तो क्या अपशकुन है झारखंड विधानसभा !

झारखंड विधानसभा तो क्या अपशकुन है झारखंड विधानसभा

नई दिल्ली. अपने गठन के 18 साल के इतिहास में झारखंड विधानसभा देश की शायद ऐसी पहली विधानसभा है जहां पर अस्थिरता से लेकर दल-बदल, मौत और विधायकों की सदस्यता जाने का सिलसिल जारी है. चार साल पहले दिसंबर 2014 में जब जब झारखंड की चौथी विधानसभा के लिए चुनाव हुए तो माना गया था कि इस बार राज्य में स्थिर सरकार बनेगी और आयाराम-गयाराम का सिलसिला रुकेगा लेकिन नतीजा उलट रहा.

राज्य में भले की इस दौरान बीजेपी की स्थिर सरकार चल रही है लेकिन तीन सालों के अंदर झारखंड विधानसभा के तीन सदस्यों की जहां अचानक से मौत हुई वहीं तीन विधायकों को अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी और तो और कुछ विधायकों को तो लंबे समय तक जेल की हवा खानी पड़ी. कुछ अभी भी जेल में बंद हैं. ऐसे में लोग झारखंड की चतुर्थ विधानसभा के कार्यकाल को अपशकुन करार दे रहे हैं.

हर्ट अटैक से तीन विधायकों का निधन :

चतुर्थ झारखंड विधानसभा में चुने गए सदस्यों के मुश्किल से तीन महीने ही हुए थे कि इसी बीच विधानसभा ने दो विधायकों को खो दिए. ऐसा पहली बार हुआ गोड्डा विधानसभा सीट से बीजेपी के विधायक रघुनंदन मंडल और पांकी विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक विदेश सिंह दोनों का निधन हर्ट अटैक से हुआ. वो भी रात में ही.

तीन जनवरी 2016 को जहां गोड्डा के विधायक रघुनंदन मंडल का निधन हुआ वहीं 28 मार्च 2016 को विदेश सिंह चल बसे. 17 जनवरी, 2017 को पाकुड़ जिले की लिट्टीपाड़ा विधानसभा से पहली बार झामुमो के टिकट पर जीत हासिल करने वाले 47 वर्षीय विधायक डॉ. अनिल मुर्मू का निधन हो गया था. उनकी मौत की वजह भी हृदयगति रुकना यानि हर्ट अटैक बताया गया था.

विधानसभा गठन के एक महीने के अंदर ही कमल किशोर भगत की चली गई सदस्यता:

आजसू पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और तेज-तर्रार नेता कमल किशोर भगत भी चतुर्थ झारखंड विधानसभा का एक महीना भी सुख नहीं ले पाए कि उनकी सदस्यता चली गई. लोहरदगा सीट से कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष सुखेदव भगत को दोबारा हराकर दूसरी बार विधायक बनने वाले कमल किशोर भगत की सदस्यता 26 जनवरी, 2015 को अदालत की तरफ से सात साल की सजा सुनाए जाने के बाद चली गई.

रांची के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. के.के. सिन्हा से रंगदारी मांगने, मारपीट और फायरिंग करने के 22 साल पुराने मामले में कमल किशोर भगत को रांची की निचली अदालत ने सात साल की सजा सुनाई थी. जिसके बाद से वह उनकी विधायकी चली गई और वह इस समय जेल में सजा काट रहे हैं.

कोयला चोरी के मामले में विधायक की गई सदस्यता:

इसी साल 31 जनवरी को झारखंड के रामगढ़ की अदालत ने गोमिया से झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक योगेन्द्र महतो को कोयला चोरी के आरोप में तीन साल की सजा सुनाई. जिसके बाद विधायक की विधानसभा सदस्यता चली गई. योगेन्द्र महतो पर रामगढ़ के रजरप्पा थाने में 2010 में कोयला चोरी के मामले में मुकदमा दर्ज हुआ था. जिसके बाद से मामला कोर्ट में चल रहा था.

अदालत ने विधायक को दोषी करार देते हुए तीन साल की सजा और पांच हजार जुर्माना लगाये जाने का ऐलान किया. नियम के अनुसार किसी भी विधायक या सांसद को दो साल या दो साल से ऊपर की सजा होने के बाद सदस्यता खत्म हो जाती है. इसके अलावे आने वाले छह सालों तक ऐसे लोग चुनाव भी नही लड़ सकते हैं.

जेएमएम विधायक अमित महतो को गंवानी पड़ी विधायकी:

चतुर्थ झारखंड विधानसभा के चुनाव में आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को सिल्ली विधानसभा सीट से हराकर सुर्खियों में आए झारखंड मुक्ति मोर्च के विधायक अमित महतो की भी विधायकी चली गई है. सोनाहातु के तत्कालीन सीओ आलोक कुमार से मारपीट मामले में रांची न्यायायुक्त दिवाकर पांडेय की कोर्ट ने 23 मार्च को विधायक अमित महतो सहित आठ दोषियों को दो साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई. जिसके बाद अमित महतो की विधायकी चली गई है.

