फिर चिपको आंदोलन की जरुरत है

चिपको आंदोलन फिर चिपको आंदोलन की जरुरत है

नई दिल्ली. खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने हाल ही में अनुमान लगाया है कि हर वर्ष 1.3 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र कटाई की वजह से खत्म हो रहा है. पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से वनक्षेत्र घटकर 30 प्रतिशत रह गया है, ऐसे समय में चिपको आंदोलन की एक बार फिर जरुरत है. चिपको आन्दोलन एक पर्यावरण रक्षा का आन्दोलन था. यह भारत के उत्तराखण्ड राज्य (तब उत्तर प्रदेश का भाग) में किसानो ने वृक्षों की कटाई का विरोध करने के लिए 26 मार्च 1973 को पेड़ों की कटाई रोकने के लिए शुरू हआ था. चिपका आंदोलन का अर्थ है कि पेड़ों को बचाने के लिए पेड़ों से चिपक कर जान दे देना, लेकिन पेड़ों को काटने नहीं देना.

रैंणी गांव से हुई थी शुरुआत :

तत्कालीन उत्तर प्रदेश और अब के उत्तराखंड के चमोली जिले के रैंणी गांव के जंगल के लगभग ढाई हजार पेड़ों को काटने की नीलीमी हई, तो गौरा देवी और उनके 21 साथियों ने ठेकेदरों को पेड़ काटने से मना किया. इसके बाद भी जब वह लोग नहीं माने तो यह सारी महिलाएं पेड़ों से चिपककर पेड़ काटने वालों को ललकारा कि पहले हमें काटो फिर पेड़ों को भी काट लेना. ऐसे में पेड़ काटने आए ठेकेदारों को हार मानना पड़ा. यहीं से चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई. पर्यावरण बचाने का यह अहिंसक आंदोनल स्व: स्फूर्त था. इसके बाद लोग अपने आप इससे जुड़ते चले गए. इस आंदोलन का नेतृत्व भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा, चण्डीप्रसाद भट्ट और गौरादेवी ने किया.

” क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार ”

चिपको आंदोलन देश में पर्यावरण की रक्षा और पेड़ों को कटने से बचाने के लिए मील का पत्थर साबित हुआ. इस आंदोलन का घोषवाक्य है- क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार, मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार. ने लोगों के दिल में जगह बना लिया. आंदोलन की सफलता को देखते हुए सन 1987 में इस आन्दोलन को सम्यक जीविका पुरस्कार (Right Livelihood Award) से सम्मानित किया गया था.

इस आंदोलन की मुख्य उपलब्धि ये रही कि इसने केंद्रीय राजनीति के एजेंडे में पर्यावरण को एक सघन मुद्दा बना दिया था. चिपको के सहभागी तथा कुमांऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉ.शेखर पाठक के अनुसार, “भारत में 1980 का वन संरक्षण अधिनियम और यहां तक कि केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्रालय का गठन भी चिपको की वजह से ही संभव हो पाया. ”

इस आन्दोलन ने 1980 में तब एक बड़ी जीत हासिल की, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रदेश के हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए रोक लगा दी. बाद के वर्षों में यह आन्दोलन पूर्व में बिहार, पश्चिम में राजस्थान, उत्तर में हिमाचल प्रदेश, दक्षिण में कर्नाटक और मध्य भारत में विंध्य तक फैला गया था.

उत्तर प्रदेश में प्रतिबंध के अलावा यह आन्दोलन पश्चिमी घाट और विंध्य पर्वतमाला में वृक्षों की कटाई को रोकने में सफल रहा. साथ ही यह लोगों की आवश्यकताओं और पर्यावरण के प्रति अधिक सचेत प्राकृतिक संसाधन नीति के लिए दबाब बनाने में भी सफल रहा.

चिपको आंदोलन की नायिक गौरा देवी :

चिपको आंदोलन की नायिका गौरा देवी अंतर्राष्ट्रीय जगत में ‘‘चिपको वूमन’’ नाम से प्रसिद्ध गौरा देवी ने चिपको आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. नंदा देवी के अन्तिम गांव लाटा में गौरा देवी का जन्म 1925 के आस पास हुआ. 12 वर्ष की आयु में रैंणी के मेहरबान सिंह से उनका विवाह हुआ था. 22 साल की उम्र में वह विधवा हो गईं थी. अपने ढाई साल के एकमात्र पुत्र और बूढ़े सास-ससुर की देखभाल के लिए उन्हें अत्यंत कष्ट झेलने पड़े. गौरा ने पुत्र चन्द्र सिंह को स्वावलम्बी बनाया जब तिब्बत भारत व्यापार बंद हुआ तब चन्द्र सिंह ने छोटी-मोटी ठेकेदारी ऊनी कारोबार तथा मजदूरी द्वारा आजीविका चला. इसी बीच पुत्र विवाह, परिवार तथा नाती पोतों के दायित्व को भी गौरा देवी ने निभाया. अपने गांव से बाहर भी वह हर कार्य के लिये सदैव सेवारत रहीं.

1970 की अलकनंदा की बाढ़ ने नयी पर्यावरणीय सोच को जन्म दिया. चंडी प्रसाद भट्ट ने गोपेश्वर, जिला चमोली में कार्यरत संस्था ‘‘दशौली ग्राम स्वराज्य मंडल’’ के स्वयं सेवकों को बाढ़ सुरक्षा कार्य करने के साथ-साथ बाढ़ आने के कारणों को भी समझाया. भारत-चीन युद्ध के दौरान बढ़ते मोटर मार्ग के बिछते जालों से पर्यावरणीय समस्याएं अधिक हुईं, अतः बाढ़ से प्रभावित लोगों में संवेदनशील पहाड़ों के प्रति चेतना जागी.

