झारखंड: कोयले की रानी रमणिका गुप्ता का निधन

रमणिका गुप्ता का 89 वर्ष की आयु में नई दिल्ली के अपोलो अस्पताल में निधन - Panchayat Times
रमणिका गुप्ता

हजारीबाग. जिला हजारीबाग में कोयले की रानी एवं गोमिया में पानी की रानी के नाम से मशहूर विधायक और लेखिका रमणिका गुप्ता का 89 वर्ष की आयु में नई दिल्ली के अपोलो अस्पताल में निधन हो गया. मंगलवार को दोपहर तीन बजे उन्होंने अस्पताल में दम तोड़ा. वो हमेशा हजारीबाग के लोगों की यादों में रहेंगी. पंजाब के सुनाम में 22.04.1930 में जन्मी रमणिका गुप्ता ने अपनी राजनीतिक पारी तत्कालीन बिहार के धनबाद से शुरू की. सन 1968 में वे धनबाद कांग्रेस की महिला समिति से जुड़ी और उसके बाद उन्होंने राजनीति में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. इन्होंने मजदूरों के आंदोलन को अपना हथियार बनाया और राजनीति में विधानसभा और विधान परिषद का प्रतिनिधित्व किया.

सबसे पहले तत्कालीन गिरिडीह जिला के गोमिया के खुदगड्डा में मजदूरों की पानी समस्या से वे काफी दुखी हुईं और इस आंदोलन का नेतृत्व किया. पानी की समस्या के समाधान के लिए लगातार किए गए संघर्षों के कारण इन्हें तब पानी की रानी की संज्ञा दी गई. बताया जाता है कि यहां से इन्होंने इंटक से जुड़कर मजदूरों के आंदोलन को गति देने का काम किया. उन्होंने केदला, लइयो, झारखंड जैसी कोलियरियों में कोयला मजदूरों की लड़ाई लड़ने का काम किया. इनके आंदोलन का तब कोल खदानों के ठेकेदारों पर इस प्रकार का प्रभाव पड़ा कि उन लोगों ने तो रमणिका गुप्ता की हत्या करवाने की योजना बनवाई. सीपीएम के जिला सचिव गणेश कुमार सिटू एवं रमणिका गुप्ता के साथ रहने वाले तत्कालीन नेता और अब छायाकार अर्जुन सोनी बताते हैं कि ठेकेदारों के इशारों पर गुंडों ने रमणिका गुप्ता की खटिया से बांधकर पिटाई की. उन्हें मरा हुआ जानकर बेहोशी की हालत में छोड़ दिया गया था. मजदूरों ने उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया और लगभग एक सप्ताह के बाद उन्हें होश आया था.

इस घटना से आंदोलित मजदूरों एवं कोयल खदान के ठेकेदारों के बीच खूनी संघर्ष हुआ और दर्जनों लोग घायल हुए थे. यह मामला कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण की पूर्व की बताई गई है. अपने संघर्षों के कारण 1974 से 77 तक रमणिका गुप्ता को हजारीबाग जिला कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. बाद में वे राम मनोहर लोहिया के सामाजिक आंदोलन से जुड़ीं और लोकदल में आ गईं. 1980 में हुए विधानसभा चुनाव में इन्होंने मांडू विधानसभा में कांग्रेस के तापेश्वर देव को शिकस्त दी. 1985 तक वे मांडू से विधायक रहीं. 1985 में हुए विधानसभा चुनाव में वे मांडू से ही गोपाल शरण सिंह के हाथों पराजित हुईं.

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बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री केदार पांडेय ने इनके संघर्षों को देखते हुए इन्हें विधान परिषद के लिए नामित कर भेजा. इसके बाद उन्होंने राजनीति छोड़कर लेखन की दुनिया में कदम रखा. वे वामपंथी विचार धारा से जुड़कर सीपीएम के साथ रहीं. रमणिका गुप्ता बाद में हिन्द मजदूर किसान पंचायत (अध्यक्ष जाॅर्ज फर्नाडीज) से लंबे समय तक जुड़ी रहीं.

18 पुस्तकों का लेखन और संपादन किया
लेखन के क्षेत्र में रमणिका गुप्ता ने लंबा समय बिताया. उन्होंने डेढ़ दर्जन पुस्तकों का लेखन किया और करीब 17 पुस्तकों का संपादन किया. युद्धरत आम आदमी पत्रिका का उन्होंने बतौर संपादक कार्य देखा. रमणिका गुप्ता ने भीड़ सतर में चलने लगे, तुम कौन, तिल तिल नूतन नामक कविता पुस्तक की रचना की. इन्होंने कहानी संग्रह बहूजुठाई का लेखन किया. मजदूरों के नेताओं पर आधारित दो उपन्यास सीता और मौसी का लेखन भी इनके द्वारा किया गया. कहानी संग्रह आपहुदरी का भी लेखन इनके द्वारा किया गया. कलम और कुदाल के बहाने नामक गद्य की रचना भी इन्होंने की.

केदला लाने की है अंतिम इच्छा
कोलियरी क्षेत्रों में मजदूरों के आंदोलन के कारण कोयले की रानी के रूप में चर्चित रमणिका गुप्ता ने निधन से पूर्व अपनी इच्छा लिख छोड़ा है. जानकारों का कहना है कि उनकी इच्छा अपने कर्म क्षेत्र केदला में ही अंतिम संस्कार किए जाने की थी. इसी को देखते हुए उनके नजदीकी सीपीएम के जिला सचिव गणेश कुमार सिटू एवं पत्रकार अर्जुन सोनी ने कहा कि रमणिका गुप्ता के दोनों पुत्रों उमंग, तरंग एवं पुत्री शिवा सिब्बल के विदेश से लौटने की प्रतीक्षा की जा रही है. परिजनों के अनुसार ही अंतिम संस्कार होने की बात कही जा रही है.

विश्वविद्यालय में पांच लाख की पुस्तकें दान दीं
विनोबा भावे विश्वविद्यालय में रमणिका गुप्ता ने दो साल पहले करीब पांच लाख की पुस्तकों को दान में दिया. इसको लेकर विश्वविद्यालय में कार्यक्रम किए गए और रमणिका फाउंडेशन का कक्ष विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में बनाया गया.

शोषितों की आवाज खो गयी: भुवनेश्वर मेहता
भाकपा के राज्य सचिव एवं पूर्व सांसद भुवनेश्वर प्रसाद मेहता ने भी रमणिका गुप्ता के निधन पर शोक जताया है. उन्होंने कहा कि उनके जाने से शोषितों की आवाज खो गई है. वह लड़ाकू महिला थीं. मजदूरों-किसानों के लिए लगातार उन्होंने संघर्ष किया. साहित्य के माध्यम से आदिवासी, दलित, पिछड़ों के लिए इन्होंने काफी कुछ लिखा है. इनके जाने से वाम विचार धारा के साथ-साथ साहित्य को भी बड़ा नुकसान पहुंचा है.

सदर विधायक ने जताया गहरा दुःख
अपने समय की प्रखर वक्ता, सामाजिक मुद्दों पर संघर्ष करने वाली नेत्री और लेखिका रमणिका गुप्ता के निधन पर सदर विधायक मनीष जायसवाल ने गहरा दुःख जताया है. उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति की कामना की. विधायक जायसवाल ने कहा कि रमणिका गुप्ता बहुमुखी प्रतिभा की धनी थीं. प्रखर व्यक्तित्व, जुझारू और संघर्षशील कृतित्व के कारण वे हमेशा लोगों के दिलों में रहेंगी.