डरे हुए हैं विधायक :

झारखंड की चौाथी विधानसभा की 81 सीटों के लिए दिसंबर 2014 में चुनाव हुए थे. इस चुनाव में किसी भी पार्टी को स्‍पष्‍ट बहुमत नहीं मिला था. बीजेपी 37 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी और चुनाव पूर्व अपनी सहयोगी आजसू की पांच सीटों की बदौलत सरकार बनाई थी. 8 जनवरी 2015 को बीजेपी के रघुवर दास राज्य के 10वें मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. 7 जनवरी 2015 को चतुर्थ झारखंड विधानसभा के सदस्तयों को शपथ दिलाई गई थी.

23 नवंबर 2000 झारखंड विधानसभा का हुआ था गठन :

बिहार से अलग होकर नए राज्यबने झारखंड में राज्य विधानसभा का गठन 23 नवंबर 2000 को किया था. बीते 18 सालों में 10 सरकारों की यह विधानसभा गवाह बन चुकी है. यह विधानसभा का चौथा कार्यकाल है. छह लोग इसके सभापति हो चुके हैं. मौजूदा समय में रघुवर दास जहां मुख्यमंत्री हैं वहीं बीजेपी के दिनेश उरांव विधानसभा स्पीकर हैं.

अगर तीसरे कार्यकाल को देखें, तो साल 2009 में झारखंड विधानसभा का चुनाव 27 नंवबर से लेकर 18 दिसंबर के बीच पांच चरणों में हुआ था. इसमें 23 दिसंबर को वोटों की काउंटिंग हुई थी. 25 दिसंबर को झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख शिबू सोरेन ने सरकार बनाने का दावा पेश किया था. 27 दिसंबर को गवर्नर ने शिबू सोरेन को सरकार बनाने का न्यौता दिया था. 30 दिसंबर को शिबू सोरेन ने राज्य के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी. इसके बाद टेकलाल महतो को प्रोटेम स्पीकर बनाया गया था. 6 जनवरी 2010 के प्रथम सेशन के दूसरे दिन सर्वसम्मति से रांची के विधायक चंद्रेश्वर प्रसाद सिंह (सीपी सिंह) को अध्यक्ष, यानी स्पीकर बनाया गया था. प्रोटेम स्पीकर टेकलाल महतो ने उनके चुने जाने की घोषणा की थी. सीपी सिंह झारखंड विधानसभा के सातवें अध्यक्ष थे.

झारखंड विधानसभा के गठन के बाद इंदर सिंह नामधारी 22 नवंबर 2000 से 29 मार्च 2004 तक स्पीकर रहे. इसके बाद 4 जून 2004 से 4 अगस्त 2004 तक भी वह स्पीकर रहे. इसके बाद मृगेन्द्र प्रतात सिंह 18 अगस्त 2004 से 11 जनवरी 2005 तक स्पीकर रहे. इसके बाद द्वितीय झारखंड विधानसभा का जब गठन हुआ, तो इंदर सिंह नामधारी दोबारा स्पीकर बने. नामधारी तीसरी बार 15 मार्च 2005 से 14 सितंबर 2006 तक भी विधानसभा स्पीकर बने. कांग्रेस के प्रदीप कुमार बलमुचू को 18 सितंबर 2006 से 20 अक्टूबर 2006 तक कार्यकारी विधानसभा स्पीकर बनने का सौभाग्य मिला. इसके बाद कांग्रेस के ही आलमगीर आलम 20 अक्टूबर 2006 से 26 दिसंबर 2009 तक झारखंड विधानसभा के स्पीकर रहे.

तीसरे कार्यकाल में दो लोग हुए स्पीकर : 

विधानसभ के तीसरे कार्यकाल में दो स्पीकर्स रहे. पहले चार साल तक सीपी सिंह रहे, उसके बाद जब बीजेपी-जेएमएम गठबंधन टूट गया तो जेएमए की सरकार बनने पर स्पीकर शशांक शेखर भोक्ता बने. इस कार्यकाल में विधानसभा ने बीजेपी, झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस का शासन देखा. पहले सीएम शिबू सोरेन रहे. इसके बाद 27 अप्रैल 2010 को लोकसभा में यूपीए सरकार के खिलाफ लोकसभा में आए अविश्वास प्रस्ताव में शिबू सोरेन ने यूपीए के पक्ष में मतदान किया था, जिसके बाद 28 अप्रैल को बीजेपी संसदीय बोर्ड ने जेएमएम सरकार से समर्थन वापस लेने का निर्णय लिया. जेएमएम ने सोरेन की गलती के लिए माफी मांगी थी. फिर 29 अप्रैल को बीजेपी ने जेएमएम सरकार से समर्थन वापस लेने फैसला टाला था.

