कभी हम नमक खरीदते थे, आज दुनिया को बेच रहे हैं, हिमाचल का बड़ा योगदान

नमक कभी हम नमक खरीदते थे, आज दुनिया को बेच रहे हैं

नई दिल्ली. नमक हममें से हर किसी के जीवन का अभिन्‍न हिस्‍सा है. भारतीय नमक उद्योग ने पिछले छह दशकों में तेजी से विकास किया है. आजादी के समय जहां हम नमक का आयात करते थे, वहीं आज 120 नमक उत्‍पादक देशों में से सालाना 24 मिलियन टन औसतन वार्षिक उत्‍पादन के साथ भारत तीसरे स्‍थान पर हैं. भारतीय नमक उद्योग घरेलू 18 मिलियन टन की आवश्‍यकता को पूरा करने के बाद 20 देशों को 5 मिलियन टन नमक का निर्यात करता है.

बंटवारे के समय पाकिस्तान में चला गया था नमक का पहाड़

अजादी के बाद देश में नमक की मांग के सामने पर्याप्त उत्पादन न होने पर भारत में लंबे समय तक नमक आयात किया जाता था. विभाजन के बाद पंजाब के विशाल सॉल्ट रोक्स तथा सिंध के समुद्री सॉल्ट वर्कस पाकिस्तान में चले जाने से परिस्थिति ओर भी खराब हुईं. 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के विभिन्न भागो में खाद्य नमक का तीव्र अभाव महसूस किया गया. नमक की अपर्याप्तता से उबरने के उपायो की जाँच एवं रिपोर्ट करने के लिये सरकार ने एच एम पटेल की अध्यक्षता में एक आंतर्विभागीय समिति गठित की जो उस समय केबिनेट सचिव थे.

70 प्रतिशत नमक समु्द्री पानी से बनता है

देश में बनने वाले कुल नमक का 70 प्रतिशत समुद्री पानी, 28 प्रतिशत भूमिगत समुद्री पानी से और शेष 2 प्रतिशत झीलों के जल/ नमक की चट्टानों से बनता है. भारत में सेंधा नमक का एक मात्र स्रोत हिमाचल प्रदेश में स्थित मंडी है. देश के कुल नमक उत्‍पादन में गुजरात, तमिलनाडु और राजस्‍थान की 96 प्रतिशत भागीदारी है. गुजरात कुल उत्‍पादन में 75 प्रतिशत, तमिलनाडु 11 प्रतिशत और राजस्‍थान 10 प्रतिशत का योगदान करते हैं. इसके अतिरिक्‍त अन्‍य राज्‍य जैसे आंध्र प्रदेश, महाराष्‍ट्र, ओडिशा, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, गोवा, हिमाचल प्रदेश, दीव और दमन में भी नमक का उत्‍पादन होता है.

कुल उत्‍पादन का 62 प्रतिशत बड़े नमक निर्माताओं, 28 प्रतिशत लघु निर्माताओं और शेष मध्‍यम स्‍तर के निर्माताओं द्वारा किया जाता है. ज्‍यादातर नमक का उत्‍पादन सिर्फ निजी क्षेत्र द्वारा किया जा रहा है. भारतीय नमक उद्योग ऑस्‍ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस और अमेरिका आदि के अधिक मशीनीकरण की तुलना में अधिक श्रमसाध्‍य तकनीकों का प्रयोग करता है. भारत आवश्‍यकता से अधिक उत्‍पादित औसतन 35 लाख टन नमक का निर्यात करता है. भारत से जापान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, उत्‍तरी कोरिया, मलेशिया, संयुक्‍त अरब अमीरात, वियतनाम और कतर आदि नमक का आयात करते है.

