नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 5 दिसंबर को ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा कि मंदिरों की निधि ‘पवित्र’ है और उसे आर्थिक संकट में फंसे किसी भी कोऑपरेटिव बैंक को बचाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यह फैसला तब आया जब कई कोऑपरेटिव बैंकों ने केरल हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील की, जिसमें उन्हें थिरुनेली मंदिर देवास्वम की परिपक्व हो चुकी फिक्स्ड डिपॉजिट राशि लौटाने का निर्देश दिया गया था।
केस की पृष्ठभूमि
विवाद तब शुरू हुआ जब थिरुनेली मंदिर देवास्वम ने अपनी मैच्योर फिक्स्ड डिपॉजिट राशि वापस मांगी, लेकिन कई कोऑपरेटिव बैंक लगातार देरी करते रहे और पैसा देने से बचते रहे। इसके बाद, केरल हाईकोर्ट ने पाँच बैंकों — जिनमें Thirunelly Service Cooperative Bank Ltd, Mananthawady Co-operative Urban Society Ltd शामिल हैं — को दो महीने के भीतर पूरी राशि लौटाने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान बैंकों की मंशा पर सवाल उठाए।
बेंच ने टिप्पणी की आप मंदिर का पैसा बैंक बचाने के लिए उपयोग करना चाहते हैं? यह धनराशि देवता की होती है और इसे मंदिर की भलाई के लिए ही उपयोग किया जाना चाहिए।
“जो बैंक मुश्किल में हैं, उन्हें पहले अपनी साख और वित्तीय क्षमता सुधारनी चाहिए, न कि धार्मिक संस्थाओं की निधि पर निर्भर होना चाहिए।”
आदेश और अगला कदम
सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों की अपील खारिज कर दी, लेकिन उन्हें राहत देते हुए इतना कहा कि वे हाईकोर्ट से समय सीमा बढ़ाने का अनुरोध कर सकते हैं।
फैसले का महत्व
यह निर्णय:
मंदिर निधि के धार्मिक और कानूनी संरक्षण को मजबूत करता है
बैंकों पर जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता बढ़ाता है
यह सुनिश्चित करता है कि धार्मिक धनजन कल्याण और धार्मिक उद्देश्यों में ही उपयोग हो
