बेटियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार दिलाने के लिए लड़ती मंजरी

बेटियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार दिलाने के लिए लड़ती मंजरी-Panchayat Times
रतन मंजरी देवी

शिमला. पूरे देश में महिलाओं को पैतृक संपत्ति का अधिकार है. लेकिन हिमाचल का किन्नौर और लाहौल-स्पीति दो ऐसे जिले हैं जहां आज भी महिलाओं को इस अधिकार से वंचित रखा गया है. महिलाओं के अधिकार का भारत का कानून यहां लागू नहीं होने दिया गया. कई सरकारें आईं और चली गईं लेकिन किन्नौर की महिलाओं का दर्द किसी भी सरकार ने नहीं समझा.

इतनी ही उम्र में मंजरी ने कर दी जंग शुरू

इन महिलाओं को यह अधिकार दिलाने का बीड़ा 67 वर्षीय रतन मंजरी देवी ने उठाया है. वह पिछले 33 साल से जिला किन्नौर की महिलाओं के आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ रही हैं. 21 साल की मंजरी ने महिलाओं की हालत को देखते हुए इनके सम्मान की जंग शुरू कर दी थी. परिवारों के बंटवारे की प्रक्रिया शुरू होने के बाद मंजरी को लगा कि उनके क्षेत्र में महिला का नाम राजस्व रिकार्ड में दर्ज नहीं होता है. छोटा बेटा भी संपत्ति से महरूम रहता है. इसको देखते हुए उन्होंने महिलाओं को सम्मान अधिकार दिलाने की मन में ठान ली और तब से लेकर ये विभिन मंचों के माध्यम से क्षेत्र की महिलाओं को साथ लेकर अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं.

महिला दिवस : कुल्लू के देवसदन में सम्मानित हुई महिलाएं

रतन मंजरी का जन्म कर्नल पीएन नेगी के घर पर हुआ था. 67 साल की मंजरी देवी पांच बार रिब्बा पंचायत की प्रधान रह चुकी हैं और इतनी ही बार जिला परिषद की सदस्य रह चुकी हैं. इन्हें प्रदेश की पहली महिला प्रधान होने का गौरव भी प्राप्त है. रतन मंजरी को महिलाओं के अधिकार दिलाने का इतना जनून सवार हो गया कि उन्होंने शादी भी नहीं की.

मंजरी स्थानीय विधायक से लेकर देश के राष्ट्रपति तक महिलाओं के पैतृक अधिकार का मामला उठा चुकी हैं. वह आज भी पैत्रिक अधिकार दिलाने के लिए लड़ाई लड़ रही हैं. मंजरी का कहना है कि इस लड़ाई को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है. जब तक महिलाओं को अधिकार नहीं मिल जाता वह अपनी लड़ाई जारी रखेंगी.

महिलाओं को न तो मायके में और न ही ससुराल में जायदाद में हिस्सा मिलता

उनका कहना है कि किन्नौर में महिलाओं को न तो मायके में और न ही ससुराल में जायदाद में हिस्सा मिलता है. जब बेटी जन्म लेती है तो पिता पर आश्रित रहना पढ़ता है और शादी के बाद उसे पति पर निर्भर रहना पड़ता है. उनका कहना है कि महिलाओं की इस पीड़ा को उन्होंने नजदीक से देखा है. भाई को संपत्ति को बेचने का अधिकार है और बहन खाने के लिए भी मोहताज है. आजादी के बाद कई कानूनों में संशोधन किए गए तो फिर जनजातीय क्षेत्र में महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए क्यों नहीं संशोधन किया जाता है.

महिलाएं चुनाव का बहिष्कार कर सकती हैं

उन्होंने महिलाओं को अधिकार देने के लिए विधायकों, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और केंद्र सरकार से भी गुहार लगाई लेकिन सुनवाई नहीं हुई. अब सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के अधिकार देने के लिए याचिका दायर की गई है. उनका कहना है कि जब देश के सभी हिस्सों में महिलाओं को अधिकार है तो किन्नौर में क्यों नहीं दिए जा सकते. इस बार लोकसभा चुनाव में जो दल महिलाओं को अधिकार दिलाने वादा घोषणा पत्र में करेगा, जिला की सभी महिलाएं उन्हें अपना वोट देंगी. अगर कोई दल उन्हें आश्वासन नहीं देता है तो महिलाएं चुनाव का बहिष्कार करेंगी.

महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं

जनजातीय जिलों किन्नौर और लाहौल-स्पीति में भू राजस्व अधिनियम 1954 लागू ही नहीं है. इस कारण यहां की महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं. बाकी सभी कानून जनजातीय क्षेत्र में लागू हैं. केवल भू स्वामित्व के अधिकार से महिलाओं को वंचित रखा गया है. इस कानून के तहत परिवार की संपत्ति बाहर के लोगों को न जाए, इसलिए संपत्ति का बंटवारा सिर्फ बेटों में होता है. बेटा न होने पर संपत्ति अपने आप उसके भाई के बेटों में ट्रांसफर हो जाती है. भारत सरकार और हिमाचल सरकार ने देश-प्रदेश की महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के लिए कई कानूनों में संशोधन कर रखा है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि किन्नौर और लाहौल-स्पीति जिले की महिलाओं के साथ अभी तक भेदभाव पूर्ण व्यवहार हो रहा है.

पैतृक संपत्ति में हिस्सा दिलाना यहां का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा

बेटियों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा दिलाना यहां का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है. कहने को तो जहां महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सरकारी स्तर पर बहुत कुछ हुआ है. पंचायत चुनाव में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण दिया हुआ है. लेकिन किन्नौर जिला में महिलाओं को जरूरी अधिकार तक नहीं दिए जा रहे हैं.