“प्रयागराज कुम्भ 2019” विशेष: शास्त्र और शस्त्र के साथ जुट रहे देशभर के अखाड़े

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प्रयागराज/नई दिल्ली. प्रयागराज में संगम तट पर 15 जनवरी मकर संक्रान्ति के दिन से दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला “प्रयागराज कुम्भ 2019” शुरू हो रहा है. इसकी तैयारी जोरों पर हैं. कुंभ में अखाड़ों का विशेष महत्व होता है. यह अखाड़े हैं क्या ? इनकी परंपरा क्या है ? इस सबके पीछे का महत्‍वपूर्ण इतिहास क्या है. यह जानना दिलचस्प है.

क्या है अखाड़ा:

अखाड़ा शब्द को सुनते ही जो दृश्य मानस पटल पर उतरता है वह मल्लयुद्ध का है. किन्तु यहां भाव शब्द की अन्वति और वास्तविक अर्थ से संबोधित है. “अखाड़ा” शब्द “अखण्ड” शब्द का अपभ्रंश है जिसका अर्थ न विभाजित होने वाला है. आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा हेतु साधुओं के संघों को मिलाने का प्रयास किया था, उसी प्रयास के फलस्वरूप सनातन धर्म की रक्षा एवं मजबूती बनाये रखने एवं विभिन्न परम्पराओं व विश्वासों का अभ्यास करने वालों को एकजुट करने तथा धार्मिक परम्पराओं को अक्षुण्ण रखने के लिए विभिन्न अखाड़ों की स्थापना हुई. अखाड़ों से सम्बन्धित साधु-सन्तों की विशेषता यह होती है कि इनके सदस्य शास्त्र और शस्त्र दोनों में पारंगत होते हैं.

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शैव, वैष्णव और उदासीन पंथ के संन्यासियों के मान्यता प्राप्त कुल 13 अखाड़े हैं. पहले आश्रमों के अखाड़ों को बेड़ा अर्थात साधुओं का जत्था कहा जाता था. पहले अखाड़ा शब्द का चलन नहीं था. साधुओं के जत्थे में पीर और तद्वीर होते थे. अखाड़ा शब्द का चलन मुगलकाल से शुरू हुआ. अखाड़ा साधुओं का वह दल है जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत रहता है. कुछ विद्वानों का मानना है कि अलख शब्द से ही अखाड़ा शब्द बना है. कुछ मानते हैं कि अक्खड़ से या आश्रम से.

अखाड़ा सामाजिक व्यवस्था, एकता और संस्कृति तथा नैतिकता का प्रतीक है. समाज में आध्यात्मिक महत्व मूल्यों की स्थापना करना ही अखाड़ों का मुख्य उद्देश्य है. अखाड़ा मठों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना करना है, इसीलिए धर्म गुरुओं के चयन के समय यह ध्यान रखा जाता था कि उनका जीवन सदाचार, संयम, परोपकार, कर्मठता, दूरदर्शिता तथा धर्ममय हो. भारतीय संस्कृति एवं एकता इन्हीं अखाड़ों के बल पर जीवित है. अलग-अलग संगठनों में विभक्त होते हुए भी अखाडे़ एकता के प्रतीक हैं. अखाड़ा मठों का एक विशिष्ट प्रकार नागा संन्यासियों का एक विशेष संगठन है. प्रत्येक नागा संन्यासी किसी न किसी अखाड़े से सम्बन्धित रहते हैं.

अखाड़ों को उनके इष्ट-देव के आधार पर तीन श्रेणियों में विभाजित गया है:

शैव अखाड़े इस श्रेणी के इष्ट भगवान शिव हैं. ये शिव के विभिन्न स्वरूपों की आराधना अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर करते हैं. वैष्णव अखाड़े इस श्रेणी के इष्ट भगवान विष्णु हैं. ये विष्णु के विभिन्न स्वरूपों की आराधना अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर करते हैं. उदासीन अखाड़ा सिक्ख सम्प्रदाय के आदि गुरु श्री नानकदेव के पुत्र श्री चंद्रदेव जी को उदासीन मत का प्रवर्तक माना जाता है. इस पन्थ के अनुयाई मुख्यतः प्रणव अथवा ‘ॐ’ की उपासना करते हैं.

अखाड़ों की व्यवस्था एवं संचालन हेतु पांच लोगों की एक समिति होती है जो ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश व शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है. अखाड़ों में संख्या के हिसाब से सबसे बड़ा जूना अखाड़ा है इसके बाद निरञ्जनी और उसके बाद महानिर्वाणी अखाड़ा है. उनके अध्यक्ष श्री महंत और अखाड़ों के प्रमुख आचार्य महामण्डेलेश्वर के रुप में माने जाते हैं.