कुल नमक उत्‍पादन का लगभग 30 प्रतिशत मानव और पशुओं द्वारा उपयोग किया जाता है और यह विभिन्‍न बीमारियों से लड़ने के लिए जरूरी सूक्ष्‍म पोषक तत्‍वों का वाहक है. नमक कई रसायनिक उद्योगों में मूल तत्‍व के रूप में भी आवश्‍यक है. विश्‍व स्‍तर पर कुल उत्‍पादित नमक का 60 प्रतिशत रासायनिक उद्योग द्वारा कच्‍चे माल के रूप में इस्‍तेमाल किया जाता है. मुख्‍य तौर पर इसका इस्‍तेमाल क्‍लोरिन, कास्टिक सोडा और सोडा ऐश में किया जाता है, जहां इसका उपयोग विभिन्‍न प्रक्रियाओं जैसे ऑर्गेनिक सिंथेसि‍स, पॉलीमर, पेट्रो कैमिकल्‍स और पेट्रोलियम रिफाइनिंग आदि में किया जाता है. नमक का उपयोग डी-आईसिंग, पानी के शुद्धिकरण और कूलेंट जैसे प्रयोगों के लिए भी किया जाता है.

कभी नहीं समाप्त होगा नमक

समुद्र में नमक का अंश लगभग कभी समाप्‍त न होने वाला है. इसके अतिरिक्‍त प्रमुख नमक उत्‍पादक देशों में भी नमक का बड़ा भंडार है. नमक मुख्‍यत: तीन प्रकार से सेंधा नमक प्रत्‍यक्ष खनन से, बाकी नमक समुद्री जल को वाष्पित कर और समुद्री जल को सौर वाष्पित कर उत्‍पादित किया जाता है.

नमक जितना अधिक शुद्ध होता है उसका उतना ही अधिक मूल्‍य होता है. नमक में मैग्‍निशियम सॉल्‍ट की अशुद्धियों के कारण नमी के चलते नमक के टुकड़े बनने के साथ-साथ इसके परिवहन में यह अनचाहा बोझ भी बन जाता है. उदाहरण के लिए: यदि सड़क द्वारा 10 मिलियन टन नमक को भी कहीं भेजा जाएं और इसमें नमी 4 प्रतिशत के स्‍तर पर हो, तो हमें 40 हजार अतिरिक्‍त फेरे लगाने होंगे. इस प्रकार सूखे नमक से कार्बन फूट प्रिंट को कम करने में भी मदद मिलती है.

पिछले कई वर्षों में नमक के क्षेत्र में कई आविष्‍कार हुए है. वैज्ञानिक एवं उद्योगिक अनुसंधान परिषद के अंर्तगत केंद्रीय नमक एवं समुद्री रसायन अनुसंधान संस्‍थान नमक के अनुसंधान में कार्यरत एक प्रमुख संस्‍थान है, जिसने उच्‍च शुद्धता के नमक उत्‍पादन में कम खर्च वाली तकनीकों के विकास में सराहनीय योगदान दिया है.

भारतीय नमक उद्योग नमक उत्‍पादन के लिए अन्‍य देशों जैसे ऑस्‍ट्रेलिया और मैक्सिको की तुलना में नवीन प्रयोगों का इस्‍तेमाल नहीं करता है, जिससे निम्‍न श्रेणी का नमक उत्‍पादन होता है. इस प्रकार के अशुद्ध नमक की गुणवत्‍ता में सुधार के लिए यांत्रिक सफाई और अन्‍य रासायनिक उपचारों की आवश्‍यकता होती है. केंद्रीय नमक एवं समुद्री रसायन अनुसंधान संस्‍थान विभिन्‍न राज्‍य सरकारों और नमक विभाग के साथ नमक की गुणवत्‍ता सुधारने के लिए विभिन्‍न कार्यक्रम चला रहा है, जिसमें आदर्श नमक फार्म की स्‍थापना भी की जाती है, जो नमक निर्माताओं के लिए प्रदर्शन इकाई के रूप में प्रयोग होते है.

