धरती का बुखार बढ़ा, आसमान का भी मिजाज लाल है : विश्व पर्यावरण दिवस

प्रकृति के मूड को भांप पाना बेहद कठिन हो गया है - विश्व पर्यावरण दिवस

नई दिल्ली. देश में प्रचंड गर्मी पड़ रही है. पारा 45 डिग्री के पार जा रहा है. कहीं-कहीं तो 50 डिग्री पार कर गया है. अभी बारिश के लिए इंतजार करना होगा. लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि इस बरसात में इतना पानी सहेजा जा सके कि अगले बरसात तक का इंतजार फिर परेशानी भरा न हो. प्रकृति के मूड को भांप पाना बेहद कठिन हो गया है. मॉनसून को लेकर कितनी अटकलबाजियां कर दी जाएं पर हकीकत यही है कि वो बिगड़े नबाब-सा है. कहीं बाढ़ की तबाही तो कहीं सूखे का संकट. एक मौसम के दो चेहरे. लेकिन सच यही है. हकीकत में धरती और आसमान के साथ हुए अनगिनत और अनकहे अत्याचारों का खामियाजा है. नई पीढ़ी इससे नावाकिफ है. उनका कसूर भी क्या, क्योंकि जन्मते ही यही देखा है. वो अपने अभिभावकों की कारस्तानी देख जरूर रही है पर समझ शायद नहीं रही. सवाल यह भी कि भावी पीढ़ी को उनसे हो रहे इस फरेब की सच्चाई कौन बताएगा? दोषियों पर लगाम और व्यवस्था में सुधार कब होगा? भविष्य को हम वर्तमान के विकास के नाम का जहरीला वातावरण कब तक देंगे? बीमार धरती, प्रदूषण से हांफता आसमान, धरती की सूखती कोख, दम तोड़ती नदियां, पोखर, तालाब, मशीनों के आगे अस्तित्व खोते पहाड़ और मानव सभ्यता के नाम कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होती हरियाली. अगर यही विकास है तो वह दिन दूर नहीं जब यही विनाश में तब्दील होगा.

ये भी पढ़ें- हिमाचली तूफानों से कहीं भयंकर था फानी तूफान

सवाल बहुत आगे का है. इन हालातों में क्या भरोसा कि बारिश में गर्मी और गर्मी में ठण्ड होने लगे. दरअसल प्रकृति, उसमें भी धरती और आसमान के साथ कथित मानव सभ्यता के नाम पर हो रही बेइंतहा ज्यादती से जहां धरती का बुखार बढ़ रहा है, वहीं आसमान का भी मिजाज लाल हो रहा है. पानी खत्म हो रहा है. सहेजने के पारंपरिक तौर-तरीके नकारा हो चुके. नई सोच की रफ्तार बहुत धीमी है. पर्वतीय क्षेत्रों में जल संचय की अलग परेशानियां हैं तो सतही इलाकों में अलग. पहले ऐसा नहीं था. भरपूर जंगल थे, साफ-सुथरी नदियां थीं. तब न नदियों का सीना छलनी करने वाले, न पहाड़ों को नष्ट करने वाले और न जंगल को साफ कर पर्यावरण बिगाड़ने वाले माफिया थे. लगभग हर गांव के पोखर, तालाब और कुएं वहां की शान होते थे. पानी की कोई कमी नहीं थी. नदियों के किनारे हरियाली थी. बारहों महीने बहने वाले नाले थे. अब प्राकृतिक जलस्त्रोत दिन प्रतिदिन नष्ट हो रहे हैं अथवा किये जा रहे हैं. जहां धरती के गर्भ में बचे पानी को भी गहरे ट्यूबवेल से कदम-कदम पर निकालने की होड़ से धरती की कोख को भी सूखा करने से नहीं डर रहे हैं. वर्षा जल को सहेजने के लिए भी कोई अनिवार्य कोशिश नहीं हो रही है.

ग्रेजुएशन की डिग्री तभी मिलेगी जब उसने 10 पौधे लगाए हों

साफ हवा भी नसीब नहीं है. बड़े शहर वाहनों, कारखानों के प्रदूषण, कूड़ा-करकट के जलते धुएं तो गांव व कस्बे नरवाई, पराली जलने के अलावा साफ हो चुके जंगलों के कारण दूषित हवा व खत्म होती हरियाली के चलते अनियंत्रित हो रहे तापमान से हलाकान हैं. सबको पता है प्रकृति का प्रकोप कितना भारी पड़ता है. लेकिन दिख रही आपदा से कोई सचेत नहीं दिखता. साल दर साल जहां गर्मी का रिकॉर्ड टूट रहा है, वहीं बाढ़ की त्रासदी का हाल भी दिख जाता है. स्थिति अभी नियंत्रण से बाहर नहीं है, लेकिन सचेत कोई नहीं दिख रहा. क्या हम फिलीपीन्स मॉडल नहीं अपना सकते? जहां विद्यार्थी को ग्रेजुएशन की डिग्री तभी मिलेगी जब उसने 10 पौधे लगाए हों, जो सुरक्षित हों. फिलीपीन्स की सीनेट ने एक प्रस्ताव लाया है जिसका नाम ‘ग्रेजुएशन लिगेसी फॉर द एनवायरमेण्ट’ है, जो जल्द ही कानून बनेगा. स्कूल, कॉलेज तथा कृषि क्षेत्र के अलावा आम नागरिकों के लिए पालन जरूरी होगा. पौधों हेतु जमीन और हिफाजत की जवाबदेही सरकार की होगी. पेड़ों को लगाने, बचाने, बढ़ाने की जवाबदारी विद्यार्थियों की होगी.

पृथ्वी के भविष्य की चिन्ता का बोझ

क्या हम अपने विद्यार्थियों व युवा पीढ़ी को ऐसे दायित्व नहीं सौंप सकते वह भी तब जब सारी दुनिया में पृथ्वी को बचाने की कोशिश में युवाओं को आगे किया जा रहा है. पृथ्वी के भविष्य की चिन्ता का बोझ किसी पर तो डालना ही होगा. यदि ऐसा हुआ तो हर साल करोड़ों पौधे लगेंगे, पेड़ बनेंगे. इससे पूरे देश में हर जगह न केवल पर्यावरण में सुधरेगा बल्कि यह जिन्दगी का एक हिस्सा भी बनेगा. जनजागृति भी बढ़ेगी. इस एक कोशिश से बिगड़ते जलवायु परिवर्तन और भविष्य के सुधार का संदेश भी फैलेगा और हर कोई धरती, पानी और आसमान की नब्ज को करीब से समझेगा तथा उसे सुधारेगा. यह पर्यावरणीय सुधार क्रान्ति की पहल होगी जिसके परिणाम यकीनन सुखद होंगे. बस जरूरत है सरकारी इच्छा शक्ति की जो इसे कानूनी अनिवार्यता का अमली जामा पहनाए