पत्थरों से इंसान गढ़ने वाले ने बनाई है विवेकानंद की मूर्ति

पत्थरों से इंसान गढ़ने वाले ने बनाया है रांची में स्वामी विवेकानंद की मूर्ति-Panchayat Times

रांची. झारखंड की राजधानी रांची की उपलब्धि में आज एक नया अध्याय जुड़ जाएगा, जब युवा दिवस के अवसर पर रांची के बड़ा तालाब में बनाई गई स्वामी विवेकानंद की आदमकद प्रतिमा का मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अनावरण किया. कांसे और स्टील से इस प्रतिमा को गढ़ने वाले मूर्तिकार राम वनजी सुतार भी इस अवसर पर मौजूद रहे. जिनके खाते में भी आज एक नई उपलब्धि दर्ज हो गई. पिछले साल 31 अक्टूबर 2018 को दुनिया की सबसे ऊंची स्टेचू ऑफ़ यूनिटी भारत के संस्थापक सरदार वल्लभभाई पटेल की जिस मूर्ति का उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था, उस मूर्ति को बनाने में भी राम वनजी सुतार का योगदान है.

बड़ा तालाब के बीच में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा लगाने के लिए वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने शिलान्यास किया था. विवेकानंद की इस प्रतिमा को बनाने में 17 करोड़ से ज्यादा रुपए खर्च हुए हैं. इस मूर्ति को बनाने में छह टन कांसा और दो टन स्टील लगा है. इस मूर्ति को नोएडा में की राम सुतार आर्ट क्रिएशन प्राइवेट लिमिटेड के स्टूडियो में तैयार किया गया. फिर वहां से इसको तीन पार्ट में रांची लाकर आपस में जोड़कर खड़ा किया गया.

फोटो, साभार इंटरनेट

94 साल की उम्र में भी गढ़ रहे महान लोगों की मूर्तियां

देश-दुनिया में एक शिल्पकार के रूप में विख्यात राम वनजी सुतार 94 वर्ष की आयु में भी अपने कला-कर्म के प्रति निष्ठावान हैं. अपने बेटे अनिल राम सुतार के साथ मिलकर वह आज भी मूर्तियां गढ़ रहे हैं. उन्होंने कई महापुरुषों की बहुत विशाल मूर्तियां बनाई हैं और उनके माध्यम से बहुत नाम कमाया है. उनके द्वारा बनाई गई महात्मा गांधी की प्रतिमा अब तक विश्व के 300 से अधिक शहरों में लग चुकी है. इस उम्र में भी राम वनजी सुतार हर दिन आठ से दस घंटे कार्य करते हैं. राम सुतार के कलात्मक शिल्प साधना को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1999 में पद्म श्री और 2016 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया.

फोटो साभार, ऑफिशियल फेसबुक पेज राम वनजी सुतार

महाराष्ट्र के धूलिया से दिल्ली का सफर

राम वनजी सुतार का जन्म 19 फ़रवरी 1925 को महाराष्ट्र में धूलिया ज़िले के गोन्दुर गांव में एक ग़रीब परिवार परिवार में हुआ. उनके पिता वनजी हंसराज जाति व कर्म से बढ़ई थे. राम सुतार का विवाह 1952 में प्रमिला के साथ हुआ. जिनसे उन्हें 1957 में एकमात्र पुत्र अनिल राम सुतार हुआ, जो पेशे से वास्तुकार हैं परन्तु अब वह भी नोएडा स्थित अपने पिता के स्टूडियो व कार्यशाला की देखरेख का कार्य करते हैं.

देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के साथ राम वनजी सुतार

मुंबई के प्रसिद्ध जे.जे.स्कूल ऑफ़ आर्ट से सीखी मूर्तिकला

राम वनजी सुतार अपने गुरु रामकृष्ण जोशी से प्रेरणा लेकर बम्बई (वर्तमान मुम्बई) गए, जहां उन्होंने जे.जे.स्कूल ऑफ़ आर्ट में दाखिला लिया. 1953 में इसी स्कूल से मॉडलिंग में उन्होंने सर्वोच्च अंक अर्जित करते हुए मेयो गोल्ड मेडल हासिल किया. मॉडलर के रूप में औरंगाबाद के आर्कियोलोजी विभाग में रहते हुए राम सुतार ने 1954 से 1958 तक अजन्ता और एलोरा की प्राचीन गुफ़ाओं में मूर्तियों के पुनर्स्थापन का कार्य किया. 1958-1959 में वह सूचना व प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के दृश्य श्रव्य विभाग में तकनीकी सहायक भी रहे. 1959 में उन्होंने अपनी मर्जी से सरकारी नौकरी त्याग दी और पेशेवर मूर्तिकार बन गए. आजकल वह अपने परिवार के साथ नोएडा में रहते हैं.

फोटो साभार, ऑफिशियल फेसबुक पेज राम वनजी सुतार
फोटो साभार, ऑफिशियल फेसबुक पेज राम वनजी सुतार

उपलब्धियों से भरा है जीवन

वैसे तो राम वनजी सुतार ने बहुत सी मूर्तियां बनाई हैं लेकिन उसमें से कुछ खास मूर्तियां पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं. जिसमें मध्य प्रदेश के गंगासागर बांध पर 45 फुट ऊची चम्बल देवी की मूर्ति, अमृतसर में 21 फुट ऊंची महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति, नई दिल्ली के संसद भवन में 18 फुट ऊंची सरदार बल्लभ भाई पटेल की मूर्ति, गुजरात के गांधीनगर में 17 फुट ऊंची महात्मा गांधी की मूर्ति, जम्मू में 9 फुट ऊंची भीमराव अम्बेडकर की मूर्ति प्रमुख हैं.