नई दिल्ली: रॉयटर्स के ताज़ा सर्वे के मुताबिक, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) वर्ष 2026 तक अपनी प्रमुख रेपो दर 5.25% पर स्थिर रख सकता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि फरवरी 2025 से अब तक कुल 125 बेसिस प्वाइंट की कटौती के बाद केंद्रीय बैंक अब पिछली कटौतियों के असर का आकलन कर रहा है। हालांकि महंगाई RBI के तय दायरे से नीचे बनी हुई है और आर्थिक वृद्धि मजबूत दिख रही है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल दरों में और कटौती की कोई ठोस वजह नहीं है। आर्थिक विकास मुख्य रूप से सरकारी खर्च के दम पर हो रहा है, जबकि निजी निवेश अभी भी अपेक्षा से कमजोर है।
फरवरी बैठक में दरें यथावत रहने की संभावना
19–28 जनवरी के बीच किए गए रॉयटर्स पोल में शामिल 70 में से 59 अर्थशास्त्रियों (80% से अधिक) ने अनुमान जताया कि 4–6 फरवरी को होने वाली मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में रेपो दर 5.25% पर ही रखी जाएगी। 10 विशेषज्ञों ने 25 बेसिस प्वाइंट की कटौती का अनुमान लगाया, जबकि एक ने 50 बेसिस प्वाइंट की बड़ी कटौती की संभावना जताई। अधिकांश अर्थशास्त्रियों का मानना है कि कम से कम इस साल के अंत तक दरें स्थिर रहेंगी।
ICICI सिक्योरिटीज प्राइमरी डीलरशिप के वरिष्ठ अर्थशास्त्री अभिषेक उपाध्याय ने कहा, “RBI MPC इस समय मजबूत स्थिति में है और वृद्धि को सहारा देने के लिए और कदम उठाने की जरूरत नहीं दिखती।”
वैश्विक अनिश्चितता और व्यापार वार्ताएं
अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50% दंडात्मक शुल्क को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इस बीच भारत ब्रिटेन, न्यूज़ीलैंड, ओमान और हाल ही में यूरोपीय संघ के साथ नए व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहा है।
1 फरवरी को पेश होने वाले केंद्रीय बजट में सरकार से राजकोषीय अनुशासन (फिस्कल कंसॉलिडेशन) की नीति जारी रखने की उम्मीद है।
महंगाई और विकास का अनुमान
पोल के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में औसत महंगाई 2.1% रह सकती है, जबकि अगले वर्ष यह बढ़कर 4.0% होने का अनुमान है।
वहीं आर्थिक वृद्धि इस साल औसतन 7.4% और अगले साल 6.7% रहने की संभावना जताई गई है।
अर्थव्यवस्था बनाम रुपये की चुनौती
हाल के महीनों में RBI को अर्थव्यवस्था को सहारा देने और रुपये को संभालने के बीच संतुलन साधना पड़ रहा है। विदेशी निवेशकों की निकासी के कारण इस साल अब तक भारतीय शेयर बाजार से करीब 4 अरब डॉलर निकल चुके हैं। पिछले सप्ताह रुपया डॉलर के मुकाबले 91.9650 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि रुपये को स्थिर रखने के लिए RBI के हस्तक्षेप से बैंकिंग प्रणाली में तरलता घट गई है, जिससे पिछली दर कटौतियों का पूरा असर नहीं दिख पाया।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स के ट्रेजरी प्रमुख अनिल भंसाली ने कहा, “जहां-जहां ऋण रेपो रेट से जुड़े हैं, वहां ट्रांसमिशन हुआ है, लेकिन बैंकों के पास फंड की कमी है, इसलिए वे जमा दरें नहीं घटा पा रहे।” हाल ही में RBI ने बॉन्ड खरीद, फॉरेन एक्सचेंज स्वैप और रेपो ऑपरेशनों के जरिए 23 अरब डॉलर से अधिक की तरलता प्रणाली में डालने के कदम उठाए हैं।
