रियासत से सियासत के मैदान में राजस्थान के राजघराने

नई दिल्ली. राजस्थान में राजशाही भले ही समाप्त हो चुकी है लेकिन वहां की राजनीति में पूर्व राजघरानों का दबदबा बना हुआ है. विधानसभा चुनाव हो या फिर लोकसभा चुनाव राजनीतिक पार्टियां हमेशा राजघरानों को महत्व देती रही हैं. राजस्थान की राजनीति में राज परिवारों की दखल उनकी रियासतों का भारत में विलय के समय से ही शुरू हो गई थी. देश में जब पहले लोकसभा चुनाव हुए तो राज परिवार के लोगों ने चुनावी राजनीति में प्रवेश करना शुरू कर दिया था. इस साल 7 दिसंबर को होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनावों में भी विभिन्न राजघरानों से जुड़े कई चेहरे बीजेपी, कांग्रेस या निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरेंगे.

वसुंधरा राजे के रूप में मिला करिश्माई नेतृत्व

राजस्थान की राजनीति में पूर्व राजघरानों का प्रभाव हमेशा से ही रहा है, मगर 70 के दशक में ये चमक थोड़ी फीकी पड़ गई थी. लेकिन पिछले 20 साल के दौरान ही राजस्थान की राजनीति के शीर्ष पर एक पूर्व राजपरिवार से जुड़ीं वसुंधरा राजे का दबदबा है. 1972 के तीन दशक बाद 2002 में महलों से वसुंधरा राजे के रूप में करिश्माई नेतृत्व निकला. राजे के नेतृत्व में भाजपा ने 2003 और फिर 2013 के चुनाव में बहुमत हासिल किया.

पूर्व राजमाता गायत्री देवी

अगर बात करें राजघरानों की पहली पसंद कौन सी पार्टी है तो, साफ हो जाता है कि प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियों में कांग्रेस की तुलना में भाजपा को पूर्व राजघराने ज्यादा पसंद हैं. जयपुर की पूर्व राजमाता गायत्री देवी से यह सिलसिला शुरू हुआ. इस लिस्ट में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, जयपुर की पूर्व प्रिंसेस दीया कुमारी और बीकानेर की पूर्व राजकुमारी सिद्धी कुमारी जैसे कई नाम शामिल हैं. कांग्रेस के पास अभी अलवर के जितेंद्र सिंह और कोटा के पूर्व सांसद इज्यराज सिंह प्रमुख चेहरा हैं, जो पूर्व राजघराने से हैं. पार्टियों को उनके परिवार की लोकप्रियता का लाभ मिलता है, जो संबंधित सीट के साथ ही उसके आसपास की सीटों पर भी नजर आता है.

जयपुर की पूर्व प्रिंसेस दीया कुमारी

राजस्थान की राजनीति का एक सच यह भी है कि पूर्व राजपरिवारों की राजनीतिक आस्था माहौल के मुताबिक बदलती रही है. आजादी के बाद पूर्व राजघराने कभी स्वतंत्र पार्टी के साथ रहे तो कभी जनसंघ और भाजपा के साथ रहे. पूर्व राजपरिवारों ने कांग्रेस को भी समर्थन दिया और पूर्व राजपरिवारों से जुड़े कई सदस्य संसद और विधानसभा में हाथ के निशान पर चुनाव जीतकर पहुंचे.

पहले आम चुनाव में ही राजघरानों ने दिखाई अपनी ताकत

आजादी के बाद वर्ष 1952 के पहले आम चुनावों से राजघरानों ने राजनीति में अपनी प्रभावशाली धमक दी. इसके बाद 1967 तक चार चुनावों में राजपरिवार के लोगों ने रामराज्य परिषद, जनसंघ और स्वतंत्र पार्टियों के जरिए कांग्रेस से टक्कर लेते रहे. 1967 के चुनावों में तो जयपुर की महारानी गायत्री देवी के नेतृत्व में स्वतंत्र पार्टी,जनसंघ और निर्दलीयों के मोर्चे ने कांग्रेस को लगभग सत्ता से बाहर ही कर दिया था. लेकिन बांग्लादेश निर्माण से देश में उभरे इंदिरा गांधी के करिश्मे की छाया में हुए 1972 के आम चुनावों ने राजस्थान में कांग्रेस की जड़ें मजबूत कर दी.

पूर्व राज-रानी सत्ता के गलियारों में मौजूदगी दर्ज कराते रहे लेकिन गायत्री देवी के राजनीति से किनारा कर लेने के बाद उनकी धमक कमजोर पड़ गई. अगर बात आंकड़ों की करें तो राजस्थान में अभी तक 70 से ज्यादा पूर्व राजा और जागीरदार अब तक विधायक चुने जा चुके हैं. वहीं 36 से ज्यादा राजे-रजवाड़े से जुड़े लोग सांसद बन चुके हैं.