हिमाचल के इस मेवे की है दुनियाभर में मांग

हिमाचल के इस मेवे की है दुनियाभर में मांग

रिकांग पिओ/ नई दिल्ली. ठंड बढ़ने के साथ ही पूरी दुनिया में हिमाचल में पैदा होने वाले अनूठे मेवे चिलगोजा की मांग बढ़ जाती है. इस सीजन में बड़ी संख्या में मेवे के व्यापारी किन्नौर में इस ड्राई फ्रूटस को खरीदने के लिए आते हैं. चिलगोजा, चीड़ या सनोबर जाति के पेड़ों का छोटा, लंबोतरा फल है.

दुनिया के अधिकतर देश इस फल से वंचित हैं लेकिन हिमाचल के किन्नौर और सतलुज की घाटी में कड़छम नामक स्थान पर चिलगोजे के पेड़ों का भरापूरा जंगल है. चिलगोजा, चीड़ या सनोबर जाति के पेड़ों का छोटा, लंबोतरा फल है, जिसके अंदर मीठी और स्वादिष्ट गिरी होती है और इसीलिए इसकी गिनती मेवों में होती है.

स्थानीय भाषा में चिलगोजा को न्योजा कहते हैं. किन्नौर और उसके समीपवती प्रदेश में विवाह के अवसर पर मेहमानों को सूखे मेवे की जो मालाएँ पहनाई जाती हैं उसमें अखरोट और चूल्ही के साथ चिलगोजा की गिरी भी पिरोई जाती है. सफेद तनों वाला इनका पेड़ देवदार से कुछ कम लंबाई वाला, हरा भरा होता है.

किन्नौर जिले से हर साल लगभग 1500 कुंतल चिलगोजा पैदा होता है. चिलगोजा 500-900 रुपए प्रति किलो के हिसाब से स्थानीय मंडियों में उपलब्ध होता है समय के साथ चिलगोजे की अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ने से यह ड्राई फ्रूट जिला के लोगों के लिए आर्थिकी का बड़ा जरिया भी है. चिलगोजे की फसल 156 महीने में तैयार होती है और इसकी विशेषता यह है कि अगले साल कितनी फसल चिलगोजा के पेड़ पर तैयार होगी, इस बात का पता पहली फसल के तोड़ने से पहले ही टहानियों में तैयार हो रहे कोण से पता चलता है. कार्बोहाईड्रेट और प्रोटीन युक्त चिलगोजा हिमाचल प्रदेश के चंबा में भी पाया जाता है. चिलगोजा के विकास और अनुसंधान के लिए शारबो, किन्नौर में एक संस्थान भी बनाया गया है.

चिलगोजा का वानस्पतिक नाम पाइंस जिराडियाना है. चिलगोजा समुद्रतल से लगभग २००० फुट की ऊँचाई वाले दुनिया के गिने-चुने इलाकों में ही मिलता है. यह कुछ गहरी और पहाड़ी घाटियों के आरपार उन जंगलों में उगता है, जहाँ ठंडा और सूखा मौसम एक साथ होता हो, ऐसे जंगलों के आसपास कोई नदी भी हो सकती है और वहाँ से तेज हवाएँ गुजरती हों. चट्टानी, पर्वत मालाएँ सीथी खड़ी मिलती हों और वृक्ष चट्टानों को फाड़कर उगने के अभ्यासी हो. ऐसी जलवायु में जहाँ भी इसका बीज अंकुरित हो जाय यह सदाबहार हो उठता है.

चिलगोजा के पेड़ पर चीड़ की ही तरह भूरे रंगरूप वाला और कुछ ज्यादा गोलाई वाला लक्कड़फूल लगता है. मार्च अप्रैल में आकार लेकर यह फूल सितंबर अक्तूबर तक पक जाता है. यह बेहद कड़ा होता है. इसे तोड़कर इसकी गिरियाँ बाहर निकाली जा सकती हैं लेकिन ये गिरियाँ भी एक मजबूत आवरण से ढकी रहती हैं. इस भूरे या काले आवरण को दाँत से कुतर कर हटाया जा सकता है. भीतर पतली व लंबी गिरी निकलती है जो सफेद मुलायम व तेलयुक्त होती है. इसे चबाना बेहद आसान होता है. इसका स्वाद किसी भी अन्य कच्ची गिरी से तो मिलता ही है, मगर काफी अलग तरह का होता है. मूँगफली या बादाम से तो यह बहुत भिन्न होता है. छिले हुए चिलगोजे जल्दी खराब हो जाते हैं लेकिन बिना छिले हुए चिलगोजे बहुत दिनों तक रखे जा सकता है.

रावी के निकट के कुछ इलाकों तथा गढ़वाल के उत्तर पश्चिम के क्षेत्र, किन्नौर में कल्पा व सांगला की घाटी तथा चंबा में पांगी-भरमौर की घाटी इनके लिये प्रसिद्ध है. चिनाब नदी के कुछ ऊँचे बहाव वाले स्थानों पर भी यह मिलता है. अफगानिस्तान और बलूचिस्तान में भी यह मिलता है. इसके अतिरिक्त दक्षिण पश्चिम अमेरिका में इसे पाया जाता है, लेकिन एशियन और अमेरिकन चिलगोजे स्वाद और आकार में भिन्नता पाई जाती है.

चिलगोजा भूख बढ़ाता है इसका स्पर्श नरम लेकिन मिजाज गरम है. इसमें पचास प्रतिशत तेल रहता है; इसलिये ठंडे इलाकों में यह अधिक उपयोगी माना जाता है. सर्दियों में इसका सेवन हर जगह लाभदायक है. यह पाचन शक्ति को बढ़ाता है, इसको खाने से बलगम की शिकायत दूर होती है. मुँह में तरावट लाने और गले को खुश्की से बचाने में भी यह उपयोगी है.

वनस्पति शास्त्र का इतिहास लिखने वालों का मानना है कि चिलगोजे को भोजन में शामिल करने का इतिहास पाषाण काल जितना पुराना है. इन्हें मांस, मछली और सब्जी में डालकर पकाया जाता है तथा ब्रेड में बेक किया जाता है. इटली में इसे पिग्नोली कहते हैं और इसे इटालियन पेस्टो सॉस की प्रमुख सामग्री माना गया है. जबकि अमेरिका में इसे पिनोली नाम से जाना जाता है और पिनोली कुकीज़ में इसका ही प्रयोग किया जाता है. इंगलिश में इसे आमतौर पर पाइन नट कहा जाता है.