वर्ल्ड लाफ्टर डे: घाटे का सौदा नहीं है हंसना, बस वर्चुअल दुनिया से बाहर तो निकलिये

हंसना किसे पसंद नहीं. लेकिन आज-कल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी और तनाव के बीच में इंसान हंसी से जैसे कहीं दूर सा हो गया है. खुलकर हंसने की जगह अब इमोजीस ने ले ली है. अब हम बड़ी आसानी से अपने मूड के हिसाब से इमोजी भेज देते हैं.

कोई लतीफ़ा (जोक्स) सुनाता है तो भले ही हम वास्तव में खुलकर न हंसे हो, लेकिन इमोजीस में एलओएल (LOL) लिखकर भेज देंगे या फिर हंसी के इमोजी से ही हम अपनी भावनाएं ज़ाहिर कर देंगे. यही वजह है कि आजकल हम डिप्रेशन (अवसाद) का शिकार होते जा रहे हैं.

अवसाद है बड़ी समस्या

नव भारत टाइम्स के अनुसार डब्लूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 5 करोड़ से ज्यादा लोग डिप्रेशन से पीड़ित हैं. दुनिया भर में डिप्रेशन से प्रभावित लोगों की संख्या करीब 32.2 करोड़ है, जिसका 50 फीसदी सिर्फ़ भारत और चीन में ही है. वहीं अमूमन यह माना जाता है कि पुरुष खुलकर अपनी परेशानी ज़ाहिर नहीं करते इस वजह से अवसाद का सहकार हो जाते हैं. जबकि महिलाएं इसे ज़ाहिर कर देती हैं. लेकिन रिपोर्ट में जो आंकड़े सामने आए हैं उसमें पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में अवसाद और चिंता सबसे ज्यादा पाई गई.

सुसाइड से होने वाली मौतें

डब्ल्यूएचओ 2005 से लेकर 2015 के बीच पूरी दुनिया में डिप्रेशन के मरीजों की संख्या 18.4 प्रतिशन बढ़ी है. 2015 में भारत में करीब 3.8 करोड लोग चिंता जैसी समस्या से पीड़ित थे और इसके बढ़ने की दर 3 फीसदी थी.

यही वजह है कि दिमाग़ी तौर पर परेशान व्यक्ति सुसाइड (आत्महत्या) की ओर चला जाता है. पूरी दुनिया में होने वाली कुल मौतों में सुसाइड की हिस्सेदारी 1.5 प्रतिशत है. वहीं अगर बात करें साल 2012 की तो पूरी दुनिया के मुकाबले भारत में सबसे ज्यादा आत्महत्या से मौतें हुईं.

खुश रहने में है फ़ायदा

आज के दौर में हर इंसान किसी न किसी बात को लेकर चिंता पाले रहता है. अगर बेरोज़गार है , तो जॉब की चिंता. काम करता है तो तमाम ऑफ़िस की परेशानियां. भूखा है तो खाने की चिंता और खा लिया है तो पचाने की चिंता. कोई भी अकेला इंसान ऐसा नहीं है जिसे किसी भी चीज़ की चिंता न हो. लोग अपने वर्तमान को छोड़कर भविष्य की चिंता में बैठ जाते हैं. वैसे ये ग़लत नहीं की भविष्य के बारे में सोचा जाए. लेकिन भविष्य की चिंता में अपने वर्तमान को बिगाड़ देना भी कोई समझदारी का काम नहीं है.

तो इन सब से बेहतर है कि ज़िंदगी को बेहतर तरीके से जिया जाए. परेशानियों के साथ लेकर चलने और उसका हल निकालने के साथ-साथ हर छोटी-बड़ी चीज़ों में हंसने का बहाना ढूंढना चाहिए. हंसने से टेंशन और डिप्रेशन से भी छुटकारा पाया जा सकता है. इसके अलावा गुस्सा कंट्रोल करने में भी यह बहुत फायदेमंद होता है. हंसते रहने का सबसे महत्वपूर्ण फायदा यह है कि हमारा ब्लड सर्कुलेशन हमेशा ठीक रहता है. इससे हम आसानी से बीमार नहीं होते.

जिससे भी ख़ुशी मिलती हो

यूं तो मई महीने के पहले रविवार को ‘लाफ्टर डे’ मनाया जाता है. ताकि परेशानियों में डूबे इंसान को यह याद दिलाया जा सके कि हंसना और खुश रहना हमारे लिए कितना जरूरी है. लेकिन हमें हर रोज़ हंसने का कोई न कोई बहाना निकाल ही लेना चाहिए. इसके लिए आप ऐसे लोगों के साथ वक्त बिताइए जो सकारात्मक सोच वाले हों. ऐसे लोगों से बात करिए जिनके साथ बता करके आपको नई उर्जा मिलती हो.

खुश रहने के लिए तो सबसे पहले इमोजी की दुनिया से बाहर निकलकर खुश रहना सीखना होगा. सोशल मीडिया के आ जाने से हमने एक दूसरे से मिलना लगभग बंद ही कर दिया है. सारी बाते, सारी फीलिंग्स सोशल साइट पर शेयर हो जाती हैं. वर्चुअल दुनिया ने हमारे ऊपर इतना प्रभाव डाला है कि हम हर अपनी छोटी-बड़ी चीज़ को दिल से सेलिब्रेट करने के बजाय इस सोच में पड़े रहते हैं कि इसे सोशल मीडिया पर कैसे शेयर करना है.

क्या हमसे भी काबिल हैं ये बंदर?

टेकनॉलोजी ने जहां हमारी ज़िंदगी को आसान किया है वहीं ये कुछ ऐसी चीज़ें हैं, जिनसे हमें काफ़ी नुकसान भी हुआ है. तो आप भले ही सोशल मीडिया पर कितना भी समय बिताएं, लेकिन इसके इतर लोगों से निजी तौर पर भी मिलें, अपनी बातें साझा करें. और हां सबसे अहम बात हंसना और खुश रहना बिलकुल भी न छोड़ें.