महिलाएं लाह से तरह-तरह के सामान बनाने का प्रशिक्षण लेकर बन रही हैं आत्मनिर्भर

महिलाएं लाह से तरह-तरह के सामान बनाने का प्रशिक्षण लेकर बन रही हैं आत्मनिर्भर-Panchayat Times

हजारीबाग. हजारीबाग, चतरा, गुमला, लातेहार, व कोडरमा के जंगलों में लाह की खेती कर ग्रामीण आत्मनिर्भरता की राह पर हैं. वर्तमान में 593 वन समितियों की ओर से 59,300 पेड़ पर लाह की खेती कर सलाना 8.89 करोड़ रुपए की कमाई कर रहे हैं. अब तक लोग जंगलों में पेड़ की लकड़ियां काट कर जलावन, दतुवन और घरेलू उपयोग के के लिए लकड़ियों को ले जाते थे, लेकिन अब ग्रामीणों का रूझान बदला है. लोग लाह की खेती पर अधिक जोर दे रहे हैं.

ग्राम वन पर्यावरण लाह से तरह-तरह के सामान बनाने का प्रशिक्षण लेकर आत्मनिर्भर बन रही हैं संरक्षण समिति के सदस्य वनों से रोजगार भी पा रहे हैं.

महिलाएं लाह से तरह-तरह के सामान बनाने का प्रशिक्षण लेकर आत्मनिर्भर बन रही हैं

वहीं, महिला समूह की सदस्य लाह से तरह-तरह के सामान बनाने का प्रशिक्षण लेकर आत्मनिर्भर बन रही हैं. वन विभाग का यह प्रयास वन संरक्षण व रोजगार की दिशा सफल होता दिखाई दे रहा है. महिलाएं हो रही हैं प्रशिक्षित वन विभाग की ओर से स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को लाह से बनने वाले सामान चूड़ी, सजावट व अन्य वस्तु तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

महिलाएं लाह से तरह-तरह के सामान बनाने का प्रशिक्षण लेकर बन रही हैं आत्मनिर्भर-Panchayat Times

वर्तमान में 300 महिलाओं ने प्रशिक्षण प्राप्त किया है.अब वन विभाग की ओर से नयी योजना के तहत स्थानीय लाह से गांव की महिलाएं कई तरह के सामान का निर्माण करेंगी और इसे बेचेंगी. इससे वन समिति और महिला समितियों को रोजगार एवं आमदनी होगी.

125 समितियां लाह उत्पादन से जुड़ी

100 पेड़ से 1.50 लाख रुपए की आमदनी वन विभाग की के सहयोग से ग्रामीण हजारीबाग, गुमला, लातेहार चतरा एवं कोडरमा के जंगलों में पलाश, कुसुम और बैर के पेड़ पर लाह की खेती कर रहे हैं. हजारीबाग वन प्रमंडल पूर्वी क्षेत्र में 218, ग्राम वन पर्यावरण संरक्षण समिति, पश्चिमी क्षेत्र में 125 समितियां, चतरा वन प्रमंडल उत्तरी क्षेत्र में 125 समितियां और चतरा दक्षिण क्षेत्र में 125 समितियां लाह उत्पादन से जुड़ी हुई हैं. एक समिति में 10 सदस्य हैं.

महिलाएं लाह से तरह-तरह के सामान बनाने का प्रशिक्षण लेकर बन रही हैं आत्मनिर्भर-Panchayat Times

539 समितियों को सालाना डेढ़-डेढ़ लाख रुपए की आमदनी से कुल 8.89 करोड़ 50 हजार रुपए की आमदनी होती है. जून-जुलाई माह लाह की खेती के लिए जंगलों में पाये जानेवाले पलाश, कुसुम और बैर के पेड पर रंगिनी और कुसमीला लाह की खेती हो रही है. जून, जुलाई माह में लाह के कीड़ों को पेड़ों की टहनियों में बांध दिया जाता है. इससे लाह का कीड़ा पूरे पेड़ में फैल जाता है.

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एक पेड़ में 700 ग्राम कीड़ा चढ़ाने से एक सीजन में एक पेड़ से आठ से 10 किलो लाह प्राप्त होता है. साल पूरा होने पर पेड़ की टहनी की छंटनी की जाती है और लाह को निकाला जाता है. कुछ लाह कीड़ा वाली टहनियों को बीहन के रूप में अगले सीजन के लिए रख लिया जाता है. लाह को वन समिति के लोग बाजार में जाकर बेचते हैं. जंगल बचाने के मुहिम में बढ़ेगी भागीदारी जंगल के आसपास रहनेवाले लोगों ने अब पलाश, कुसुम और बैर के पेड़ों को काटना छोड़ दिया है. अब मेहनत व वन विभाग के सहयोग से वन आधारित रोजगार इन्हें मिलने लगे हैं.

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पेड़ों पर लाह के कीड़ा वाली टहनी को बांध देने से गांव वालों को लाह मिलने लगा है. इसके लिए बाजार भी है. इस कारण लोग जलावन, दतुवन एवं घरेलू उपयोग के लिए पेड़ों को काटना छोड़ लाह की खेती की ओर ध्यान दे रहे हैं. इसमें युवा पीढ़ी भी इस ओर आकर्षित हो रही है. जंगल बचाने व स्वरोजगार के लिए लाह की खेती के प्रति लोगों का रूझान बढ़ा है. ग्रामीण लाह की खेती कर वन की रक्षा कर रहे हैं और रोजगार पा रहे हैं. वन पर आधारित उद्योग की काफी संभावना है. लघु वन पदार्थ का प्रचुर मात्रा में उत्पादन किया जा सकता है. लोगों को रोजगार भी मिल सकता है. तीन जिलों में 11 लाख पेड़ों पर लाह की खेती का लक्ष्य है.

साल में दो बार होती है खेती

रंगीन लाह के कीट से साल भर में दो फसलें उगाई जाती हैं. जिसे बैसाखी (ग्रीष्मकालीन) और केतकी (वर्षाकालीन) फसल कहते हैं. बैसाखी फसल के लिए लाह कीट को वृक्षों पर अक्टूबर या नवंबर में और केतकी के लिए जून या जुलाई महीने में चढ़ाया जाता है. बीज चढ़ाने के बाद बैसाखी फसल आठ माह में, जबकि केतकी चार माह में तैयार हो जाती हैं.