संसद में बढ़ी महिलाओं की भागीदारी, 17वीं लोकसभा में 78 महिला सांसद

सत्रहवीं लोकसभा में चुनाव जीत कर आईं 78 महिलाएं - Panchayat Times
प्रतीक चित्र

नई दिल्ली. देश की संसद में महिलाओं की भागीदारी निरंतर बढ़ रही है. सत्रहवीं लोकसभा में चुनाव जीत कर आईं 78 महिलाएं अपने संसदीय क्षेत्र का नेतृत्व करेंगी. महिला सशक्तीकरण की यह एक मिसाल है. 16वीं लोकसभा में 66 महिलाएं सांसद थीं. इस बार इनकी बढ़ी आमद का श्रेय बीजू जनता दल और तृणमूल कांग्रेस को जाता है. इन दोनों दलों ने 41 और 33 प्रतिशत महिलाओं को पार्टी स्तर पर टिकट दिए. ओडिशा में लोकसभा की कुल 21 सीटें हैं. इनमें सात महिलाएं निर्वाचित हुई हैं. इनमें भी पांच बीजेडी की और दो भाजपा की हैं. बीजेडी की चंद्राणी मुर्मू जीत कर आई हैं. वह सबसे कम उम्र की महिला सांसद हैं. इस आदिवासी महिला सांसद की उम्र 25 साल है. वे इंजीनियर रही हैं. पश्चिम बंगाल से तृणमूल की 9 और भाजपा की तीन महिलाएं सांसद चुनी गई हैं. कांग्रेस ने 54 महिलाओं को टिकट दिए थे, लेकिन महज एक सोनिया गांधी जीत दर्ज करा पाई हैं. भाजपा ने 53 महिलाओं को चुनावी समर में उतारा था. इनमें से 34 सांसद चुनी गई हैं. वाइएसआर कांग्रेस की चार महिलाएं सांसद बनी हैं. मध्यप्रदेश से भी चार महिलाओं ने संसद में आमद दर्ज कराई है. इनमें भोपाल से दिग्विजय सिंह को हराने वाली प्रज्ञा ठाकुर भी शामिल हैं. उप्र और पश्चिम बंगाल से सबसे ज्यादा महिलाएं जीती हैं. हालांकि आठ ऐसे राज्य भी हैं, जहां से एक भी महिला चुनाव नहीं जीती है. इस बार कुल 724 महिलाएं मैदान में थीं, लेकिन 78 ही जीत पाईं. इसके साथ ही संसद में अब महिलाओं का प्रतिशत बढ़कर 28 हो गया है.

लोकसभा और विधानसभा में 33 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण देने की बात तो सभी राजनीतिक दल करते हैं, किंतु अपने स्तर पर कोई पहल नहीं करते. अलबत्ता बीजू जनता दल के अध्यक्ष नवीन पटनायक एवं ममता बनर्जी ने जरूर सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में 33 प्रतिशत से भी ज्यादा महिलाओं को उम्मीदवार बनाए जाने की हिम्मत दिखाई, जिसके अच्छे नतीजे सामने आए हैं. हालांकि जिस महिला आरक्षण विधेयक के जरिये संसद में 33 प्रतिशत महिलाओं की आमद सुनिश्चित की जानी है, उसकी तुलना में अभी 103 महिलाएं कम हैं. यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो पंचायत चुनाव की तरह संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण की सुविधा मिल जाएगी. फिलहाल यह विधेयक 9 मार्च 2010 में राज्यसभा से पारित होने के बाद ठंडे बस्ते में है. विधायिका में महिला आरक्षण के लिए 108वें संविधान संशोधन विधेयक का भी राज्यसभा में अनुमोदन हो चुका है.

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सोलहवीं लोकसभा में भाजपा स्पष्ट बहुमत में थी. वह चाहती तो विधेयक पारित कराने में कोई संशय नहीं था. इस मुद्दे को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन द्वारा बुलाए गए महिला विधायकों के राष्ट्रीय सम्मेलन में भी उठाया था. तब मोदी ने बड़ी चतुराई से कह दिया था कि ‘महिलाओं को सशक्त बनाने वाले पुरुष कौन होते हैं? देश के निर्माण में आधी आबादी की सशक्त भूमिका रही है और वह पुरुषों से बेहतर घर चलाती हैं.’ साफ है, यह बहाना विधेयक टालने के लिए बनाया गया. राज्यसभा से पारित इस विधेयक को कानूनी रूप लेने के लिए अभी लोकसभा और पन्द्रह राज्यों की विधानसभाओं का सफर तय करना होगा. इसके कानून बनते ही ऐसे कई दोहरे चरित्र के चेहरे हाशिये पर चले जाएंगे, जो पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने के प्रावधान के बहाने, गाहे-बगाहे बीते 21 साल से गतिरोध पैदा किए हुए हैं. हालांकि अब राष्ट्रवाद की चली हवा ने इस विधेयक के सभी विरोधी सूरमाओं को धूल चटा दी है. लिहाजा अब इसे संसद में पेश किया जाता है तो सरकार को पारित कराने में परेशानी पेश नहीं आएगी.