महामण्डलेश्वर ही अखाड़े में आने वाले साधुओं को गुरु मन्त्र भी देते हैं. पेशवाई या शाही स्नान के समय में निकलने वाले जुलूस में आचार्य महामण्डलेश्वर और श्रीमहंत रथों पर सवार होते हैं, उनके सचिव हाथी पर, घुड़सवार नागा अपने घोड़ों पर तथा अन्य साधु पैदल आगे रहते हैं. शाही ठाट-बाट के साथ अपनी कला प्रदर्शन करते हुए साधु-सन्त अपने लाव-लश्कर के साथ अपने-अपने गन्तव्य को पहुंचते हैं.

अखाड़ों में आपसी सामंजस्य बनाने एवं आंतरिक विवादों को सुलझाने के लिए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् का गठन किया गया है. अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् ही आपस में परामर्श कर पेशवाई के जुलूस और शाही स्नान के लिए तिथियों और समय का निर्धारण मेला आयोजन समिति, आयुक्त, जिलाधिकारी, मेलाधिकारी के साथ मिलकर करता है.

आज इन अखाड़ों को बहुत ही श्रद्धा-भाव से देखा जाता है. सनातन धर्म की पताका हाथ में लिए यह अखाड़े धर्म का आलोक चहुंओर फैला रहे हैं. इनके प्रति आम जन-मानस में श्रद्धा का भाव शाही स्नान के अवसर पर देखा जा सकता है, जब वे जुलूस मार्ग के दोनों ओर इनके दर्शनार्थ एकत्र होते हैं तथा अत्यंत श्रद्धा से इनकी चरण-रज लेने का प्रयास करते हैं.

शैव संन्यासी संप्रदाय के 7 अखाड़े
1. श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी- दारागंज प्रयाग (उत्तर प्रदेश).
2. श्री पंच अटल अखाड़ा- चैक हनुमान, वाराणसी (उत्तर प्रदेश).
3. श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी- दारागंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश).
4. श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायती – त्रंब्यकेश्वर, नासिक (महाराष्ट्र).
5. श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा- बाबा हनुमान घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश).
6. श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा- दशाश्वमेघ घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश).
7. श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा- गिरीनगर, भवनाथ, जूनागढ़ (गुजरात).

बैरागी वैष्णव संप्रदाय के 3 अखाड़े
8. श्री दिगम्बर अनी अखाड़ा- शामलाजी खाकचौक मंदिर, सांभर कांथा (गुजरात).
9. श्री निर्वानी आनी अखाड़ा- हनुमान गादी, अयोध्या (उत्तर प्रदेश).
10. श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा- धीर समीर मंदिर बंसीवट, वृंदावन, मथुरा (उत्तर प्रदेश).

उदासीन संप्रदाय के 3 अखाड़े
11. श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा- कृष्णनगर, कीटगंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश).
12. श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखंड).
13. श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखंड).

अखाड़ों से जुड़ी महत्‍वपूर्ण बातें :
1.जूना अखाड़ा- यह सबसे पुराना अखाड़ा है. इसीलिए इसे जूना (पुराना) नाम दिया गया है. वर्तमान में सबसे ज्यादा महामंडलेश्वर (275) इसी अखाड़े के हैं. इनमें विदेशी व महिला महामंडलेश्वर भी शामिल हैं. यह सबसे प्रमुख अखाड़ा माना जाता है.

2.अटल अखाड़ा- इस अखाड़े में सिर्फ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को दीक्षा दी जाती है. अन्य वर्गों को इस अखाड़े में शामिल नहीं किया जाता.

3.आवहन अखाड़- अन्य अखाड़ों में महिला साध्वियों को भी दीक्षा दी जाती है, लेकिन आवाहन में महिला साध्वियों की कोई परम्परा नहीं है. यानी के इस अखाड़े में सिर्फ साधु होते हैं.

4-निरंजनी अखाड़ा- इस अखाड़े में लगभग 50 महामंडलेश्वर है. सबसे ज्यादा उच्च शिक्षित महामंडलेश्वर इसी अखाड़े में हैं.

5-अग्नि अखाड़ा- इस अखाड़े में सिर्फ ब्राह्मणों को ही दीक्षा दी जाती है. ब्राह्मण के साथ उनका ब्रह्मचारी होना भी आवश्यक है.

6-महानिर्वाणी अखाड़ा-महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा का जिम्मा इसी अखाड़े के पास है. यह परम्परा अनेक वर्षों से चली आ रही है.

7-आनंद अखाड़ा-इस शैव अखाड़े में आज तक एक भी महामंडलेश्वर नहीं बनाया गया है. इस अखाड़े में आचार्य का पद प्रमुख होता है.

