नई दिल्ली. इस साल, दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य समय से लगभग चार दिन देरी से, 4 जून को केरल के तट पर पहुँचा। हालाँकि 9 जुलाई तक इसने पूरे देश को कवर कर लिया, लेकिन इसकी रफ़्तार काफी धीमी रही। 10 अगस्त, 2026 तक, देश भर में कुल बारिश सामान्य से 11 प्रतिशत कम दर्ज की गई। इसी बीच, प्रशांत महासागर में बन रहा एक मज़बूत ‘अल नीनो’ भारत के मॉनसून पैटर्न को लेकर चिंताएँ बढ़ा रहा है।
कितना ताकतवर है 2026 का El Niño?
World Meteorological Organization यानी WMO ने 2 जून 2026 को Pacific Ocean में मजबूत El Niño के विकसित होने की आधिकारिक पुष्टि की थी। इसके बाद मौसम विशेषज्ञों और मीडिया रिपोर्ट्स में इसे इस सदी के सबसे मजबूत El Niño में से एक बताया जाने लगा। कुछ रिपोर्ट्स में इसे “Super El Niño” और “Godzilla El Niño” तक कहा गया है। हालांकि ये वैज्ञानिक शब्द नहीं हैं, बल्कि El Niño की असामान्य ताकत को बताने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे लोकप्रिय शब्द हैं।
El Niño आखिर भारत के मानसून को कैसे प्रभावित करता है?
El Niño Pacific Ocean में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी से जुड़ी एक Climate Phenomenon है। इसके साथ हवा, वायुदाब और बारिश के पैटर्न में भी बदलाव होता है। आमतौर पर मजबूत El Niño को भारत में कमजोर Southwest Monsoon से जोड़ा जाता है, लेकिन इसका असर हर साल एक जैसा नहीं होता। भारतीय मानसून कई दूसरे समुद्री और वायुमंडलीय कारकों से भी प्रभावित होता है।
El Niño के विपरीत चरण को La Niña कहा जाता है। वहीं El Niño और La Niña के बीच बदलती परिस्थितियों को मिलाकर El Niño-Southern Oscillation (ENSO) Cycle कहा जाता है। वैज्ञानिक Pacific Ocean के अलग-अलग हिस्सों में समुद्र की सतह के तापमान के आधार पर इसकी तीव्रता और विकास पर नजर रखते हैं।
Climate Change ने बढ़ाई मौसम की अनिश्चितता
भारत के लिए चुनौती सिर्फ El Niño नहीं है। Climate Change के कारण पहले से ही मौसम के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल रहा है। हाल के अध्ययनों में संकेत मिले हैं कि Thar और Kutch जैसे इलाकों में बारिश बढ़ रही है, जबकि Indo-Gangetic Plains और Northeast India के कुछ हिस्सों में लंबे समय में बारिश कम होने का रुझान दिखाई दे रहा है।
हालांकि बारिश में कमी का मतलब यह नहीं है कि इन इलाकों में Extreme Rainfall Events नहीं होंगे। कई क्षेत्रों में कम बारिश के लंबे दौर के बाद अचानक बहुत ज्यादा बारिश हो रही है। इससे Flash Flood, Soil Erosion और फसलों को नुकसान जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
जून में 40 फीसदी बारिश की कमी ने बढ़ाई चिंता
2026 के Monsoon Season में जून का महीना खास तौर पर चिंताजनक रहा। जून में देशभर में बारिश करीब 40 फीसदी कम रही, जबकि जुलाई में अचानक तेज बारिश के कई दौर देखने को मिले। अगस्त के शुरुआती हिस्से में भी कुछ इलाकों में भारी बारिश हुई। कुछ छोटे क्षेत्रों में जुलाई और अगस्त की संयुक्त बारिश मौसमी औसत से भी अधिक पहुंच गई।
लेकिन केवल कुल बारिश का आंकड़ा सामान्य हो जाना किसानों के लिए राहत की गारंटी नहीं है। मानसून के देर से आने और जून में कम बारिश के कारण Sowing Cycle प्रभावित हुआ। वहीं जुलाई में अचानक हुई भारी बारिश ने कई जगह शुरुआती फसलों को नुकसान पहुंचाया।
किसानों पर दोहरी मार का खतरा
बारिश का यह असमान पैटर्न किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन रहा है। देर से बुवाई होने पर फसल की पैदावार प्रभावित हो सकती है, जबकि अचानक भारी बारिश खेतों में खड़ी फसल और मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत को बहा सकती है। बाढ़ के बाद दोबारा बुवाई करना भी कई जगह मुश्किल हो जाता है।
Extreme Heat के बाद लंबे Dry Spell और फिर अचानक Heavy Rainfall का सिलसिला खेती पर अतिरिक्त दबाव डालता है। ऐसे हालात में किसान केवल एक मौसम की समस्या से नहीं, बल्कि लगातार बदलते मौसम चक्र से प्रभावित हो रहे हैं।
