पलामू का एक विद्यालय जिसकी साफ-सफाई और सुंदरता को नीति आयोग से लेकर प्रधानमंत्री तक ने सराहा

पलामू का एक विद्यालय जिसकी साफ-सफाई और सुंदरता को नीति आयोग से लेकर प्रधानमंत्री तक ने सराहा - Panchayat Times

पलामू. सतबरवा प्रखंड के दुलसुलमा गांव स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय इन दिनों साफ-सफाई और सुंदरता को लेकर काफी चर्चा में है. पिछले दिनों भारत सरकार के नीति आयोग ने स्कूल की फोटोज को अपने ऑफिशियल ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट कीं. इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाइक किया. स्कूल में साफ-सफाई के संदेश देते बोर्ड हैं तो फूल-पौधे से भी परिसर गुलजार है. स्कूल में नल, बिजली, शौचालय, दिव्यांग बच्चों के लिए अलग शौचालय और पुस्तकालय तक की व्यवस्था है. इसका श्रेय स्कूल की प्रभारी प्रधानाध्यापिका अनिता भेंगरा को दिया जाता है.

भेंगरा ने बताया कि इस स्कूल में वह 5 नवंबर 1999 से योगदान दे रही हैं. उस वक्त स्कूल की स्थिति काफी खराब थी. चारों ओर गंदगी पसरी रहती थी. उन्होंने मन बनाया और साफ-सफाई शुरू की. इसमें वो खुद भी लगीं और बच्चों कोभी साफ-सफाई के प्रति जागरूक किया. धीरे-धीरे स्कूल की स्थिति काफी अच्छी हो गई. आज इस क्षेत्र के प्राइवेट स्कूल को छोड़कर बच्चे यहां पढ़ने आ रहे हैं.

पहले नहीं था पढ़ाई का माहौल, विरोध करते थे गांव वाले

भेंगरा के अनुसार, शुरुआत में स्कूल संचालन में यहां काफी समस्या आई. ग्रामीण तक विरोध करते थे. पढ़ाई का बिल्कुल भी माहौल नहीं था. लेकिन, स्कूल के तत्कालीन प्रधानाध्यापक मृत्युंजय पाठक ने सपोर्ट किया. जब वह खुदस्कूल की प्रभारी प्रधानाध्यापिका बनी तब तक माहौल काफी अनुकूल हो गया. बच्चों को उन्होंने साफ-सफाई, पौधरोपण और उनकी देखभाल करने का संस्कार दिया. भेंगरा बच्चों को पढ़ाई के साथ ही अन्य एक्टिविटीज़में भी हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करती हैं. उनकी बेटी कीबोर्ड प्ले करती है. जब स्कूल में बच्चों को गीत-संगीत सिखाना होता है तो बेटी वहां पहुंचकर कीबोर्ड भीप्ले करती हैं.

शिक्षिका ने पहले स्थानीय भाषा सीखी, फिर बच्चों को शिक्षा के लिए किया प्रोत्साहित

भेंगरा ने बताया कि दुलसूलमा गांव आदिवासी बहुल्य क्षेत्र हैं. ज्यादातर लोग मजदूर औरकिसान हैं. शुरुआत में बच्चे यहां पढ़ाई करने के लिए तैयार नहीं थे. पर, अनिता ने बच्चों और उनके पैरेंट्स को पढ़ाई का महत्व समझाया और स्कूल भेजने का आग्रह किया. वहबताती हैं कि बच्चे हिन्दी तक ठीक से नहीं समझ पाते थे. केवल स्थानीय भाषा ही समझते थे. ऐसे में उन्होंने पहले स्थानीय भाषा सीखी फिर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. अब इस स्कूल में करीब 170 बच्चे पढ़ाई करते हैं.

स्कूल में चार टीचर, बच्चों के साथ मिलकर करते हैं साफ-सफाई

यहां 1 से 8 क्लास तक की पढ़ाई होती है. स्कूल में कुल चार टीचर हैं. साफ-सफाई के लिए कोई अलग स्टाफ नहीं है. स्कूल के टीचर और बच्चे ही मिलकर पूरे स्कूल परिसर में साफ-सफाई करते हैं. स्कूल में मैदान नहीं है. ऐसे में उन्होंने योजना बनाई है कि गांव में एक मैदान है, जिसे बच्चों के खेलने के लिए यूज किया जाए. स्कूल के दो टीचर सप्ताह में एक दिन बच्चों को वहां लेकर जाएंगे और उन्हें वहां स्पोर्टस एक्टिविटी करवाई जाएगी.