अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस: कोरोना वायरस के दौर में दो वक्त के भोजन को जूझते मजदूर

अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस: कोरोना वायरस के दौर में दो वक्त के भोजन को जूझते मजदूर - Panchayat Times
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नई दिल्ली. मजदूर के दर्द को समझ पाना सबके वश की बात नहीं है. कोरोना वायरस फैलने के बाद देश और दुनिया में मजदूरों के सामने जो सबसे बड़ी समस्या खड़ी हो गई है वह भुखमरी की समस्या है. अपनी मेहनत के बूते लाखों लोगों का पेट भरने वाला मजदूर आज खुद ही अपना पेट पालने के लिए सरकार कि ओर देख रहा है. इनके जीवन की नाव बीच मंझधार में कहीं फंस सी गई है.

भले ही इनके लिए तमाम इंतजाम करने के दावे किए जा रहे है, मगर उन छोटे-छोटे कमरो के अन्दर का हाल किसे पता जहां एक रोटी में दिन गुजारने पड़ रहे हैं. मां का कलेजा उस वक्त दर्द से फट जाता है जब उसके मासूम को दूध तक नसीब नहीं हो पाता है. पर, करे भी तो क्या उसकी तकदीर में शायद यही लिखा है, इसे अपना नसीब मानकर जिंदगी के बचे-खूचे दिन खुद और अपने परिवार वालों को जिंदा रखने की जद्दोजहद में काट रहे हैं.

गए थे अपने परिवार का गुजर-बसर करने

गए थे अपने परिवार के गुजर-बसर के लिए परदेस कमाने मगर उन्हें क्या पता था की किसी ओर देश कि गलती का खामियाजा उन्हें अपने देश में भुखमरी के रूप में भुगतना पड़ेगा. मगर ऐसा ही हुआ, सबकुछ अचानक बदल गया, नागरिकों को बचाने के लिए सरकार ने फैसला लिया लॉकडाउन का और देश का मानो नजारा हि बदल गया.

बंद हो गई फैक्ट्रियां, बंद हो गई दुकानें, बंद हो गई मजदूरी, फिर क्या दो-चार दिन तो किसी तरह गुजर गए मगर उसके बाद रोज कमाने खाने वालों के सामने बड़ी समस्या सामने आकर खड़ी हो गई. परदेस में अपने घर की तरफ जाने का कोई साधन नहीं मिला तो पैदल ही हजारो किलोमीटर चल पड़े. कई राहों में जिंदगी को आखिरी सलाम कह गए तो बहुत बड़े पैमाने पर लोग अपने घरों तक सही सलामत पैदल ही पहुंच गए.

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कल तक इन मजदूरों की कोई कीमत नहीं थी. लेकिन आज जब खेतों में अनाज सड़ने लगे, दुनिया का बोझ उठाने की जरूरत पड़ी तो इनकी अहमियत भी धीरे-धीरे सभी को समझ आने लगी. जो पैसे के लिए हाय-हाय किए रहते थे, वो आज खुद को भी हाशिए पर खड़ा देख रहे हैं. भारतीय शहरों में हमेशा से बाहरी मजदूर रहे हैं. मजदूर शहरों की कई जरूरतों को पूरा करने के लिए रहते हैं. मजदूर कितनी बुरी परिस्थितियों में प्रमुख शहरों में रहते हैं इसका हाल हम सभी जानते हैं मगर कोई इनके दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता. इनके उत्थान के लिए सरकारें बड़े-बड़े वादा तो करती हैं मगर इन तक कितनी सुविधाएं पहुंचती हैं ये किसी से छुपी नहीं है.

1 मई, 1886 को मजदूरों के सम्मान में एक दिन की छुट्टी का ऐलान

1 मई, 1886 को मजदूरों के सम्मान में एक दिन की छुट्टी का ऐलान हुआ, जिसे अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है. इसको अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस, श्रम दिवस या मई दिवस भी कहते हैं. इस दिवस को मनाने के पीछे उन मजदूर यूनियनों की हड़ताल है जो कि आठ घंटे से ज्यादा काम न कराने के लिए की गई थी. मजदूर हमारे समाज का वह हिस्सा है जिसपर समस्त आर्थिक उन्नति टिकी है. वर्तमान समय के मशीनी युग में भी उनकी महत्ता कम नहीं हुई है.

श्रम बेचकर मजदूर अपनी न्यूनतम मजदूरी कमाता है. इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ को बढ़ावा देने के लिये मजदूर दिवस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाने लगा. पारंपरिक तौर पर इसको यूरोप में गर्मी के अवकाश के रूप में घोषित किया गया था, इसीलिए पूरे विश्व में 1 मई को “अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस” मनाया जाता है. वैसे तो इस मौके पर दुनिया के 80 देशों में राष्ट्रीय अवकाश रहता है. इस दिवस का मूल उद्देश्य “सामाजिक और आर्थिक प्रगति के लिए श्रमिकों को एकजुट करना” है.

पहले मजदूरों के काम करने की स्थिति बहुत कष्टदायक और असुरक्षित थी. 10 से 16 घंटों तक काम करना पड़ता था. अमेरिकन संघ के द्वारा 1884 में शिकागो के राष्ट्रीय सम्मेलन में मजदूरों के काम के लिए वैधानिक समय के रूप में आठ घंटे निर्धारित किया गया. हालांकि भारत में 1 मई 1923 को श्रमिकों द्वारा “मद्रास दिवस” मनाया गया था. किसान मजदूर पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने इसकी शुरुआत की और मद्रास हाईकोर्ट के सामने इस दिन को पूरे भारत में “मजदूर दिवस” के रूप में मनाने का संकल्प लिया और छुट्टी का ऐलान किया था.

कोरोना संक्रमण से जंग जीतने के बाद जब भी लॉकडाउन खुलेगा. उसके बाद की दुनिया फिर बदलेगी, लोगों का जीवन फिर से पटरी पर लौटेगा. इस विषम परिस्थिति में सभी अपने तरीके से दूख-दर्द बांटने की कोशिश कर रहे हैं. मगर सोचने और विचारने का विषय यह है कि क्या इस भयावह दौर के गुजर जाने के बाद मजदूरों की जिंदगी बदलेगी? क्या इनकी उम्मीदों पर दुनिया खरी उतरेगी? या फिर इनके जीवन में मजदूरी का वही दर्द समाया मिलेगा. यह तो वक्त गुजरने के साथ खुद ही पता चल पाएगा.