भूमि अधिग्रहण और अनुच्छेद 300A: अनुमति के बिना नागरिकों से उनकी संपत्ति नही छीन सकता राज्य

भूमि अधिग्रहण और अनुच्छेद 300A: अनुमति के बिना नागरिकों से उनकी संपत्ति नही छीन सकता राज्य - Panchayat Times

नई दिल्ली. हाल ही में भूमि अधिग्रहण से संबंधित एक मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि “राज्य द्वारा उचित न्यायिक प्रक्रिया का पालन किये बिना नागरिकों को उनकी निजी संपत्ति से जबरन वंचित करना मानवाधिकार और संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत प्राप्त संवैधानिक अधिकार का भी उल्लंघन होगा.”

न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ के मुताबिक, कानून से शासित किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य कानून की अनुमति के बिना नागरिकों से उनकी संपत्ति नहीं छीन सकता. न्यायालय ने यह भी कहा कि कानून से संचालित कल्याणकारी सरकार होने के नाते सरकार संवैधानिक सीमा से परे नहीं जा सकती..

क्या है विद्या देवी बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार व अन्य’ का मामला जिसमें आया है यह महत्वपूर्ण फैसला

हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 1967-68 में सड़क निर्माण के दौरान विद्या देवी नामक एक निरक्षर महिला की जमीन बिना उसकी अनुमति के अधिगृहीत कर ली गई थी. उच्चतम न्यायालय ने ‘विद्या देवी बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार व अन्य’ मामले पर सुनवाई करते हुए विवादित जमीन पर पूर्ण स्वामित्व के लिये हिमाचल प्रदेश सरकार के कब्जे के तर्क को नकार दिया. साथ ही न्यायालय ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह महिला को 8 सप्ताह के भीतर मुआवजा और अन्य कानूनी लाभ प्रदान करें.

क्या है भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013

इस अधिनियम को “भूमि अर्जन, पुनरुद्धार, पुनर्वासन में उचित पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013” नाम से भी जाना जाता है.

सहमति की अनिवार्यता: इस अधिनियम के माध्यम से भू-मालिकों के हितों की रक्षा के लिये यह प्रावधान किया गया कि भूमि अधिग्रहण में निजी क्षेत्र की परियोजनाओं के लिये कम-से-कम 80% और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership- PPP) परियोजना में भूमि अधिग्रहण के लिये कम-से-कम 70% भू-मालिकों की सहमति को अनिवार्य कर दिया गया.

भूमि अधिग्रहण की सीमा- भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बहु-फसलीय कृषि भूमि के अधिग्रहण को प्रोत्साहित नहीं करता है. इस अधिनियम के अनुसार, बहु-फसलीय कृषि भूमि का अधिग्रहण केवल विशेष परिस्थितियों में और एक सीमा तक ही किया जा सकता है.

मुआवजा और पुनर्वास – अधिनियम में ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि के अधिग्रहण के लिये बाज़ार मूल्य का चार गुना तथा शहरी क्षेत्र में बाज़ार मूल्य से दोगुनी कीमत अदा करने की व्यवस्था की गई. साथ ही अधिनियम के अनुसार, यदि 1 वर्ष के अंदर लाभार्थियों को मुआवजे की राशि नहीं प्रदान की जाती है तो अधिग्रहण की प्रक्रिया रद्द हो जाएगी इसके साथ ही भूमि अधिग्रहण से प्रभावित अन्य लोगों जैसे- कृषि मजदूर, व्यापारी आदि के पुनर्वास के लिये उपयुक्त मदद प्रदान करने की व्यवस्था की गई है .

विवाद निवारण तंत्र – अधिनियम के अनुसार, भूमि अधिग्रहण से संबंधित विवादों के समाधान के लिये अधिनियम की धारा 15 के तहत कलेक्टर द्वारा सभी विवादों का निपटारा एक निर्धारित समय सीमा के अंदर किया जाएगा. भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी होने के 60 दिनों के अंदर कोई भी व्यक्ति किसी आपत्ति अथवा विवाद के संदर्भ में संबंधित कलेक्टर को लिखित शिकायत दे सकता है.

आपातकालीन परिस्थितियों में – अधिनियम में आपात की परिस्थितियों (जैसे-राष्ट्रीय सुरक्षा, प्राकृतिक आपदा आदि) में सरकार को भूमि अधिग्रहण करने के लिये विशेष अधिकार प्रदान किये गए हैं, जिसके अनुसार आपात की स्थिति में सरकार संसद की मंज़ूरी से आवश्यकतानुसार भूमि अधिग्रहण कर सकती है.

भूमि उपयोग की समय-सीमा – भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 में भू-मालिकों के प्रति सरकार के उत्तरदायित्व को निर्धारित करने और अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने के लिये भूमि के उपयोग के संबंध में समय-सीमा का निर्धारण किया गया है.

अधिनियम के अनुसार, यदि भूमि के अधिग्रहण के बाद 5 वर्षों के अंदर सरकार या संबंधित कंपनी द्वारा उसका उपयोग नहीं किया जाता है. तो उसका अधिकार भू-मालिक को पुनः वापस कर दिया जाएगा. इसके साथ ही यदि पुराने अधिनियम के अनुसार, अधिगृहीत भूमि पर 5 वर्षों तक कार्य नहीं शुरू होता है, तो भूमि के पुनः अधिग्रहण के लिये नए अधिनियम के अनुसार मुआवजा देना होगा.