नई दिल्ली: देशभर की जेलों में बंद उन लाखों विचाराधीन कैदियों के सामने कानूनी मदद का संकट खड़ा हो सकता है, जो निजी वकीलों की फीस देने में असमर्थ हैं। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) ने लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम (LADCS) के तहत नियुक्त पैनल वकीलों के अनुबंधों का नवीनीकरण नहीं करने का फैसला किया है। इस फैसले से उन कैदियों की चिंता बढ़ गई है, जिनके मुकदमे अभी अदालतों में चल रहे हैं और जिनकी पैरवी इन्हीं वकीलों के जिम्मे है। यह व्यवस्था देश में गरीब और जरूरतमंद आरोपियों को मुफ्त कानूनी सहायता देने के लिए शुरू की गई थी। वर्ष 2023 में इसे देश के सभी जिलों तक विस्तारित किया गया और इसके माध्यम से करीब तीन लाख विचाराधीन कैदियों को कानूनी प्रतिनिधित्व मिला।
यह मुद्दा तब और गंभीर हो गया, जब पंजाब और हरियाणा में बार एसोसिएशनों ने इस व्यवस्था के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और हड़ताल की। इसके बाद सितंबर 2026 में NALSA ने योजना पर दोबारा विचार करने की बात कही और पैनल वकीलों के अनुबंधों का नवीनीकरण नहीं करने का निर्णय लिया। अब इन अनुबंधों की अवधि समाप्त होने के साथ ही कई कैदियों के सामने सवाल है कि उनके मुकदमों की पैरवी कौन करेगा। कानूनी विशेषज्ञों और योजना से जुड़े वकीलों का कहना है कि यदि कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बनाई गई, तो कई आरोपियों को मुकदमे के बीच ही अपना वकील बदलने या बिना उचित कानूनी मदद के आगे बढ़ने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
समुद्र में समुद्री डकैती के आरोप में पकड़े गए 44 सोमाली नागरिकों का मामला
इस समस्या का एक उदाहरण मुंबई की अदालत में सामने आया। इस साल की शुरुआत में समुद्र में समुद्री डकैती के दो अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार किए गए सोमालिया के 44 नागरिकों ने अदालत को बताया कि उनके परिवारों ने वकीलों को लाखों रुपये दिए थे, लेकिन बाद में उन वकीलों ने उनकी पैरवी नहीं की। आरोपियों ने दावा किया कि उनके साथ धोखाधड़ी हुई और उन्हें कानूनी सहायता नहीं मिली।
इसके बाद अदालत ने लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम के तहत नियुक्त वकीलों की मदद ली। अगस्त में इन आरोपियों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इसके बावजूद उनके कानूनी सहायता वाले वकील अभी भी मामले से जुड़े काम कर रहे हैं। वे सोमालिया के दूतावास के साथ समन्वय कर रहे हैं, ताकि कैदियों को अपनी शेष सजा काटने के लिए उनके देश भेजने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सके।
हालांकि, इन वकीलों के अनुबंध जनवरी में समाप्त होने वाले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद मामले की जिम्मेदारी कौन संभालेगा, इस बारे में कोई स्पष्ट योजना नहीं है। यह स्थिति दिखाती है कि यदि कानूनी सहायता देने वाले वकीलों के अनुबंध समाप्त हो जाते हैं और उनके स्थान पर किसी अन्य वकील की नियुक्ति नहीं होती, तो गंभीर मामलों में भी आरोपियों की पैरवी प्रभावित हो सकती है।
क्या है लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम?
लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम भारत में सरकारी खर्च पर सार्वजनिक बचाव वकील उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग था। इस व्यवस्था के तहत ऐसे वकीलों की नियुक्ति की गई, जिनका मुख्य काम उन आरोपियों का बचाव करना है, जो निजी वकील की फीस नहीं चुका सकते। अमेरिका समेत कई देशों में सार्वजनिक बचाव वकीलों की व्यवस्था पहले से मौजूद है। भारत में LADCS को इसी तरह की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया।
इस योजना को शुरुआत में 13 राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया गया था। वर्ष 2023 में इसे देश के प्रत्येक जिले तक विस्तारित कर दिया गया। इसके तहत नियुक्त वकीलों को नियमित मासिक वेतन दिया जाता था और जिला अदालतों में काम करने के लिए अलग कक्ष उपलब्ध कराए जाते थे। उन्हें जेलों में जाकर ऐसे विचाराधीन कैदियों की पहचान करने की जिम्मेदारी भी दी गई, जिन्हें कानूनी प्रतिनिधित्व की जरूरत थी।
इससे पहले मुफ्त कानूनी सहायता का अधिकांश काम निजी प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के पैनल के जरिए होता था। वे अपनी निजी प्रैक्टिस के साथ कानूनी सहायता के मामले भी देखते थे और उन्हें प्रभावी सुनवाई के आधार पर भुगतान किया जाता था। अलग-अलग राज्यों में यह राशि सुनवाई के हिसाब से लगभग 200 से 600 रुपये तक थी। भुगतान अक्सर मुकदमे के अंत में होता था, जिससे वकीलों और उनके मुवक्किलों दोनों को परेशानी होती थी। कई बार वकीलों की अनुपलब्धता के कारण आरोपियों को अपने मामलों की स्थिति तक पता नहीं चल पाती थी।
संविधान में मुफ्त कानूनी सहायता का प्रावधान
भारत के संविधान का अनुच्छेद 39A यह सुनिश्चित करने की बात करता है कि आर्थिक कमजोरी के कारण किसी नागरिक को न्याय पाने से वंचित न रहना पड़े। इसके तहत राज्य से समान अवसरों के आधार पर न्याय सुनिश्चित करने और मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की अपेक्षा की गई है। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 भी हिरासत में बंद लोगों समेत पात्र श्रेणियों के व्यक्तियों को कानूनी सहायता देने का प्रावधान करता है।
