कोरोना वायरस: भारत के पास क्या लॉकडाउन ही एकमात्र रास्ता था?

नई दिल्ली. भारत समेत पूरी दुनिया कोरोना वायरस के संकट से जूझ रही है तो ये सवाल करना उचित होगा कि क्या लॉकडाउन किया जाना ही हमारी सरकार के पास एक मात्र विकल्प था और ये कितना जायज था?

दरअसल, संकट की इस घड़ी में किसी को पता नहीं है कि कौन-सा फैसला अच्छा है या फिर कौन-सा फैसला बाकी की तुलना में खराब हो सकता है. इतिहास के आईने में देखने के बाद हम सब गलत जान पड़ें. अगर वैश्विक स्तर पर चिकित्सा जगत के जाने-माने मंचों (WHO) ने हामी भर दी है और दुनिया के ज्यादातर देश लॅाकडाउन जैसी रणनीति पर काम करते हुए नजर आ रहे हैं.

अफरा-तफरी का माहौल

मगर लॉकडाउन के कुछ दिनों के अंदर ही जिस तरह की अफरा-तफरी का माहौल देखा गया. उसके बाद एक सवाल खड़ा होता है कि क्या अचानक से पूरी तरह लॉकडाउन किया जाना ही एकमात्र विकल्प था? क्या हम पूर्ण लॉकडाउन का ऐलान करने से पहले प्रवासियों खासकर रोज कमाने खाने वाले कामगारों को कुछ दिनों पहले अग्रिम नोटिस नहीं दे सकते थे जिससे वह अपनी इच्छा पर गांव जाने की व्यवस्था कर पाते. और क्या सरकार को उन सभी फैसलों और योजनाओं के बारे में घोषणा नहीं करनी चाहिए थी जिसके तहत सरकार ने लॉकडाउन के दौरान दिहाड़ी मजदूरों की रोजाना की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में काम करती?

लॉकडाउन और गरीब मजदूर?

कोई ये तर्क दे सकता है कि अगर लोगों को उनके घरों को जाने की इजाज़त दी जाती तो लॉकडाउन का मकसद ही समाप्त हो सकता था क्योंकि ऐसा होने पर अधिक से अधिक लोग अपने गांव जाने की कोशिश करते और अंत में ये देखा भी गया कि लाखों गरीब लोग अपने गांव तक जाने वाली सवारी मिलने की उम्मीद में कई-कई सौ किलोमीटर पैदल चलते रहे.

मजदूर घर जाने के लिए क्यों हुए परेशान?

मजदूरों और कामगारों के बीच अपने गांव जाने को लेकर जो अफरा-तफरी का माहोल पैदा हुआ उसके लिए कई चीजे जिम्मेदार हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में आंतरिक प्रवासियों की कुल संख्या, देश की जनसंख्या का 45.36 करोड़ यानि की 37% है. इसमें अंतर-राज्य प्रवासियों के साथ-साथ प्रत्येक राज्य के भीतर प्रवास भी शामिल हैं, जबकि हालिया पलायन बड़े पैमाने पर अंतर-राज्य प्रवासियों के कारण है.

कोरोना वायरस: भारत के पास क्या लॉकडाउन ही एकमात्र रास्ता था? - Panchayat Times
Migrant Workers Heads toward Home In Coronavirus Lockdown

दिहाड़ी मजदूर

दिहाड़ी मजदूर वो मजदूर होते हैं जिनकी रोज की आमदनी होती है. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) और अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा 2019 में किए गए एक अध्ययन का अनुमान है कि भारत के बड़े शहरों में कमाने-खाने वाली आबादी में से 29 फीसदी लोग दिहाड़ी मजदूर होते हैं. वहीं, उपनगरीय इलाकों की खाने-कमाने वाली आबादी में दिहाड़ी मजदूर 36 फीसदी हैं. गांवों में ये आंकड़ा 47 फीसदी है जिनमें से ज्यादातर खेतिहर मजदूर हैं.

गांव क्यों जाना चाहते थे मजदूर?

लॉकडाउन की वजह से काम नहीं मिलने के कारण अधिकतर मजदूरों को खाने की दिक्कत हो रही है. ऐसे में ये मजदूर अपने-अपने गांव जाना चाहते थे क्योंकि वहां शहरों की तुलना बेहतर सामाजिक संबंध और सामुदायिक जीवन होता है जोकि उनके गुजर-बसर के लिए बेहतर संभावनाएं दिखाता है.

कोरोना वायरस: भारत के पास क्या लॉकडाउन ही एकमात्र रास्ता था? - Panchayat Times
Migrant workers throng buses amid the nationwide Lockdown

भारत में सोशल डिस्टेंसिंग कितना संभव?

साल 2011 की जनगणना के आंकड़े दर्शाते हैं कि 37 फीसदी से अधिक भारतीय एक कमरे के घरों में रहते हैं. वहीं, 32 फीसदी भारतीय दो कमरों के घरों में रहते हैं. लेकिन असली में ये एक या दो कमरों के घर अधिकतर झुग्गी और झोपड़ियां होती हैं.

एक और राहत पैकेज की घोषणा कर सकती है सरकार

केंद्र सरकार ने लॉकडाउन के बाद पैदा होने वाले हालातों पर नजर रख रही है. इसके अलावा सरकार लॉकडाउन का कारण बिगड़ी अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए एक और राहत पैकेज की घोषणा कर सकती है. इस दिशा में सरकार विचार कर रही है. हालांकि अभी इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हो पाया है. यह जानकारी रविवार को एक वरिष्ठ अधिकारी ने एक प्रमुख समाचार एंजेसी को दी. अधिकारी का कहना है कि सरकार लॉकडाउन के बाद 15 अप्रैल से पैदा होने वाले हालातों पर पूरी तरह से फोकस कर रही है.