क्या है क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) समझौता जिसमें शामिल होने से भारत ने किया इनकार

क्या है क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) समझौता जिसमें शामिल होने से भारत ने कर दिया था इनकार - Panchayat Times

नई दिल्ली/रांची. क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) एक मुक्त व्यापार समझौता है, जो कि 16 देशों के मध्य किया जाना था. विदित हो कि भारत के इसमें शामिल न होने के निर्णय के पश्चात् अब इसमें 15 देश शेष हैं. इसका उद्देश्य व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिये इसके सदस्य देशों के बीच व्यापार नियमों को उदार बनाना एवं सभी 16 देशों में फैले हुए बाज़ार का एकीकरण करना है.

यदि भारत सहित यह समझौता संपन्न होता तो यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के 25 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार के 30 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता. साथ ही यह तकरीबन 5 अरब लोगों की आबादी के लिहाज़ से सबसे बड़ा व्यापार ब्लॉक भी बन जाता. RCEP समझौते में वस्तुओं एवं सेवाओं का व्यापार, निवेश, आर्थिक और तकनीकी सहयोग, बौद्धिक संपदा, प्रतिस्पर्द्धा, विवाद निपटान तथा अन्य मुद्दे शामिल हैं.

समझौते से क्या नुकसान होते

भारत अगर ये समझौता कर लेता तो न्यूज़ीलैंड से दूध के पाउडर के आयात के चलते भारत का दूध का पूरा उद्योग ठप पड़ जाता. किसानी-खेती की बात करें तो इस समझौते के बाद नारियल, काली मिर्च, रबर, गेहूं और तिलहन के दाम गिर जाने का खतरा था. छोटे व्यापारियों का धंधा चौपट होने का खतरा था.

भारत की चिंता के पक्ष:

भारत के अतिरिक्त RCEP में भाग लेने वाले अन्य सभी 15 सदस्यों ने मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने का निर्णय लिया है. इस समझौते के वर्ष 2020 तक संपन्न होने की उम्मीद है. दूसरी ओर भारत ने कुछ अनसुलझे मुद्दों के कारण इस समझौते में शामिल न होने का निर्णय लिया है. निर्णय की घोषणा करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा कि “RCEP अपने मूल उद्देश्यों को प्रतिबिंबित नहीं करता एवं इसके परिणाम न तो उचित हैं और न ही संतुलित.”

RCEP वार्ता के दौरान कई भारतीय उद्योग समूहों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर करने को लेकर चिंता जताई थी. उन्होंने तर्क दिया था कि कुछ घरेलू क्षेत्र अन्य प्रतिभागी देशों के सस्ते विकल्पों के कारण प्रभावित हो सकते हैं. उदाहरण के लिये समझौते के फलस्वरूप देश के डेयरी उद्योग को ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड से कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ेगा. इसी प्रकार देश के इस्पात और कपड़ा उद्योग को भी कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ेगा.