नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी (JDA) और राजस्थान के पूर्व शाही परिवार, जिसमें पूर्व उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी का परिवार शामिल है. बीच चल रहे ₹400 करोड़ के भूमि विवाद में दोबारा सुनवाई का आदेश दिया है। कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें 2011 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बिना मेरिट पर जांच के बरकरार रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को निर्देश दिया
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा तकनीकी आधार पर JDA की अपील पर विचार न करना उचित नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह JDA की पहली अपील पर मेरिट के आधार पर चार सप्ताह के भीतर फैसला करे और इसकी अनुपालन रिपोर्ट भी दाखिल करे।
यह विवाद उस जमीन से जुड़ा है, जो पहले सरकारी रिकॉर्ड में “हाथरोई गांव” के नाम से दर्ज थी और अब केंद्रीय जयपुर के शहरी विस्तार का हिस्सा है, जहां प्राइम रियल एस्टेट, स्कूल, अस्पताल और अन्य नागरिक सुविधाएं मौजूद हैं। JDA के मुताबिक, राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन “सिवाई चक” (अकृष्य/सरकारी भूमि) के रूप में दर्ज है और इसकी कीमत करीब ₹400 करोड़ है।
1990 के दशक में नागरिक प्रशासन ने इस जमीन पर कब्जा लिया
याचिका में कहा गया है कि 1990 के दशक में नागरिक प्रशासन ने इस जमीन पर कब्जा लिया था। JDA ने शाही परिवार के इस दावे को चुनौती दी है कि जमीन 1949 के कोवेनेंट (जयपुर के भारतीय संघ में विलय से जुड़ा समझौता) के तहत निजी संपत्ति के रूप में दर्ज थी। JDA का कहना है कि यह जमीन कोवेनेंट की अनुसूची में शाही परिवार की निजी संपत्ति के रूप में कभी सूचीबद्ध नहीं थी, और 1993 से 1995 के बीच मुआवजा देकर जमीन का कानूनी अधिग्रहण किया गया।
2005 में शाही परिवार ने स्वामित्व की घोषणा के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया। 24 नवंबर 2011 को ट्रायल कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें मालिक घोषित किया, राज्य के पक्ष में दर्ज राजस्व प्रविष्टियां रद्द कीं और JDA को कब्जे में हस्तक्षेप से रोका।
2012 में JDA ने पहली अपील दायर की
इसके बाद 2012 में JDA ने पहली अपील दायर की। यह नवंबर 2023 में खारिज हुई, फिर एक साल बाद बहाल हुई। 15 सितंबर को हाईकोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया और ट्रायल कोर्ट के फैसले को अपीलीय जांच के बिना बरकरार रखा। इसके बाद 10 दिसंबर को JDA ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
JDA ने दलील दी कि तकनीकी आधार पर सार्वजनिक भूमि का नुकसान हुआ है, जबकि मामला सार्वजनिक स्वामित्व, पूर्ण अधिग्रहण, स्थिर राजस्व रिकॉर्ड और संविधान के अनुच्छेद 363 (कोवेनेंट से जुड़े विवादों पर) जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़ा है।
