नई दिल्ली. भारत में प्राचीन काल से ऐसे बहुत से मंदिर हैं जिसकी कोई न कोई कहानी है. वैसे भी भारत को आकर्षण का देश माना जाता है. जहां विदेश से लोग आते हैं यहां का इतिहास जानने लिए. वैसे तो हमने मंदिर को पहाड़ पर देखा है, जंगलों और जमीन पर देखा है. पर आपने कभी ऐसे मंदिर को देखा है जो पानी के अंदर आठ महीने तक डूबा रहता है और सिर्फ चार महीने ही भक्तों को दर्शन देता है.

ऐसा मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले में स्थित है. यह मंदिर पोंग बांध के कारण आठ महीने तक पानी में डूबा रहता है. इस मंदिर की कहानी महाभारत से जुड़ी हुई है. इतने महीने पानी में रहने के बावजूद भी मंदिर के पत्थरों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता. इस मंदिर की बुनियाद आज भी मजबूत बनी हुई है. मंदिर को देखने के लिए देश-विदेश से बहुत से पर्यटक आते हैं

मंदिर का निर्माण पांडवों ने किया

ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण खुद पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान किया था और यहां शिवलिंग की स्थापना की थी. उन्होंने इस मंदिर के जरिए पृथ्वी से स्वर्ग तक जाने के लिए सीढियां भी बनाई जी, जो सिर्फ ढाई सीढियों तक अधूरा रह गया था. यहां केवल नाव से ही पहुंचा जा सकता है.

भीम द्वारा फेंके गए पत्थर से निकलता है खून

इस मंदिर से कुछ दूरी पर एक पत्थर मौजूद है. ऐसा माना जाता है कि इस पत्थर को भीम ने फेंके था. पत्थर पर कंकड़ मारने पर खून भी निकलता है.

बाथू की लड़ी के नाम से जाना जाता है मंदिर

इस मंदिर को बाथू की लड़ी कहते हैं. बाथू की लड़ी कांगड़ा जनपथ के मंदिर का एक समूह है. यह मंदिर 1970 में बने पोंग बांध निर्माण के कारण बने जलाशय महाराणा प्रताप सागर में जलमग्न हो जाता है. जब यहां का जल स्तर घटता है, तभी आप इस मंदिर के दर्शन के लिए जा सकते हैं.

ऐसे पहुंचे

इस मंदिर तक पहुंचने का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा गग्गल हवाई अड्डा है. गग्गल हवाई अड्डे से इस मंदिर की दूरी की डेढ़ घंटे की है. पर्यटक रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डे से ज्वाली पहुंच सकते हैं, जहां से इस मंदिर की दूरी 37 किमी की है. ज्वाली से बाथू की लड़ी पहुंचने के दो रास्ते हैं.

एक जिससे बाथू तक आधे घंटे में पहुंचा जा सकता है. वहीं दूसरे रास्ते से आपको इस मंदिर तक पहुंचने में करीब 40 मिनट का वक्त लगता है. अगर आप ट्रेन से जाना चाहते हैं, तो कांगड़ा रेलवे स्टेशन उतरकर किसी टैक्सी की मदद से यहां पहुंच सकते हैं.

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