देवभूमि हिमाचल में होगी विश्व के सबसे महंगे मसाले की खेती

शिमला. केसर की खेती के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध कश्मीर के साथ ही अब देवभूमि हिमाचल में भी केसर की खेती की तैयारी हो रही है. केंद्र सरकार के खादी बोर्ड के सदस्य डॉ. विक्रम शर्मा ने इसके लिए पहल की है. उन्होंने कहा कि उन्होंने काफी शोध के बाद नतीजा निकाला है कि हिमाचल भी केसर की खेती के लिए उपयुक्त है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केसर की खेती बंजर जमीन पर भी की जाती है.

ऐसे में न केवल हिमाचल के किसानों की आर्थिकी में लाभ होगा बल्कि वह आत्मनिर्भर भी हो पाएंगे. केसर के लिए प्रदेश के कई इलाके उपयुक्त हैं, जिनमें सिरमौर के रेणुकाजी, शिलाई, मंडी के चच्योट, करसोग और बालीचौकी में केसर की खेती अच्छी हो सकती है.

बाज़ार में तीन से साढ़े तीन लाख रुपये किलो बिकता है केसर : 

केसर विश्व का सबसे कीमती पौधा है. केसर की खेती भारत में जम्मू के किश्तवाड़ और जन्नत-ए-कश्मीर के पामपुर (पंपोर) के सीमित क्षेत्रों में अधिक की जाती है. केसर यहां के लोगों के लिए वरदान है क्योंकि केसर के फूलों से निकाला जाता सोने जैसा कीमती केसर जिसकी कीमत बाज़ार में तीन से साढ़े तीन लाख रुपये किलो है. परंतु कुछ राजनीतिक कारणों से आज उसकी खेती बुरी तरह प्रभावित है. यहां की केसर हल्की, पतली, लाल रंग वाली, कमल की तरह सुन्दर गंधयुक्त होती है. असली केसर बहुत महंगी होती है. कश्मीरी मोंगरा सर्वोत्तम मानी गई है. एक समय था जब कश्मीर का केसर विश्व बाज़ार में श्रेष्ठतम माना जाता था.

भारतीय मसाला बोर्ड की वेबसाइट के अनुसार दुनिया का सबसे महंगा मसाला केसर क्रोकस सैटिवस पौधे के सूखे वर्तिकाग्र से प्राप्त किया जाता है. यह एक प्रकन्दीय, चिरस्थाई पौधा है जिसके गसेलाकार घनकंद, और 15-20 से.मी. ऊँचाई होती है. इसके परागोद्भव (प्रफुल्लन) में 6 से 10 पत्ते होते है. 2.5-3.2 से.मी. की वर्तिका शाखाएँ और 3.5-5 से. मी. परिदल पुंज फांक वाले नीलक बैंगनी रंग के एक या दो फूल खिलते हैं. पीली वर्तिका तीन शाखाओं में गहरी-विभाजित रहती है और वर्तिकाग्र चमकीले लाल होते हैं. फूल घनकंद से सीधे उग आते हैं.

केसर दक्षिण यूरोप का वासी है और मेडिट्टरेनियन देशों में खासकर स्पेन, ऑस्ट्रिया, फ्रांस, इंगलैंड, तुर्की और ईरान में इसकी खेती की जाती है. केसर उपोष्णीय जलवायु में अच्छी तरह पनपता है. केसर का प्रयोग पकवान को बघारने एवं कुटीर पनीर, चिकन एवं माँस, चावल, सलाद का मसाला, मद्य एवं कोर्डियल में रंग देने के लिए किया जाता है. विशिष्ट ब्रेड, केक, मिष्ठान्नों, मुगल पकवानों में भी इसका प्रयोग होता है. प्रसाधनों में भी एक इत्र के रूप में केसर प्रयुक्त होता है. विभिन्न बीमारियों को दूर करने के लिए औषधि के रूप में भी केसर का उपयोग करते हैं.

देश में घट रही है केसर की खेती:

वैज्ञानिकों के अनुसार केसर की देश में सालाना मांग सौ टन के करीब है, जबकि देश में पैदावार मात्र चार टन के लगभग है. कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, केसर उत्पादन 2017-18 के फसल वर्ष (जुलाई- जून) में 9.12 टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष 28.64 टन के करीब हुआ था. इसमें कहा गया है कि फसलों के बढ़ने के महत्वपूर्ण चरण में शुष्क मौसम के कारण उत्पादन में कमी आने की उम्मीद है. बाढ़ के कारण फसल वर्ष 2014-15 में केसर उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित हुआ था और मात्र 8.51 टन का ही उत्पादन हुआ था.

कृषि मंत्रालय के अनुसार, भारतीय केसर में उच्च गुणवत्ता वाले सक्रिय अवयवों जैसे कि क्रोकिन, पिक्रोकोकिन और सफ्रनल की मौजूदगी की वजह से वैश्विक बाजारों में भारतीय केसर की मांग बढ़ी है. राष्ट्रीय केसर मिशन के तहत केसर खेती के साथ ही इसके निर्यात को बढ़ावा दिया जा रहा है. इसके बावजूद कश्मीर घाटी के किसानों की सांसें फूली हुई हैं. इसका कारण यह है कि घाटी में लम्बे समय से सूखे जैसी स्थिति बनी हुई है जिसके चलते केसर के उत्पादन में 95 प्रतिशत तक गिरावट आ गई है.

कम वर्षा के कारण प्रदेश में केसर का उत्पादन गत 50 वर्षों के न्यूनतम स्तर तक पहुंच गया है. ऐसे समाचार मिल रहे हैं कि किसान केसर की खेती छोड़ कर सेब, अखरोट और लहसुन जैसी अधिक सघन फसलों की खेती करने पर विचार कर रहे हैं.