18 मई को बीजेपी और जेएमएम के बीच बारी-बारी से सत्ता के बंटवारे पर सहमति बनी. फिर 20 मई को शिबू सोरेन ने एक बार फिर से यूपीए सरकार के पक्ष में मतदान किया था. 24 मई को बीजेपी ने सोरने सरकार से समर्थन वापस लिया था. 30 मई को शिबू सोरेन ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था. इसके बाद 1 जून से राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ था.

11 सितंबर 2011 को अर्जुन मुंडा बने सीएम

विधानसभा के तृतीय कार्यकाल में 7 सितंबर 2011 को बीजेपी के अर्जुन मुंडा ने सरकार बनाने का दावा पेश किया. 9 सितंबर को राज्य से राष्ट्रपति शासन हटा और 11 सितंबर 2011 को अर्जुन मुंडा ने झारखंड के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.

दो मुख्यमंत्रियों को देना पड़ा इस्तीफा:

झारखंड विधानसभा का यह कार्यकाल इसलिए भी याद किया जाएगा कि इस दौरान एक तरफ जहां दो मुख्यमंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा वहीं वहीं बाप-बेट को मुख्यमंत्री भी बनते देखा गया. इस कार्यकाल में जहां शिबू सोरेन और अर्जुन मुंडा ने इस्तीफा दिया, वहीं पहली बार ऐसा रहा कि जहां इस कार्यकाल में शिबू सोरेन मुख्यमंत्री रहे, वहीं उनके बेटे हेमंत सोरेन भी मुख्यमंत्री बने. इसके अलावा मैं एक और बात की विधानसभा गवाह बनी. इस तीसरे कार्यकाल में मैंने दो उपमुख्यमंत्री देखे. जब अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री थे, तब हेमंत सोरेन और आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो उपमुख्यमंत्री थे.

नौवें सीएम बने हेमंत सोरेन:

9 जुलाई 2013 को हेमंत सोरेन ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने दावा पेश किया था. 10 जुलाई 2013 को गवर्नर डॉ सैयद अहमद ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से राज्य से राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफारिश की थी. 11 जुलाई 2013 को राज्य से राष्ट्रपित शासन हटा था. 12 जुलाई को हेमंत सोरेन को सरकार बनाने का गवर्नर हाउस से न्यौता मिला था. 13 जुलाई 2013 को हेमंत सोरेन ने झारखंड के नौवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.

छह लोग बन चुके हैं अभी तक मुख्यमंत्री :

वर्ष 2000 में बिहार से अलग होकर बने झारखंड में अबतक छह लोग मुख्यमंत्री बन चुके हैं जिसमें से मौजूदा मुख्यमंत्री रघुबार दास हैं जो भारतीय जनता पार्टी से हैं, उनका शपथ ग्रहण 28 दिसंबर 2014 को हुआ था. राज्य गठन के बाद पहली बार बीजेपी के बाबूलाल मरांडी 15 नवंबर 2000 को राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने थे. उनका कार्यकल 17 मार्च 2003 तक था.

उसके बाद बीजेपी के अर्जुन मुंडा 18 मार्च 2003 से 1 मार्च 2005 तक मुख्यमंत्री रहे. उसके बाद जेएमएम के शिबू सोरेन 2 मार्च 2005 से लेकर 11 मार्च 2005 मुख्यमंत्री रहे. इसके बाद अर्जुन मुंडा 12 मार्च 2005 से लेकर 14 सितम्बर 2006 तक मुख्यमंत्री रहे. इसके बाद निर्दलीय मधु कोड़ा 18 सितंबर 2006 से लेकर 24 अगस्त 2008 तक मुख्यमंत्री रहे.

जेएमएम सुप्रीमो शिबू सोरेन एक बार फिर 27 अगस्त 2008 से लेकर 18 जनवरी 2009 तक मुख्यमंत्री रहे. शिबू सोरेन तीसरी बार 30 दिसम्बर 2009 से लेकर 31 मई 2010 तक मुख्यमंत्री रहे. इसके बाद बीजेपी के अर्जुन मुण्डा तीसरी बार 11 सितंबर 2010 से लेकर 18 जनवरी 2013 तक मुख्यमंत्री रहे. हेमंत सोरेन पहली बार 13 जुलाई 2013 से लेकर 23 दिसंबर 2014 तक मुख्यमंत्री रहे. चतुर्थ झारखंड विधानसभा के चुनाव परिणाम 24 दिसंबर 2014 को आने के बाद 28 दिसंबर 2014 से लेकर अभी तक बीजेपी के रघुवर दास झारखंड के मुख्यमंत्री हैं.