नमक निर्माण में यंत्रीकरण/ आधुनिकीकरण और विभिन्‍न उद्योगों के लवणीय अवशेषों के प्रयोग से नमक उत्‍पादकता में बढ़ोत्‍तरी होती है. इससे न सिर्फ उत्‍पादन में बढ़ोत्‍तरी बल्कि अवशेषों को समुद्र और अन्‍य स्‍थानों पर गिराने के दौरान पर्यावर‍णीय खतरों में भी कमी आती है. भारी वर्षा आदि के कारण नमक उत्‍पादन में भारी कमी आ सकती है. इस समस्‍या को यंत्रीकरण और नमक उत्‍पादन और स्‍वचलीकरण से दूर किया जा सकता है. नमक उत्‍पादन में यंत्रीकरण के द्वारा आवश्‍यक मानव संसाधन की कमी को दूर करने के साथ-साथ नमक की गुणवत्‍ता और उत्‍पादन सुधार में मदद मिलती है.

भारतीय नमक उद्योग वर्ष 2020 तक घरेलू 25 मिलियन टन की आवश्‍यकता और 10 मिलियन टन निर्यात करने के उद्देश्‍य के मद्देनजर 40 मिलियन टन उत्‍पादन का लक्ष्‍य प्राप्‍त करने का प्रयास कर रहा है.

नमक उत्पादन के विकास में केन्द्रीय नमक व समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान की बड़ी भूमिका

करीब 3500 मील का लंबा समुद्रतट, राजस्थान और गुजरात कच्छ के छोटे रण के अंतर्देशीय स्रोतों और मंडी में पत्थर नमक की खान के साथ, भारत नमक उत्पादन देश के रुप में विश्व में उच्च स्थान प्राप्त करने की संभावना रखता है. नमक भोजन का एक अनिवार्य अंग होने के अलावा नमक, सोडा एश, कास्टिक सोडा और क्लोरीन जैसे भारी रसायनों के लिये महत्वपूर्ण कच्चा माल भी है. मांस पैकिंग, मछली संसाधन, डेरी उत्पाद और फलों, सब्जियों की डिब्बाबंदी जैसी खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में नमक का उपयोग किया जाता है.

देश में नमक के लिए अनुसंधान की आवश्यकता को वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद्‌ (सीएसआइआर), नई दिल्ली ने महसूस किया और 1940 में डॉ एस एस भटनागर की ओर से नमक के उत्पादन और उसकी उपयोगिता पर अनुसंधान कार्यक्रम करने के लिए एक समिति गठित की गई. यह समिति बाद में भारी रसायन समिति के साथ मिल गई और जुलाई 1948 में डॉ माताप्रसाद की अध्यक्षता में पुनः शुरु की गई.

भारत सरकार को भारतीय नमक उद्योगों की नींव रखने के लिये आवश्यक उपायों संबंधी सलाह देने के लिये अप्रैल 1948 में भारत सरकार ने पी ए नारीयेलवाला की अध्यक्षता में एक नमक विशेषज्ञ समिति का गठन किया. भारत में कई सॉल्ट वर्कस की जाँच करने के बाद समिति ने निष्कर्ष दिया कि यदि नमक की गुणवत्ता में सुधार करना हो और सॉल्ट वर्कस को आर्थिक रुप से किफायती और कुशलता से चलाना है तो यह अत्यावश्यक होगा कि अन्वेषण पर अधिक ध्यान देना और लघु और बड़े पैमाने पर निर्माण के लिए प्रदर्शन इकाई के रुप में कार्य करने के लिये मुख्य नमक उत्पादन केन्द्रों पर मॉडल कारखानों का निर्माण करना.

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने केन्द्रीय नमक अनुसंधान संस्थान का किया था उद्‌घाटन

सितम्बर 1951 में निर्माण, उत्पादन तथा आपूर्ति मंत्रालय के तत्कालीन सचिव सी सी देसाई ने, सीएसआइआर के तत्वाधान में समुद्री नमक पर अनुसंधान कार्य करने और अंतर्देशीय झीलों तथा भूमिगत ब्राइन से नमक उत्पादन के लिये एक केन्द्रीय नमक अनुसंधान की स्थापना करने का प्रस्ताव रखा. इस तरह सौराष्ट्र के भावनगर में केन्द्रीय नमक अनुसंधान संस्थान (जो अब केन्द्रीय नमक व समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान के नाम से जाना जाता है।) का उद्‌घाटन 10 अप्रैल 1954 को, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नहेरु के करकमलों से किया गया.