महिला आरक्षण विधेयक का मूल प्रारूप संयुक्त मोर्चा सरकार के कार्यकाल के दौरान गीता मुखर्जी ने तैयार किया था. लेकिन अक्सर इस विधेयक को लोकसभा सत्र के दौरान अंतिम दिनों में पटल पर रखा गया. इससे यह संदेह हमेशा बना रहा कि एचडी देवगौड़ा, इन्द्र कुमार गुजराल, अटलबिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी की सरकारें इसे टालती रही हैं. गठबंधन के दबाव और राजनीतिक असहमतियों के चलते ये प्रधानमंत्री इस मामले में अपने आत्मबल का परिचय नहीं दे पाए, जो मनमोहन सिंह ने 2010 में इसे राज्यसभा से पारित कराकर दिया था. तब उस सरकार को अपने ही सहयोगी दलों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा था. यहां तक की समर्थक दलों ने कांग्रेस को समर्थन वापसी की धमकी भी दी थी. हालांकि प्रजातंत्र में तार्किक असहमतियां, संवैधानिक अधिकारों व मूल्यों को मजबूत करने का काम करती हैं. लेकिन असहमतियां जब मुट्ठीभर सांसदों की अतार्किक हठधर्मिता का पर्याय बन जाएं तो ये संसद की गरिमा और सदन की शक्ति को ठेंगा दिखाने वाली साबित होती हैं.

विधेयक से असहमत दलों की प्रमुख मांग थी, ’33 फीसदी आरक्षण के कोटे में पिछड़े और मुस्लिम समुदायों की महिलाओं को विधान मंडलों में आरक्षण का प्रावधान रखा जाए.’ संविधान के वर्तमान स्वरूप में केवल अनुसूचित जाति और जनजाति के समुदायों को आरक्षण की सुविधा हासिल है. ऐसे में पिछड़े वर्ग की महिलाओं को लाभ कैसे संभव है? हमारे लोकतांत्रिक संविधान में धार्मिक आधार पर किसी भी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है. लिहाजा इस बिना पर मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण की सुविधा कैसे हासिल हो सकती है?

आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने सच्चर व रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को आधार मानते हुए मुसलमान व ईसाईयों को नौकरियों में धर्म आधारित आरक्षण की व्यवस्था की थी. लेकिन न्यायालयों ने इन्हें संविधान विरोधी फैसला बताकर खारिज कर दिया था. दरअसल, इस कानून के वजूद में आ जाने के बाद अस्तित्व का संकट उन काडरविहीन दलों को है, जो व्यक्ति आधारित दल हैं. इसी कारण लालू, मुलायम और शरद यादव इस बिल के विरोध में दृढ़ता से खड़े होते रहे हैं, लेकिन अब तीनों ही वजूद के संकट से जूझ रहे हैं. इन नेताओं का दोहरा चरित्र इस बात से भी जाहिर होता है कि जब देश की पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं का 33 फीसदी से 50 फीसदी आरक्षण बढ़ाने का विधेयक लाया गया था तब ये सभी दल एक राय थे. यही नहीं, जब नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण का विधेयक लाया गया था, तब भी इन दलों की सहमति बनी रही. लेकिन जब विधायिका की बारी आई तो यही दल गतिरोध पैदा करने लग जाते हैं, क्योंकि यह विधेयक कानूनी स्वरूप ले लेता है तो इनके निजी राजनीतिक हित प्रभावित हो जाएंगे. इनका लोकसभा और विधानसभा में पुरुषवादी वर्चस्व का दायरा 33 फीसदी कम हो जाएगा.

देश में विकास को आंकड़ों और व्यक्तिगत उपलब्धि को संख्या बल की दृष्टि से देखने-परखने की आदत बन गई है. इस नाते हम मानकर चल रहे हैं कि 543 सदस्यीय लोकसभा में 181 महिलाओं की आमद दर्ज होने और 28 राज्यों की कुल 4109 विधानसभा सीटों में से महिलाओं के खाते में 1370 सीटें चली जाने से देश की आधी आबादी की शक्ल बदल जाएगी. स्त्रीजन्य विषमताएं व भेदभाव समाप्त हो जाएंगे. फिलहाल लोकसभा में 12.15 प्रतिशत और विधानसभाओं में महिलाओं की ही भागीदारी 9 फीसदी है. हालांकि असमानता के ये हालात पंचायती राज लागू होने और उसमें महिलाओं की 33 और फिर 50 फीसदी आरक्षण सुविधा मिलने के बावजूद कायम है. लेकिन लोकसभा व विधानसभाओं में एक तिहाई महिलाओं की उपस्थिति इसलिए जरूरी है, जिससे वे कारगर हस्तक्षेप कर महिला की गरिमा तो कायम करें ही, देश में जो पुरुषों की तुलना में स्त्री का अनुपात गड़बड़ा रहा है, उसको भी समान बनाने के उपाय तलाशें? साथ ही महिला संबंधी नीतियों को अधिक उदार व समावेशी बनाने की दृष्टि से उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता भी दिखाई दे.