नई दिल्ली. भारत सरकार ग्रेट निकोबार द्वीप (Great Nicobar Island) के व्यापक विकास की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिसे देश के सबसे बड़े रणनीतिक और आर्थिक प्रोजेक्ट्स में से एक माना जा रहा है। इस योजना का उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री मौजूदगी को मजबूत करना और वैश्विक व्यापार नेटवर्क में देश की भूमिका को बढ़ाना है।
चार बड़े घटकों पर आधारित विकास योजना
इस मेगा प्रोजेक्ट में चार प्रमुख हिस्से शामिल हैं—एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (ICTP), ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट और नौसेना एयर स्टेशन, एक आधुनिक टाउनशिप और बिजली उत्पादन सुविधा। सरकार का मानना है कि इन सभी घटकों के जरिए द्वीप को एक आधुनिक रणनीतिक और आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकेगा।
हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक पकड़ होगी मजबूत
ग्रेट निकोबार का स्थान वैश्विक समुद्री मार्गों के लिहाज से बेहद अहम है। यह द्वीप दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग रूट्स के पास स्थित है, खासकर मलक्का स्ट्रेट और सिक्स डिग्री चैनल के नजदीक। इस वजह से यह क्षेत्र तेल और कंटेनर शिपमेंट के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
सरकार का मानना है कि इस प्रोजेक्ट से भारत की समुद्री निगरानी क्षमता, सुरक्षा तैयारियां और आपदा प्रबंधन क्षमता में बड़ा सुधार होगा। यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की MAHASAGAR रणनीति के अनुरूप भी मानी जा रही है।
ट्रांसशिपमेंट पोर्ट से बढ़ेगा व्यापारिक दबदबा
इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट है। फिलहाल भारत का बड़ा कार्गो विदेशी बंदरगाहों के जरिए ट्रांसशिप होता है, जिससे देश को अतिरिक्त लागत और निर्भरता का सामना करना पड़ता है। नया पोर्ट इस निर्भरता को कम करने और भारत को एक प्रमुख समुद्री व्यापार केंद्र बनाने में मदद करेगा।
नौसेना नियंत्रण में बनेगा ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट
ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट को भारतीय नौसेना के नियंत्रण में विकसित किया जाएगा। यह सुविधा न केवल रक्षा जरूरतों को मजबूत करेगी, बल्कि समुद्री निगरानी और राहत अभियानों में भी अहम भूमिका निभाएगी। इसके साथ ही पर्यटन और कनेक्टिविटी को भी बढ़ावा मिलेगा।
गैलेथिया बे को क्यों चुना गया
परियोजना के लिए कई स्थानों का अध्ययन किया गया, जिसमें INS बाज़ (Campbell Bay) भी शामिल था। लेकिन विशेषज्ञों ने पाया कि वहां भौगोलिक चुनौतियां, रनवे विस्तार की सीमाएं और पर्यावरणीय जोखिम अधिक थे। इसलिए गैलेथिया बे को ग्रीनफील्ड साइट के रूप में चुना गया।
पर्यावरणीय मंजूरी और सुरक्षा उपाय
पर्यावरणीय मूल्यांकन के अनुसार, केवल 166.1 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ही विकास के लिए उपयोग में लिया जाएगा, जबकि द्वीप का 81% से अधिक हिस्सा जंगलों, नेशनल पार्क और संरक्षण क्षेत्रों के रूप में सुरक्षित रहेगा।
करीब 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि डायवर्ट की जाएगी, लेकिन इसमें से बड़ी हिस्सेदारी को ग्रीन ज़ोन के रूप में संरक्षित रखा जाएगा। यह प्रक्रिया पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) और CRZ नियमों के तहत की जा रही है।
वन्यजीव संरक्षण के लिए बड़ा कार्यक्रम
सरकार ने 30 वर्षों के लिए लगभग 72,220 करोड़ रुपये का संरक्षण कार्यक्रम प्रस्तावित किया है। इसका उद्देश्य लेदरबैक कछुए, निकोबार मेगापोड और मगरमच्छ जैसे दुर्लभ जीवों की सुरक्षा करना है। साथ ही कोरल रीफ और मैंग्रोव संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा।
आदिवासी अधिकार और पुनर्वास का मुद्दा
इस परियोजना में आदिवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर भी चर्चा रही है। सरकार का कहना है कि किसी भी समुदाय का भौतिक विस्थापन नहीं किया जाएगा और सभी प्रक्रियाएं वन अधिकार कानून के तहत की जा रही हैं।
रोजगार और आर्थिक अवसरों में बढ़ोतरी
सरकारी अनुमान के अनुसार इस परियोजना से एक लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा हो सकते हैं। इससे लॉजिस्टिक्स, पर्यटन, ट्रांसपोर्ट और हॉस्पिटैलिटी जैसे क्षेत्रों में भी विकास को गति मिलेगी।
भारत की समुद्री रणनीति में बड़ा बदलाव
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रेट निकोबार परियोजना भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है। यह न केवल व्यापारिक ताकत बढ़ाएगी, बल्कि समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव को भी मजबूत करेगी।
