श्रद्धांजलि: आकाशवाणी उद्घोषक मैलविल डी मैलो के शब्दो में महात्मा गांधी की अंतिम यात्रा

श्रद्धांजलि: आकाशवाणी उद्घोषक मैलविल डी मैलो के शब्दो में महात्मा गांधी की अंतिम यात्रा - Panchayat Times

नई दिल्ली. राजकीय शोक यात्रा में रेडियो की मेरी गाड़ी धीरे धीरे रेंगती हुई चल रही थी. क्वींसवे, किंग्जवे, हारडिंग एवेन्यू और बेला रोड, होते हुए राजघाट की ओर. हमारी रेडियो गाड़ी के ठीक पीछे था वह विशेष वाहन, जिस पर महात्मा गांधी का पार्थिव शरीर आम जनता के दर्शन के लिए रखा हुआ था.

गांधी जी के शरीर के आसपास पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, देवदास गांधी, सरदार बलदेव सिंह, आचार्य कृपलानी और राजेंद्र प्रसाद कुछ ऐसे अस्थिर से खड़े थे मानो संगमरमर की मूर्ति हो. और रास्ते में दोनों तरफ खड़े थे लाखों लोग. लाखों कंठ बापू के प्रिय भजनों को गा रहे थे. लाखों लोग उनकी अमरता, उनकी जय-जयकार कर रहे थे और सब रो रहे थे लोगों के इस समुद्र में मुझे एक भी आंख ऐसी नहीं देखी जो सुखी हो.

चंदन की लकड़ियों की चिंता से पहली लपट आकाश की ओर उठी और उधर सूरज डूब गया था. लहरों की तरह लोग आगे बढ़ रहे थे, तुम बिना और इन लहरों से उठ रही थी सिसकियों की आवाजें. लगता था मानो राजघाट पर कोई तूफान उतर आया हो. यह भावनाओं का तूफान था. अब तक की व्यवस्था इसने तोड़ दी थी.

स्त्री पुरुष सबने बार तोड़ दी, रस्सी से खंबे तार सब टूट गए थे. सब कुछ उस तूफान का एक हिस्सा बन चुके थे. अब सब धीरे-धीरे उस चंदन की चिंता की परिक्रमा में लगे थे. चंदन की लपटें भी ऊपर उड़ चली थी और उसकी सुगंध अब पूरी सांझ के प्रकाश में फैल गई थी. राज्यपाल, राजदूत, केंद्रीय मंत्री और सर्वसाधारण सब लोग यमुना के किनारे पर इस छोटे से टुकड़े में समा गए थे आज. मानवता की अटूट इस श्रृंखला में होती लहरों के बीच मैंने अपने को इस पर सवार उस लाचार चींटी की तरफ पाया जो एक भवर के बीच थक गई हो.

अंबरीश कुमार की फेसबुक वाल से