झारखंड जैसे राज्यों में बारिश की भारी कमी
देश के कुछ हिस्सों में मानसून की कमी अब भी गंभीर बनी हुई है। सूखे से प्रभावित झारखंड के कुछ इलाकों में बारिश की कमी 80 फीसदी तक बताई गई है। ऐसे क्षेत्रों में मानसून के बचे हुए समय में पर्याप्त बारिश होना बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन यह तय नहीं है कि जिन इलाकों में अब तक Rainfall Deficit है, वहां मौसम के अंत तक पर्याप्त बारिश हो पाएगी या नहीं।
Indian Ocean Dipole से मिल सकती है कुछ राहत
El Niño के बीच Indian Ocean में विकसित होने वाला Indian Ocean Dipole (IOD) भी भारत के मानसून के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। WMO ने 31 जुलाई 2026 को संकेत दिया था कि Indian Ocean में IOD विकसित हो सकता है। सकारात्मक IOD कई परिस्थितियों में El Niño के कमजोर मानसून वाले प्रभाव को संतुलित कर सकता है।
1997-98 का उदाहरण दिखाता है कि मजबूत El Niño का मतलब हमेशा भारत में गंभीर सूखा नहीं होता। उस समय El Niño बेहद मजबूत था, फिर भी 1997 में भारत की कुल मानसूनी बारिश सामान्य से करीब 2 फीसदी अधिक रही थी। इससे पता चलता है कि El Niño और Indian Monsoon के बीच संबंध सीधा और हर साल एक जैसा नहीं है।
शहरों में भी बढ़ सकता है Water Stress
कमजोर मानसून और असमान बारिश का असर केवल गांवों और खेती तक सीमित नहीं है। Urban Areas में भी Water Stress बढ़ रहा है। जून के अंत तक Central Water Commission की निगरानी वाले 24 प्रमुख Reservoirs में से 14 में पानी का स्तर 10 साल के सामान्य स्तर से नीचे था।
मुंबई और पुणे जैसे शहरों में भी जलाशयों के घटते स्तर के कारण Water Cuts लागू करने पड़े। हालांकि जुलाई में हुई भारी बारिश से कई जगह स्थिति में सुधार आया, लेकिन कम समय में होने वाली अत्यधिक बारिश हमेशा जल सुरक्षा की समस्या का स्थायी समाधान नहीं करती।
Fisheries Sector पर भी मंडरा रहा खतरा
बदलता मौसम और गर्म होते समुद्र Fisheries Sector के लिए भी चिंता का विषय है। Pacific Ocean में El Niño की गतिविधियों के साथ-साथ दुनिया के समुद्रों का तापमान भी काफी बढ़ रहा है। इससे समुद्री पारिस्थितिकी और मछली पकड़ने वाले समुदायों पर दबाव बढ़ सकता है।
गर्म समुद्री परिस्थितियां कुछ क्षेत्रों में Tropical Cyclones की तीव्रता और जोखिम को भी प्रभावित कर सकती हैं। Bay of Bengal और Arabian Sea दोनों में रहने वाले तटीय समुदायों के लिए यह एक अतिरिक्त चुनौती है।
Climate Disaster से निपटने के लिए बदलनी होगी रणनीति
बदलते मौसम के बीच केवल आपदा आने के बाद राहत और मुआवजा देना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को Climate Resilience, Disaster Preparedness और Local Adaptation Strategies पर ज्यादा ध्यान देना होगा। पहाड़ी क्षेत्रों और तटीय इलाकों के लिए ऐसी रणनीतियां जरूरी हैं जो मैदानी और अंदरूनी क्षेत्रों से अलग हों।
कृषि, जल प्रबंधन और Fisheries Sector से जुड़ी नीतियों में स्थानीय समुदायों की भूमिका बढ़ाना भी जरूरी है। किसानों, मजदूरों और मछुआरों के पास मौसम और स्थानीय परिस्थितियों को लेकर पीढ़ियों से जमा अनुभव है। इस स्थानीय ज्ञान को आधुनिक Climate Science के साथ जोड़कर ही बदलते मौसम के प्रभावों से बेहतर तरीके से निपटा जा सकता है।
El Niño के दौर में भारत के सामने बड़ी चुनौती
2026 का El Niño ऐसे समय में विकसित हो रहा है जब Climate Change पहले ही भारत के Monsoon System को अधिक अनिश्चित बना रहा है। देर से मानसून, जून में Rainfall Deficit, अचानक Heavy Rainfall, Extreme Heat और Dry Spells का संयोजन खेती, पानी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
इसलिए आने वाले समय में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि देश में कुल कितनी बारिश हुई। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि बारिश कहां, कब और कितनी तीव्रता से हुई। बदलते मौसम के दौर में भारत को एक समान नीति के बजाय स्थानीय जरूरतों के आधार पर Climate Adaptation और Disaster Management की रणनीति तैयार करनी होगी।
