नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यूज़र-जेनरेटेड कंटेंट (User-Generated Content) को नियंत्रित करने के लिए एक “प्रभावी” तंत्र बनाने और एक स्वतंत्र, मजबूत निगरानी निकाय की आवश्यकता पर जोर दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार सप्ताह के भीतर सार्वजनिक परामर्श के बाद दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया।
कानून का खालीपन और जिम्मेदारी की कमी
CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची ने कहा: खुद की प्लेटफॉर्म पर भी कोई जवाबदेही नहीं
कोर्ट ने कहा कि नियम किसी की स्वतंत्रता को दबाने के लिए नहीं हैं, बल्कि एक “छाननी” (sieve) का काम करेंगे। न्यायाधीशों ने कहा कि “यह बहुत अजीब है कि मैं अपना प्लेटफॉर्म और चैनल बनाता हूँ, लेकिन इसमें कोई जवाबदेही नहीं है। ऐसे कंटेंट के साथ जिम्मेदारी होना जरूरी है।”
कंटेंट मॉडरेशन में मौलिक चुनौतियाँ
YouTube, पॉडकास्ट और ऑडियो-विज़ुअल प्लेटफॉर्म पर गैरकानूनी कंटेंट रोकना मुश्किल
कोर्ट ने कहा कि तकनीकी कंपनियों और सरकारी प्राधिकरणों दोनों के लिए अनुचित या अपमानजनक सामग्री को रोकना कठिन है, विशेषकर वीडियो और पॉडकास्ट प्लेटफॉर्म्स पर।
मामला: पोडकास्टर रणवीर गौतम अल्लाभड़िया
YouTube शो “India’s Got Latent” पर अश्लील टिप्पणी का विवाद
यह केस पोडकास्टर रणवीर गौतम अल्लाभड़िया की याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने YouTube शो में अपनी अश्लील टिप्पणियों के चलते दर्ज कई मामलों से सुरक्षा मांगी थी। मार्च में कोर्ट ने केंद्र को ऐसे अश्लील और अपमानजनक भाषण को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने को कहा था।
आयु सत्यापन और संवेदनशील कंटेंट
Aadhaar आधारित गेटिंग और एक लाइन चेतावनी पर्याप्त नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अश्लील और संवेदनशील सामग्री दिखाने से पहले मजबूत आयु सत्यापन प्रणाली होनी चाहिए। CJI सूर्यकांत ने कहा, “एक लाइन की चेतावनी के बाद वीडियो शुरू — जब व्यक्ति चेतावनी समझे, तब तक कंटेंट पहले से ही दिखाई जा चुका होता है। जिम्मेदार समाज बनाइए और ज्यादातर समस्याएं हल हो जाएंगी।”
सरकार के नोट में शामिल प्रमुख बदलाव
IT नियम 2021 के कोड ऑफ एथिक्स में संशोधन और AI/Deepfake पर दिशानिर्देश
अटॉर्नी जनरल R वेंकटरमणि ने मंत्रालय की नोट प्रस्तुत की, जिसमें ऑनलाइन सामग्री के लिए अलग दिशानिर्देश, अश्लीलता, AI और Deepfakes पर नियम शामिल हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार यूज़र-जेनरेटेड कंटेंट पर कार्रवाई करने की आवश्यकता को पहचानती है।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर त्वरित कार्रवाई का कठिनाई
48-72 घंटे में हटाने के बाद भी कंटेंट वायरल हो जाता है
कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट का समय पर टेडडाउन करना चुनौतीपूर्ण है। “48 या 72 घंटे में आदेश होने तक कंटेंट वायरल हो चुका होता है। इसे रोकने के लिए कैसे तंत्र बनाएं?”
स्व-नियामक निकायों पर कोर्ट का सवाल
स्वतंत्र और प्रभावी मॉनिटरिंग बॉडी की जरूरत
वरिष्ठ वकील अमित सिबल ने OTT प्लेटफॉर्म्स की ओर से चिंता जताई कि दिशा-निर्देश डिजिटल कंटेंट को भी प्रभावित करेंगे। कोर्ट ने कहा कि स्व-निर्मित निकाय प्रभावी नहीं हो सकते, इसलिए एक स्वतंत्र और निर्भीक संगठन होना चाहिए।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवेदनशील सामग्री में संतुलन
प्रवृत्तियों को रोकने के लिए दिशा-निर्देश पर ट्रायल आधारित लागू किया जाएगा
कोर्ट ने कहा कि दिशा-निर्देश किसी की आवाज़ दबाने के लिए नहीं, बल्कि जिम्मेदार और सुरक्षित ऑनलाइन समाज बनाने के लिए हैं। यदि कोई प्रावधान दमनकारी साबित होता है, तो उसकी मंजूरी रोकी जाएगी।
केंद्र के प्रस्ताव में कंटेंट वर्गीकरण
U, U/A और A रेटिंग के आधार पर आयु सत्यापन
केंद्र ने प्रस्ताव रखा है कि ऑनलाइन कंटेंट को चार श्रेणियों में बांटा जाए —
U: सभी उम्र के लिए उपयुक्त
U/A: तीन श्रेणियाँ (7 साल से कम, 7-13 साल, 16 साल से अधिक)
A: केवल वयस्कों के लिए
वयस्क सामग्री के लिए Aadhaar या PAN आधारित आयु सत्यापन और स्पष्ट डिस्क्लेमर अनिवार्य किया जाएगा। अधिकार और जिम्मेदारी का संतुलन, बच्चों और समाज की सुरक्षा जरूरी कोर्ट ने कहा, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन बच्चों और समाज की गरिमा का अधिकार भी संरक्षित होना चाहिए। तकनीक ने यूज़र्स को बेहद शक्तिशाली बना दिया है, इसलिए जिम्मेदारी जरूरी है।”