1972 में गौरा देवी महिला मंगल दल की अध्यक्षा बनी. नवम्बर 1973 और उसके बाद गोबिन्द सिंह रावत, चण्डी प्रसाद भट्ट, वासवानंद नौटियाल, हयात सिंह तथा कई छात्र उस क्षेत्र में आए. आस पास के गांवो तथा रैणी में सभाएं हुईं. जनवरी 1974 में रैंणी के जंगल के 2451 पेड़ों की बोली लगने वाली थी. नीलामी देहरादून में थी. वहां चण्डी प्रसाद भट्ट ठेकेदार को अपनी बात कह कर आए कि उसे आंदोलन का सामना करना पड़ेगा. इसके बाद 26 मार्च को उन्होंने महिलाओं को लेकिर चिपको आंदोलन की शरुआत की.

4 जुलाई, 1991 में गौरा देवी का निधन हो गया लेकिन गौरा देवी आज भले ही इस संसार में नही है, लेकिन वह हर महिला के अन्दर जीवित हैं, गौरा देवी के प्रयत्नों का ही फल था कि गांव-गांव ‘‘चिपको आंदोलन’’ फैला और अन्तर्राष्ट्रीय हो गया.

पर्यावरण का अथक सिपाही चंडीप्रसाद भट्ट:

चंडीप्रसाद भट्ट भारत के गांधीवादी पर्यावरणवादी और समाजिक कार्यकर्ता हैं. उन्होने सन् १९६४ में गोपेश्वर में ‘दशोली ग्राम स्वराज्य संघ’ की स्थापना की जो कालान्तर में चिपको आंदोलन की मातृ-संस्था बनी. वे इस कार्य के लिये वे 1982 में रेमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित हुए तथा वर्ष 2005 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण पुरस्कार दिया गया.

भारत सरकार ने साल 2013 में उन्हें गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया. अद्भुत जीवट को समर्पित चंडी प्रसाद भट्ट गांधी के विचार को व्यावहारिक रूप में आगे बढ़ाने में एक सफल जन नेता के रूप में उभरे हैं. ‘चिपको आंदोलन’ के रूप में सौम्यतम अहिंसक प्रतिकार के द्वारा वृक्षों एवं पर्यावरण के अंतर्संबंधों को सशक्तता से उभार कर उन्होंने संपूर्ण विश्व को जहां एक ओर पर्यावरण के प्रति सचेत एवं संवेदनशील बनाने का अभिनव प्रयोग किया, ‘पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती’ चंडी प्रसाद भट्ट की बेहतरीन यात्राओं का संग्रह है.

23 जून 1934 को निर्जला एकादशी के दिन गोपेश्वर गांव (जिला चमोली) उत्तराखंड के एक गरीब परिवार में जन्मे चंडी प्रसाद भट्ट सातवें दशक के प्रारंभ में सर्वोदयी विचार-धारा के संपर्क में आए और जयप्रकाश नारायण तथा विनोबा भावे को आदर्श बनाकर अपने क्षेत्र में श्रम की प्रतिष्ठा सामाजिक समरसता, नशाबंदी और महिलाओं-दलितों को सशक्तीकऱण के द्वारा आगे बढ़ाने के काम में जुट गए. वनों का विनाश रोकने के लिए ग्रामवासियों को संगठित कर 1973 से चिपको आंदोलन आरंभ कर वनों का कटान रुकवाया.

चिपको आन्दोलन के प्रणेता सुन्दरलाल बहुगुणा :

चिपको आन्दोलन के प्रणेता सुन्दरलाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी सन 1927 को देवों की भूमि उत्तराखंड के सिलयारा नामक स्थान पर हुआ. प्राथमिक शिक्षा के बाद वे लाहौर चले गए और वहीं से बी.ए. किए.

सन 1949 में मीराबेन व ठक्कर बाप्पा के सम्पर्क में आने के बाद ये दलित वर्ग के विद्यार्थियों के उत्थान के लिए प्रयासरत हो गए तथा उनके लिए टिहरी में ठक्कर बाप्पा होस्टल की स्थापना भी किए. दलितों को मंदिर प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने आन्दोलन छेड़ दिया. अपनी पत्नी विमला नौटियाल के सहयोग से इन्होंने सिलयारा में ही ‘पर्वतीय नवजीवन मण्डल’ की स्थापना भी की. सन 1971 में शराब की दुकानों को खोलने से रोकने के लिए सुन्दरलाल बहुगुणा ने 16 दिन तक अनशन किया.

चिपको आन्दोलन के कारण वे विश्वभर में वृक्षमित्र के नाम से प्रसिद्ध हो गए. वर्ष 2009 में भारत सरकार ने इन्हें पद्म विभूषण से नवाजा. पर्यावरण को बचाने के लिए ही 1990 में सुंदर लाल बहुगुणा ने टिहरी बांध का विरोध किया था. चिपको पदयात्रा के तहत एक बार फिर सुंदरलाल बहुगुणा ने जून 1981 में चंबा के लंगेरा गांव से हिमाचल की पदयात्रा शुरू की.

5000 किमलोमीमीटर की यह यात्रा 1983 में विश्‍वस्‍तर पर काफी तेजी से उभर कर सामने आई. बहुगुणा के कार्यों से प्रभावित होकर अमेरिका की फ्रेंड ऑफ नेचर नामक संस्था ने इन्‍हें 1980 में सम्‍मानित किया। इसके बाद 1984 के सुदंर लाल को राष्ट्रीय एकता पुरस्कार, समेत अब तक कई पुरस्‍कार मिल चुके हैं.