नई दिल्ली: केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनौहर लाल खट्टर ने संकेत दिए हैं कि लंबे समय से लंबित विद्युत संशोधन विधेयक (Electricity Amendment Bill) को संसद के आगामी बजट सत्र में पेश किया जा सकता है। यह विधेयक देश के बिजली क्षेत्र में व्यापक सुधार लाने और कर्ज में डूबी बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) को वित्तीय रूप से मजबूत करने के उद्देश्य से लाया जा रहा है।
ऊर्जा मंत्री ने यह बात आईआईटी दिल्ली में CERC ग्रिड इंडिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के उद्घाटन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि वितरण कंपनियों को समय पर भुगतान मिले और उन्हें घाटे का सामना न करना पड़े।
वर्षों बाद डिस्कॉम्स को मुनाफा
बिजली मंत्रालय के अनुसार,
वित्त वर्ष 2024-25 (FY25) में देश की वितरण कंपनियों ने संयुक्त रूप से 2,701 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया
यह कई वर्षों के लगातार घाटे के बाद पहली बार हुआ है
हालांकि, इसके बावजूद देशभर में करीब 50 डिस्कॉम्स अब भी घाटे में चल रही हैं।
ऊर्जा मंत्री ने कहा,
“आगामी बजट सत्र में हम विद्युत अधिनियम में संशोधन ला रहे हैं, ताकि डिस्कॉम्स को घाटा न हो और उन्हें समय पर भुगतान सुनिश्चित किया जा सके।”
राज्यों के साथ परामर्श प्रक्रिया जारी
बिजली मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ परामर्श बैठक जल्द आयोजित की जाएगी इसका उद्देश्य प्रस्तावित संशोधनों पर सहमति और सहयोग बनाना है। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, Electricity Amendment Bill 2025 का मकसद संघीय ढांचे (Federal Balance) को बनाए रखना ।सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देना,
प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना
बिजली क्षेत्र की दक्षता और वित्तीय अनुशासन को मजबूत करना है,निजीकरण को लेकर विपक्ष की चिंता सरकार के इस कदम को लेकर विपक्ष और कर्मचारी संगठनों ने आपत्ति जताई है। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF) ने आरोप लगाया है कि यह विधेयक निजीकरण का रास्ता खोलता है।
AIPEF के अध्यक्ष शैलेन्द्र दुबे ने कहा, “यह विधेयक सरकारी डिस्कॉम्स के मौजूदा नेटवर्क का उपयोग करते हुए कई वितरण लाइसेंसधारकों को अनुमति देता है, जो स्पष्ट रूप से निजीकरण को बढ़ावा देता है। केंद्र सरकार लगातार बिजली क्षेत्र में निजीकरण के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है।”
आगे क्या?
अगर यह विधेयक संसद में पेश होकर पारित होता है, तो
बिजली वितरण व्यवस्था में बड़ा संरचनात्मक बदलाव आ सकता है
राज्यों और केंद्र के बीच भूमिका और अधिकारों को लेकर नई बहस छिड़ सकती है
उपभोक्ताओं, कर्मचारियों और निजी कंपनियों पर इसका सीधा असर पड़ेगा
