शहरों से गांव एंव कस्बों की ओर रिवर्स माइग्रेशन देश के सामने एक नई चुनौती

दूसरे राज्यों से झारखंड लौट रहे प्रवासी मजदूरों से राज्य में कोरोना संक्रमण का बढ़ा खतरा - Panchayat Times
प्रतीक चित्र

नई दिल्ली. यूं तो श्रमिक वर्ग के लिये प्रत्येक राजनीतिक दल अपने-अपने घोषणापत्र में ढेरों वायदे करते हैं परंतु जमीनी स्तर पर जब श्रमिकों के हित की बात आती है तो ठोस उपाय करने की बजाय राजनीतिक दल इस वर्ग की समस्याओं से पल्ला झाड़ने का प्रयास करते हैं. इस समय भारत में जारी लॉकडाउन के दौरान श्रमिक वर्ग को पलायन जैसी गंभीर समस्या से दो-चार होना पड़ रहा है.

बेचता यूं ही नहीं है आदमी ईमान को,

भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को.

अदम गोण्डवी

लॉकडाउन के दौरान होने वाला पलायन सामान्य दिनों की अपेक्षा होने वाले पलायन से एकदम उलट है. अमूमन हम सब रोजगार पाने व बेहतर जीवन जीने की आशा में गांवों और कस्बों से महानगरों की ओर पलायन होते देखते है परंतु इस समय महानगरों से गांवों की ओर हो रहा पलायन नि:संदेह चिंताजनक स्थिति को उत्पन्न कर रहा है. इस स्थिति को ही जानकारों ने रिवर्स माइग्रेशन (Reverse Migration) का नाम दिया है.

शहरों से गांव एंव कस्बों की ओर रिवर्स माइग्रेशन देश के सामन एक नई चुनौती - Panchayat Times
People in queue to boarding in a Shramik Special train

क्या है रिवर्स माइग्रेशन?

सामान्य शब्दों में रिवर्स माइग्रेशन से तात्पर्य ‘महानगरों और शहरों से गांव एंव कस्बों की ओर होने वाले पलायन से है.’ बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिकों का गांव की ओर प्रवासन हो रहा है. लॉकडाउन के कुछ दिनों बाद ही काम-धंधा बंद होने की वजह से श्रमिकों का बहुत बड़ा हुजूम हजारों किलोमीटर दूर अपने घर जाने के लिये पैदल ही सड़कों पर उतर पड़ा.

लॉकडाउन में कैद, भूख-प्यास से परेशान मजदूरों के बीच छटपटाहट और बेचैनी लाजिमी थी. अब लंबे इंतजार के बाद सरकार की ओर से उनकी घर वापसी का रास्ता खुला है. इस वक्त यह राहत की बात लग सकती है, लेकिन यह रिवर्स माइग्रेशन संपन्न व पिछड़े दोनों तरह के राज्यों के लिये बड़ी मुसीबत साबित होने वाला है.

प्रवासी श्रमिक से क्या तात्पर्य

एक ‘प्रवासी श्रमिक’ वह व्यक्ति होता है जो असंगठित क्षेत्र में अपने देश के भीतर या इसके बाहर काम करने के लिये पलायन करता है. प्रवासी श्रमिक आमतौर पर उस देश या क्षेत्र में स्थायी रूप से रहने का इरादा नहीं रखते हैं जिसमें वे काम करते हैं. अपने देश के बाहर काम करने वाले प्रवासी श्रमिकों को विदेशी श्रमिक भी कहा जाता है. उन्हें प्रवासी या अतिथि कार्यकर्ता भी कहा जा सकता है, खासकर जब उन्हें स्वदेश छोड़ने से पहले मेजबान देश में काम करने के लिये भेजा या बूलाया जाता हो.

देश का विशाल असंगठित क्षेत्र

भारत का असंगठित क्षेत्र मूलतः ग्रामीण आबादी से विकसित हुआ है और इसमें ज्यादातर वे लोग शामिल हैं जो गांवों में परंपरागत कार्य (खेती बाड़ी) करते हैं और शहरों में ये लोग अधिकतर खुदरा कारोबार, थोक कारोबार, विनिर्माण उद्योग, परिवहन, भंडारण और निर्माण उद्योग में काम करते हैं. इनमें अधिकतर ऐसे लोग है जो फसल की बुआई और कटाई के समय गांवों में चले जाते हैं और बाकी समय शहरों-महानगरों में काम करने के लिये आजीविका कि तलाश करते हैं.

भारत में लगभग 50 करोड़ का कार्यबल है, जिसका 90% हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है. इन उद्यमों में काम करने वाले श्रमिक वर्ष 1948 के फैक्टरी अधिनियम जैसे किसी कानून के अंतर्गत नहीं आते हैं.

अर्थव्यवस्था में कितनी है प्रवासी श्रमिकों की भूमिका

भारत में आंतरिक प्रवासन (Internal Migration) के तहत एक इलाके से दूसरे इलाके में जाने वाले श्रमिकों की आय देश की जीडीपी का लगभग 10 प्रतिशत है. ये श्रमिक इसका एक तिहाई यानी जीडीपी का लगभग दो प्रतिशत घर भेजते हैं. मौजूदा जीडीपी के हिसाब से यह राशि 6.5 लाख करोड़ रुपए के करीब है. यह राशि मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में भेजी जाती है.

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वर्ष 1991 से 2011 के बीच प्रवासन में 2.4 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई थी, तो वहीं वर्ष 2001 से 2011 के बीच इसकी वार्षिक वृद्धि दर 4.5 प्रतिशत रही. इन आंकड़ों से पता चलता है कि प्रवासन से श्रमिकों और उद्योगों दोनों को ही लाभ प्राप्त हुआ. श्रम गहन उद्योगों अर्थात ज्वैलरी, टेक्सटाइल, लेदर और ऑटोपार्ट्स सेक्टर में बड़ी तादाद में श्रमिक काम करते हैं.

रिवर्स माइग्रेशन के प्रभाव को सीमित करने के उपाय

रिवर्स माइग्रेशन के प्रभाव को सीमित करने के लिये पिछड़े राज्यों को छोटे और मध्यम उद्योगों जैसे- ग्रामीण और कुटीर उद्योग, हथकरघा, हस्तशिल्प तथा खाद्य प्रसंस्करण एवं कृषि उद्योगों का विकास करने की दिशा में प्रयास करना चाहिये.

हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे.

इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे..”

फैज अहमद फैज ने अपनी इस रचना के माध्यम से न केवल श्रमिक वर्ग को सम्मान दिलाया बल्कि उनके हक के लिये आवाज भी बुलंद की है.