बड़े स्तर पर NPA में बदल रहे हैं ग्रामीण भारत के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले स्वयं सहायता समूह के लोन

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नई दिल्ली. बैंकों द्वारा स्वयं सहायता समूहों (Self-Help Groups-SHGs) को दिया गया ऋण तेजी से गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (Non-Performing Assets-NPA) में बदल रहा है, इस समस्या को देखते हुए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राज्यों से जिलेवार NPAs की निगरानी करने और बकाया राशि की वसूली के लिये आवश्यक उपाय करने को कहा है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की समीक्षा की जा रही थी, इसी मिशन के तहत सरकार स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को बैंकों से जोड़कर उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करती है.

स्वयं सहायता समूहों में NPAs की समस्या

आंकड़े बताते हैं कि कुछ राज्यों में स्वयं सहायता समूहों (SHGs) द्वारा बैंकों से लिया गया 25% से अधिक ऋण गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) में परिवर्तित हो चुका है. मार्च के अंत तक देश भर के तकरीबन 54.57 लाख स्वयं सहायता समूहों (SHGs) पर 91,130 करोड़ रुपए बकाया थे, जिसमें से जिनमें से 2,168 करोड़ रुपए अर्थात् 2.37 प्रतिशत NPAs के रूप में परिवर्तित हो चुके हैं.

NPA में वृद्धि के कारण

स्वयं सहायता समूह के सदस्यों के बीच समन्वय का अभाव उस समूह के डिफॉल्टर होने का सबसे बड़ा कारण है. कई बार समूह के नेता बिना समूह को सूचित किये ऋण ले लेते हैं और ऋण चुकाने की उनकी असमर्थता पर पूरे समूह को डिफॉल्टर घोषित कर दिया जाता है. स्वयं सहायता समूह सरकार द्वारा ऋण माफी की घोषणा का इंतजार करते रहते हैं और प्रायः इस इंतजार में उनके द्वारा लिया गया NPA परिसंपत्ति में परिवर्तित हो जाता है.

स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को प्राय तब भी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, जब उनके परिवार के सदस्य कुछ विशिष्ट मामलों खासतौर पर वित्तीय मामलों में उनके साथ सहयोग नहीं करते हैं. प्राकृतिक आपदाएं जैसे- सूखा, अत्यधिक वर्षा, बाढ़, भूकंप आदि भी SHGs के बढ़ते NPA का एक कारण हो सकते हैं, क्योंकि इन प्राकृतिक आपदाओं के कारण ग्रामीणों की आय पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है और वे ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाते हैं.

स्वयं सहायता समूह का कितना है महत्त्व

आसान शब्दों में कहें तो स्वयं सहायता समूह कुछ ऐसे लोगों का एक अनौपचारिक संघ होता है जो अपनी रहन-सहन की परिस्थितियों में सुधार करने के लिये स्वैच्छा से एक साथ आते हैं. सामान्यतः एक ही सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों का ऐसा स्वैच्छिक संगठन स्वयं सहायता समूह कहलाता है, जिसके सदस्य एक-दूसरे के सहयोग के माध्यम से अपनी साझा समस्याओं का समाधान करते हैं.

SHG ग्रामीण भारत में दहेज और शराबबंदी जैसी प्रथाओं का मुकाबला करने के लिये सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करते हैं. SHG के गठन से समाज और परिवार में महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ है, जिससे उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है और महिलाओं के आत्मसम्मान में बढ़ोतरी हुई है.