हिमाचल में जल रहे जंगल के ऊंट

हिमाचल में जल रहे जंगल के ऊंट

हमीरपुर. तीन साल से प्रदेश के जंगल बेतहाशा दहक रहे हैं. सीमेंट कंपनियों ने चीड़ की पत्तियां खरीदने से मुंह फेर लिया है. इस सूरत में गर्मियों में जंगल बचाने को हो रहे प्रयास नाकाफी हैं. आखिर क्यों सीमेंट कंपनियां चीड़ की पत्तियां खरीदने में रुचि नहीं दिखा रहीं. करीब तीन साल पहले कंपनियां चीड़ की पत्तियां खरीद रही थीं. इस तरह आगजनी की घटनाएं भी कम थी. अब हर साल आगजनी की अधिक घटनाएं हो रही हैं. कोई भी जंगल आग की मार से अछूता नहीं है. करोड़ों रुपए की वन संपदा राख हो रही है.

चीड़ की पत्तियां खरीदना कंपनियों को महंगा पड़ रहा है. पहले भी वन विभाग ने सीमेंट कंपनी से चीड़ की पत्तियां खरीदने का आग्रह किया था. वन विभाग व कंपनी में बात भी बन गई थी. ठीक मौके पर कंपनी चीड़ की पत्तियां खरीदने से मुकर गई. ऐसे में वर्ष 2018 भी अग्निकांड से वन संपदा को गहरे जख्म दे गया. चीड़ जिसे जंगल का ऊंट कहा जाता है, वह बहुत उपयोगी भी है लेकिन आग आगजनी के कारण हिमाचल में चीड़ के पेड़ों पर संकट मंडरा रहा है.

हालांकि जल्द शुरू हुई बरसात ने वन संपदा में हुए नुकसान की कुछ हद तक भरपाई जरूर की है, लेकिन हर साल जंगलों में बढ़ रही आगजनी की घटनाएं चिंता का विषय बनी हुई हैं. कई लोग अच्छी घास होने का भ्रम मन में पाले हुए हैं। ये लोग जानबूझ कर जंगल में आग लगा देते हैं और बाद में आग बेकाबू हो जाती है. कुछ वर्ष तक कंपनियां लगातार जंगलों से चीड़ की पत्तियां एकत्रित कर ले जाती रहीं. करीब तीन वर्ष पहले कंपनियों ने पत्तियां खरीदने में असमर्थता जाहिर कर दी. हालांकि वन विभाग नार्मल रेट पर पत्तियां कंपनी को बेचता है. बावजूद इसके कंपनियों ने पत्तियां नहीं खरीदीं.

रोजगार का साधन भी बन सकती हैं चीड़ की पत्तियां 

वर्ष 2018 में वन विभाग ने सीमेंट कंपनी से करार किया था. कंपनी ने भी वनों से चीड़ की पत्तियां ले जाने पर सहमति जताई. आखिर में कंपनी मुकर गई.नतीजतन वर्ष 2018 में जंगल क्षेत्र में सैकड़ों आगजनी की घटनाएं हुईं. इसमें करोड़ों रुपए की वन संपदा स्वाह हो गई. जीव-जंतु भी आग की भेंट चढ़ गए. भविष्य में भी इस समस्या का समाधान होता नहीं दिख रहा.