव का बहिष्कार किया जाएगा. टनल बनाने के लिए डीसी के माध्यम से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति एवं चुनाव आयोग को पत्र लिखा है. लेकिन आज तक किसी ने भी यहां के लोगों की दिक्कतों को नहीं सुना.

चुनाव आयोग की ओर से वोटर अवेयरनेस का कोई कैंप आज तक यहां नहीं लगाया गया. पांगी के हालात यह है कि साल के छह महीने से अधिक समय तक घाटी शेष विश्व से कटी रहती है. रियासत काल में जब देश में राजतंत्र चलता था, तो इस कबायली क्षेत्र में उस समय शासक अपने क्षेत्र में अपराध करने वालों को बतौर सजायाफ्ता मुजरिम यहां लाकर छोड़ देते थे. यहां के विपरीत मौसम में उनका क्या होता था कुछ नहीं पता. बेशक आज प्रजातंत्र है लेकिन इसके बाद भी यहां पर हालात नहीं बदले हैं. राजाओं की दंड भूमि के नाम से उस समय जानी जाने वाली पांगी घाटी को आज भी लोग विकास के अभाव में कालापानी ही कहते हैं.

जनता के साथ केवल छल ही किया गया

हरीश शर्मा ने आगे कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं की बात की जाए तो यहां की जनता के साथ केवल छल ही किया गया है. आपातकालीन स्थिति में पांगी से रैफर होने वाले मरीजों को मौत के मुंह में धकेला जाता है. सर्दियों में बर्फ से ढके मार्गों के बीच से मरीज को 340 किलोमीटर दूर जम्मू पहुंचाना असंभव हो जाता है. यही कारण है कि सर्दियों में उपचार के अभाव में घाटी में मृत्यु दर में भी इजाफा होता है.