विश्‍व रक्तदाता दिवस: ” दुनिया को लाल रंग में रंगना है ”

नई दिल्ली. हमारे देश में जितने रक्त की जरुरत है उसके मुकाबले काफी कम रक्त उपलब्ध है. देश में हर रोज लगभग चार करोड़ यूनिट खून की जरुरत होती है लेकिन उपलब्धता मात्र 40 लाख यूनिट ही है. इसका मतलब जितने खून की जरुरत है उसके मुकाबले उपलब्धता मात्र 10 फीसदी ही है. ऐसे में विश्‍व रक्तदाता दिवस के अवसर पर खून की इस कमी को पूरा करने का संकल्प लेने की जरुरत है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्‍ल्‍यूएचओ), रेड क्रॉस और रेड क्रीसेंट सोसायटियों के अंतरराष्‍ट्रीय महासंघ ने 2004 में विश्व रक्तदाता दिवस (डब्‍ल्‍यूबीडीडी) की शुरूआत की है. यह हर साल 14 जून को मनाया जाता है.

विश्‍व रक्तदाता दिवस उन गुमनाम नायकों का उत्सव है जो लाखों रोगियों के जीवन को सीधे तौर पर बचाने या इसमें सुधार लाने के प्रति जिम्मेदार हैं. मूल रूप से कहें तो यह आमलोगों, खासकर युवाओं के लिए एक जरूरी निमंत्रण है कि वे एक जिम्मेदारी भरा विकल्प चुनने के साथ एक स्वस्थ जीवन शैली बनाए रखें और नियमित रूप से रक्त दें.

रक्त और रक्त उत्पादों की सुरक्षित और संरक्षित आपूर्ति की जरूरत सार्वभौमिक है. दुनिया भर में हर साल दूसरों की जान बचाने और स्वास्थ्य में सुधार के लिए कम से कम नौ करोड़ यूनिट रक्त दान किया जाता है. हालांकि फिर भी, रक्ताधान के लिए रक्त की मांग में लगातार वृद्धि जारी है और कई देश मौजूदा मांग को पूरा नहीं कर सकते हैं. कई क्षेत्रों में तो इस कारण प्रसव में हुए रक्‍तस्राव और रक्‍ताल्‍पता आदि के मामले में भी पर्याप्त रक्‍त आपूर्ति नहीं हो पाती है.

प्रसव में अत्‍यधिक रक्‍तस्राव उच्‍च मातृ मृत्यु दर का एक प्रमुख कारण है और रक्ताल्पता मलेरिया या कुपोषण वाले बच्चों की जान पर हमेशा खतरा पैदा करता है. रूटीन और आपातकालीन शल्‍य क्रियाओं में हर जगह रक्त और रक्त उत्पादों की जरूरत पड़ती है. इनमें बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं में घायल और जन्मजात रक्त विकारों के इलाज, लोगों के ईलाज के लिए जीवन रक्षक उपचार सहित अन्‍य चिकित्‍सा कार्य शामिल हैं.

विश्वभर के 70 से अधिक देशों में रक्तदान की दर आमतौर पर उस स्‍तर ( कुल जनसंख्‍या के कम से कम एक प्रतिशत संख्‍या में रक्‍तदाता ) से नीचे है जो संबद्ध देश में रक्‍त की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक माना जाता है. इन देशों में उन्नत स्वास्थ्य सुविधा प्रणालियों के कारण रक्‍तदान की मांग अधिक है. यहां तक कि उच्च रक्‍तदान दरों वाले देश भी परिष्कृत चिकित्सा प्रणाली और शल्यचिकित्सा की प्रक्रियाओं में लगातार आ रही तेजी के कारण रक्त की मांग की पूर्ति के लिए पर्याप्‍त रक्‍तभंडार बनाये रखने में संघर्ष करने पर मजबूर होते हैं.

सुरक्षित और पर्याप्त रक्त की आपूर्ति के लिए निशुल्‍क स्वैच्छिक रक्तदाताओं द्वारा नियमित रूप से रक्‍तदान ही आधार का काम करता है. इसके अलावा, इस बात के सबूत मिले हैं कि स्वैच्छिक रक्‍तदाताओं को एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी आदि के संक्रमण का खतरा परिजनों या विनिमय द्वारा होने वाले रक्‍तदान और विशेष रूप से भुगतान कर किये जाने वाले रक्‍ताधान की तुलना में कम रहता है.

आज 57 देशों में 100 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान होता है. 2002 में ऐसे देशों की संख्‍या 39 थी. विश्व रक्त दाता दिवस के आयोजन का पैमाना हर साल बढ़ता जा रहा है. “दुनिया को लाल रंग में रँगना है” दुनिया आज स्वैच्छिक रक्तदाताओं को उनके अपने समुदाय के प्रति किये गये अमूल्य योगदान के लिए सलाम करती है.

सुरक्षित रक्त की पर्याप्त आपूर्ति का आधार ऐसे स्वस्थ स्वैच्छिक रक्‍त दाताओं का एक पूल तैयार करना है, जो वित्तीय या अन्य भुगतान के बिना नियमित रूप से रक्त देने के लिए तैयार रहें. अनुसंधानों में पता चला है कि ऐसे रक्‍तदाता जो भुगतान की उम्मीद के बिना अपनी स्वतंत्र इच्छा से खून देने को तैयार रहें, वे सबसे ‘सुरक्षित’ दाताओं में हैं. हालांकि, हाल में डब्‍ल्‍यूएचओ के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि 178 देशों में से केवल 39 प्रतिशत देशों में शतप्रतिशत स्वैच्छिक रक्‍तदान बिना किसी भुगतान के संपन्‍न होता है.

निम्न और मध्यम मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) वाले 89 प्रतिशत देश रक्‍ताधान के लिए मरीजों के परिजनों या विनिमय व्‍यवस्‍था के तहत दान पर निर्भर हैं (जहां रोगी के परिवार का एक सदस्य रक्‍ताधान के लिए रोगी को रक्त देता है) या फिर भुगतान के बदले रक्‍ताधान संपन्‍न हो पाता है.