मंडी और सिंचाई सुविधा की मांग कर रहे हैं झारखंड के सब्जी उत्पादक किसान

किसानों को सब्जियों की सही कीमत नहीं मिल पाती है

रांची. राजधानी रांची के आसपास के ग्रामीण इलाकों में अच्छी मात्रा में सब्जी उत्पादन होता है और दूसरे राज्यों में भी यहां से सब्जी की सप्लाई की जाती है लेकिन दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में सब्जी की खेती करने वाले किसानों को सब्जियों की सही कीमत नहीं मिल पाती है. आखिर किसानों को फसल की सही कीमत क्यों नहीं मिल पाती है इसकी छानबीन के लिए पंचायत टाइम्स की टीम राजधानी के आसपास के ग्रामीण इलाकों का दौरा करने पहुंची. जिसके बाद किसानों नेअपना दर्द हमसे साझा किया.

 

नुकसान उठाना पड़ता है

कड़ी मेहनत के बाद किसान फसल उगाते हैं. राजधानी और आसपास के इलाकों में सब्जी की बेहतर उत्पादन की क्षमता किसानों में है. बुढ़मू, ठाकुरगांव, सिमलिया, रातू और अनगड़ा जैसे इलाके में बेहतर किस्म की सब्जियों की खेती होती है. जिसकी डिमांड दूसरे राज्यों में भी है लेकिन सही मूल्य नहीं मिलने की वजह से किसानों की आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही है. जाहिर सी बात है अगर फसल की सही कीमत किसानों को नहीं मिले तो उनके जीवन स्तर में कैसे सुधार हो पाएगा. दरअसल किसानों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में मंडी बाजार की समुचित व्यवस्था नहीं है. सप्ताह में दो बार बाजार लगते हैं. जहां किसान सब्जियों की बिक्री करने के लिए पहुंचते है लेकिन बिचौलिए और सब्जी मंडी की समुचित व्यवस्था नहीं होने से किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है.

 किसानों को सब्जियों की सही कीमत नहीं मिल पाती है

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किसान का कहना है कि जिस सब्जी के सौ ग्राम बीज को 300 रुपए में वो खरीदते हैं. उस सब्जी की कभी-कभी प्रति किलो कीमत मात्र तीन रुपए ही तक रखी जाती है. जिससे कड़ी मेहनत के बाद सब्जी को उपजाने से मुनाफे की जगह घाटा सहना पड़ता है. राजधानी के आसपास के ग्रामीण इलाकों में गेंहू, सरसो, मकई, आलू, मटर, भिंडी, बैगन, टमाटर जैसे फसलों की उपज पूरे साल हो सकती है. लेकिन सिंचाई के लिए भी प्रशासन उदासीन रवैया इन क्षेत्रों में अपना रहा है. जिसकी वजह से भी किसानों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

 किसानों को सब्जियों की सही कीमत नहीं मिल पाती है

 

कुएं के भरोसे ही खेती

सिमलिया के किसान सुखराम उरांव बताते है कि जो बीज वो 300 रुपए प्रति ग्राम खरीद कर फसल उपजाते हैं. फसल तैयार होने पर उसकी प्रति किलो कीमत मात्र दो-तीन रुपए ही मिलती है. उन्होंने बताया कि उत्पादन ज्यादा होने से भी उन्हीं को नुकसान होता है. जबकि बड़ी मात्रा में दूसरे राज्यों में भी सब्जियों की सप्लाई होती है. वहीं, रातू इलाके के पुटकल टोली के किसान सोनू उरांव का कहना है कि कुएं के भरोसे ही खेती हो पाती है और बरसात ही सिंचाई का मुख्य साधन मात्र है. जिसकी वजह से सालों भर खेती-किसानों द्वारा नही की जा पाती. उन्होंने बताया कि सरकार की तरफ से जो योजनाएं चलाई जा रही है वो भी सही तरीके से नही चल पा रही है. क्योंकि, बीडीओ, सीओ भी इन इलाकों का दौरा नहीं करते हैं.

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