नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में लगातार गहराते संकट और उसके भारत पर संभावित असर को देखते हुए केंद्र सरकार ने 25 मार्च को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। इस बैठक में क्षेत्रीय तनाव, वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहे असर तथा भारत की तैयारियों पर चर्चा होने की संभावना है। यह बैठक ऐसे समय बुलाई गई है, जब होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले समुद्री मार्गों में व्यवधान की खबरों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ी हुई है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की
मंगलवार को इससे पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें देश की सुरक्षा तैयारी और क्षेत्रीय हालात का आकलन किया गया। बैठक में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह, थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी और डीआरडीओ अध्यक्ष समीर कामत सहित शीर्ष रक्षा अधिकारी मौजूद रहे।
पश्चिम एशिया का यह संघर्ष अब चौथे सप्ताह में पहुंच चुका है
पश्चिम एशिया का यह संघर्ष अब चौथे सप्ताह में पहुंच चुका है। संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष रखा। मंगलवार को राज्यसभा में और इससे पहले लोकसभा में उन्होंने कहा कि सरकार मौजूदा संकट के असर से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत लगातार क्षेत्र के देशों के संपर्क में है और ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार तथा भारतीय हितों की सुरक्षा पर नजर बनाए हुए है।
प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में साफ कहा कि भारत का रुख शुरू से स्पष्ट रहा है और उसने तनाव कम करने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि भारत ने लोगों, परिवहन और ऊर्जा संरचनाओं पर हमलों का विरोध किया है। साथ ही, व्यावसायिक जहाजों पर हमले और होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट को अस्वीकार्य बताया।
सरकार से विस्तृत जानकारी देने की मांग की
उधर, इस मुद्दे पर विपक्ष ने भी सरकार से विस्तृत जानकारी देने की मांग की है। सर्वदलीय बैठक को इसी राजनीतिक और रणनीतिक दबाव के बीच एक अहम कदम माना जा रहा है। बैठक में विभिन्न दलों को मौजूदा हालात, भारत की कूटनीतिक पहल, ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा तैयारियों पर जानकारी दी जा सकती है।
पश्चिम एशिया में हालात इसलिए और संवेदनशील बने हुए हैं क्योंकि संघर्ष का असर सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार, और वैश्विक बाजारों पर पड़ रहा है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह संकट आर्थिक और रणनीतिक, दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि केंद्र सरकार राजनीतिक दलों को विश्वास में लेकर आगे की रणनीति तय करना चाहती है।
