दहेज व दो लाख 50 हजार रुपये ना दे सकने के कारण बेघर हुई पीड़िता शबनम

दहेज व दो लाख 50 हजार रुपये ना दे सकने के कारण बेघर हुई पीड़िता शबनम - Panchayat Times

कोडरमा/सिमरिया. प्रखण्ड के इचाक कला निवासी पीड़िता शबनम खातून माता खुजेजा खातून ने अपने पति सनफराज खान चतरा के ऊपर दहेज व नगद दो लाख 50 हजार रुपये मांगने के आरोप में महिला थाना व न्यायिक दंडाधिकारी चतरा में मुकदमा दायर 8 नवंबर 2016 को की थी.

इचाक कला निवासी पीड़िता शबनम उर्फ मुबेदा खातून की माँ खुजेजा खातून ने कही की वर्ष  21 जनवरी 2015 में मुस्लिम रीति रिवाज के साथ लाइन मुहल्ला चतरा निवासी सनफराज खान पिता लतीफ खान के साथ निकाह कि गयी थी.

शादी के महज नो माह बाद से पुत्री शबनम से दमाद सनफराज खान द्वारा दहेज और दो लाख 50 हजार रुपये की मांग करने लगा. गरीबी के कारण उनकी मांग पूरी करने में असमर्थ रही. अंत में  दमाद सनफराज ने भागलपुर के नरायन पुर के गुरदेव में बगैर बताए दुशरी शादी कर लिया. साथ हीं मारपीट करने लगा. थक हार कर महिला थाना चतरा में न्याय की गुहार लगाई. महिला थाना द्वारा न्याय नहीं कर सनफराज को बुला कर समझौता कर पुनः उसी घर में रहने का फरमान दिया गया. एक सप्ताह के अंदर हीं उसी तरह का मांग व मारपीट करने लगे. पुनः मारपीट व दो लाख 50 हजार रुपए मांग की शिकायत महिला थाना चतरा को दी. लेकिन अभियुक्त के ऊपर कार्रवाई ना कर उल्टे यह कहा गया की घर ले जाओ अन्यथा इन लोग आपकी पुत्री को जान से मार देगा. साथ हीं हमें अपने घर इचाक ले जाने की सलाह महिला थाना प्रभारी ने दे डाली. थक हार कर न्याय के लिए न्यायालय का शरण लिया.

मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी चतरा द्वारा कई बार गवाह व डेट देकर बुलाते रहे. साथ हीं अभियुक्त सनफराज के न्यायालय में हाजिर नहीं होने पर  नोटिस के जरिये कुर्की जब्ती भी निकाली गयी. लेकिन इसकी भी अभियुक्त पर कोई असर नहीं पड़. अंत में न्यायालय के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी चतरा द्वारा न्याय की बात पूछे जाने पर कहा कि जब अभियुक्त सनफराज न्यायालय नहीं आता है तो मैं क्या करूँ एसपी और थाना प्रभारी को जान मार दूं. जाओ गांव में बैठ कर तलाक ले लो. भुक्तभोगी महिला शबनम यह सुन काफी आहत हैं.

क्या कहती है शबनम

शबनम का कहना है कि शादी के नो माह बाद मैं एक पुत्री की जन्म दी थी. पुत्री की जन्म होने के बाद  पुत्र होने तथा चाहिए को लेकर हमें कई बार मारपीट पति द्वारा किया गया था. और कहा गया कि तुम पुत्र क्यों जन्म नहीं दी. साथ हीं रुपये व दहेज की मांग की जाने लगी. अत्यधिक अत्याचार होने पर अंत में मुकदमा किए आज पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी ना महिला थाना से न्याय मिल रहा है ना न्यायालय से कोई न्याय की आश लग रही है मैं गरीब हूँ ना मेरे पास रुपया है ना पहुंच है जिसके कारण दर दर की ठोकर खाने को मजबूर हूँ.

शबनम ने आगे कहा की मेरी एक चार वर्ष की पुत्री भी है. अब आत्महत्या के अलावे मेरे पास कोई और रास्ता नहीं बचा है.  गौर तलब है कि जिले में इस तरह की घटनाओं में सैकड़ो विवाहिताओं की जीवन दाव पर लगा है. दहेज के खातिर किसी हत्या की जा रही है, तो किसी को आग के हवाले कर मौत की नींद सुला दी जा रही है. कितने थाना व न्यायालय की चक्कर काटते काटते भुक्तभोगी महिलाओं की उम्र बुढापे में तब्दील हो जा रही रही है. आखिर कहां सो गई है समाज. क्या है न्याय व्यवस्था. कब तक इस तरह की उत्पीड़न को झेलती रहेगी बेकसूर व बेबस व लाचार जिंदगयां. इंशानियत क्या हमारी मर चुकी है.