8-दिगंबर अणि अखाड़ा-इस अखाड़े में सबसे ज्यादा खालसा (431) हैं. वैष्णव संप्रदाय के अखाड़ों में इसे राजा कहा जाता है.

9-निर्मोही अणि अखाड़ा-वैष्णव सम्प्रदाय के तीनों अणि अखाड़ों में से इसी में सबसे ज्यादा अखाड़े शामिल हैं.

10-निर्वाणी अणि अखाड़ा-इस अखाड़े के कई संत प्रोफेशनल पहलवान रह चुके हैं. कुश्ती इस अखाड़े के जीवन का एक हिस्सा है.

11-बड़ा उदासीन अखाड़ा-इस अखाड़े का उद्देश्य सेवा करना है. इस अखाड़े में 4 महंत होते हैं, जो कभी रिटायर नहीं होते है.

12-नया उदासीन अखाड़ा-इस अखाड़े में उन्हीं को नागा बनाया जाता है, जिनकी दाड़ी-मूंछ न निकली हो यानी 8 से 12 साल तक के.

13-निर्मल अखाड़ा-इस अखाड़ें में धूम्रपान पर पूरी तरह पाबंदी है. इस अखाड़े के सभी केंद्रों के गेट पर इसकी सूचना लिखी रहती है.

किन्नर अखाड़ा: मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में अप्रैल 2016 में हुए सिंहस्थ महाकुंभ में पहली बार किन्नर अखाड़े सामने आया था. इस अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी हैं. लक्ष्मी टीवी कलाकार, भरतनाट्यम नृत्यांगना और सामाजिक कार्यकर्ता हैं और किन्नरों के अधिकार के लिए काम करती हैं. किन्नर अखाड़े का मुख्य उद्देश्य किन्नरों को भी समाज में समानता का अधिकार दिलवाना है.

किन्नर अपने आराध्य देव अरावन से साल में एक बार विवाह करते है. हालांकि ये विवाह मात्र एक दिन के लिए होता है. अगले दिन अरावन देवता की मौत के साथ ही उनका वैवाहिक जीवन खत्म हो जाता है. अगर किसी किन्नर की मृत्यु हो जाए तो उसका अंतिम संस्कार बहुत ही गुप्त तरीके से किया जाता है. ज्योतिष के अनुसार वीर्य की अधिकता से पुरुष (पुत्र) उत्पन्न होता है. रक्त (रज) की अधिकता से स्त्री (कन्या) उत्पन्न होती है. वीर्य और रज समान हो तो किन्नर संतान उत्पन्न होती है. किन्नरों का जिक्र धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है. महाभारत युद्ध को पाड़वों को जिताने का योगदान शिंखडी को भी जाता है.

प्रयागराज में लगेगा किन्नरों का अखाड़ा, पूरे देश से जुटेंगे किन्नर संत

संगम नगरी में “प्रयागराज कुम्भ 2019” एक और कीर्तिमान रचने जा रहा है. पहली बार किन्नर अखाड़ा प्रयागराज के कुंभ में अपने पूर्ण अस्तित्व में विश्व के सामने आएगा. संगम की रेती पर किन्नर संत भी धूनी रमाकर प्रभु भक्ति में लीन होंगे तो कथा प्रवचन के साथ यज्ञ प्रतिष्ठान को भी संपन्न कराएंगे. हालांकि इससे पहले 2016 में उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ में भी किन्नर अखाड़ा ने अखाड़ा परिषद से मान्यता न मिलने के बावजूद भी हिस्सा लिया था. उसी दरमियान औपचारिक रूप से किन्नर अखाड़े का अस्तित्व भी सामने आया था.

सिंहस्थ कुंभ में देश के मान्यता प्राप्त 13 अखाड़े की तरह किन्नर अखाड़े की पेशवाई भी निकाली थी और शाही स्नान की परंपरा का निर्वाहन भी किया गया था. अब उसी क्रम में 2019 में प्रयागराज में लग रहे कुंभ के दौरान आधिकारिक तौर पर किन्नर अखाड़ा अपनी उपस्थिति दर्ज करायेगा.

दण्डी बाड़ा

हाथ में दण्ड जिसे ब्रम्ह दण्ड कहते है, धारण करने वाले संन्यासी को दण्डी संन्यासी कहा जाता है. दण्डी संन्यासियों का संगठन दण्डी बाड़ा के नाम से जाना जाता है. “दण्ड संन्यास” सम्प्रदाय नहीं अपितु आश्रम परम्परा है. दण्ड संन्यास परम्परा के अन्तर्गत दण्ड संन्यास लेने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण को है. प्रथम दण्डी संन्यासी के रुप में भगवान नारायण ने ही दण्ड धारण किया है.