हालांकि, लंबे समय तक इस व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठते रहे। वर्ष 2022 में NALSA ने भी माना था कि निजी प्रैक्टिस करने वाले पैनल वकील कानूनी सहायता के काम को पर्याप्त समय नहीं दे पाते। प्राधिकरण के अनुसार, कई मामलों में वकीलों से समय पर संपर्क करना, मुकदमे की प्रगति की जानकारी हासिल करना और उचित सलाह प्राप्त करना मुश्किल होता था। कुछ मामलों में लाभार्थियों से पैसे मांगने या उन्हें परेशान करने की शिकायतें भी सामने आई थीं।
वर्ष 2021 में तत्कालीन NALSA अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रहे जस्टिस यूयू ललित ने भी मुफ्त कानूनी सहायता की सीमित पहुंच पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि अदालतों में आपराधिक मामलों में मुफ्त कानूनी सहायता पाने वालों का अनुपात बेहद कम था। उन्होंने यह भी रेखांकित किया था कि मुकदमेबाजी का खर्च कई परिवारों के लिए गंभीर आर्थिक बोझ बन जाता है। कुछ परिवार वकीलों की फीस चुकाने के लिए गहने बेचने या संपत्ति गिरवी रखने तक को मजबूर हो जाते हैं।
नियमित वेतन और जेलों तक पहुंच ने बदली व्यवस्था
LADCS की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें नियुक्त वकीलों को निजी मामलों से मिलने वाली फीस पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था। उन्हें नियमित वेतन दिया जाता था, ताकि वे जरूरतमंद आरोपियों के मुकदमों पर पर्याप्त समय दे सकें। जिला अदालतों में कार्यालय उपलब्ध होने से कैदियों और उनके परिवारों के साथ संवाद करना भी आसान हुआ। इसके अलावा, वकीलों को जेलों में जाकर उन लोगों की पहचान करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिन्हें कानूनी सहायता की जरूरत थी।
बिहार के बक्सर में उप लीगल एड डिफेंस काउंसिल के रूप में काम कर चुके मानवेंद्र कुमार के अनुसार, राज्य में वर्ष 2016 में शराबबंदी लागू होने के बाद आबकारी कानून के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों की संख्या बढ़ी। इनमें कई ऐसे आरोपी थे, जिन्हें गंभीर सजा का सामना करना पड़ सकता था, लेकिन उनके पास निजी वकील रखने के लिए पैसे नहीं थे। कुमार का कहना है कि इस व्यवस्था ने मुफ्त कानूनी सहायता के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ाया।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि LADCS के वकील जेलों में जाकर निजी वकीलों के मुवक्किलों को अपने पास लाने का काम नहीं करते। उनके मुताबिक, जेल प्रशासन की ओर से चुने गए पैरालीगल स्वयंसेवक जरूरतमंद कैदियों की पहचान करने और उन्हें कानूनी सहायता से जोड़ने में मदद करते हैं। यदि किसी आरोपी के पास पहले से निजी वकील है, तो पैनल के वकील उसे उसके मौजूदा वकील से संपर्क करने में मदद कर सकते हैं, लेकिन उसका मुकदमा अपने हाथ में नहीं लेते। उनके अनुसार, आबकारी कानून से जुड़े कई मामले इस पैनल के पास आते हैं, क्योंकि आरोपियों के पास निजी वकील रखने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं होते।
पंजाब और हरियाणा में बार एसोसिएशनों का विरोध
इस व्यवस्था को लेकर विवाद की मुख्य वजह निजी वकीलों और LADCS के बीच काम के दायरे को लेकर मतभेद रहे हैं। कई राज्यों में इस विषय पर बातचीत के जरिए समाधान निकाला गया। बिहार में यह सहमति बनी कि अदालतें किसी मामले को LADCS के पास तभी भेजेंगी, जब यह स्पष्ट हो जाए कि आरोपी के पास निजी वकील नहीं है।
हालांकि, पंजाब और हरियाणा में बार एसोसिएशनों ने आरोप लगाया कि पैनल के वकील निजी वकीलों के मामलों में हस्तक्षेप कर रहे हैं। उनका दावा था कि कुछ मामलों में निजी वकील की एक या दो सुनवाई में अनुपस्थिति के बाद ही मामला LADCS को सौंप दिया जाता था। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या मुफ्त कानूनी सहायता के लिए पात्र नहीं होने वाले लोगों को भी इस व्यवस्था का लाभ मिल रहा था। बार एसोसिएशनों ने पैनल वकीलों के लिए ऐसी सीमाएं तय करने की मांग की, जिससे वे अपने या परिवार के सदस्यों के निजी मामलों के लिए मुवक्किल जुटाने में शामिल न हों।
विरोध के बाद हड़ताल वापस ले ली गई थी और शिकायतों की जांच करने का आश्वासन दिया गया था। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने 28 जुलाई के अपने आदेश में कहा था कि आम नागरिकों को न्याय तक पहुंच से वंचित करना पूरी न्याय व्यवस्था की विफलता होगी और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद अगस्त 2026 में NALSA ने पैनल वकीलों के अनुबंधों का नवीनीकरण नहीं करने का फैसला लिया।
पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश ने योजना खत्म करने के फैसले पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय ओका ने इस फैसले पर चिंता जताई। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि यह योजना उन्हीं लोगों के लिए काम कर रही थी, जिनकी मदद के उद्देश्य से इसे शुरू किया गया था। उनके मुताबिक, यदि व्यवस्था में कुछ समस्याएं हैं, तो उन्हें दूर किया जाना चाहिए, न कि पूरी योजना को समाप्त कर दिया जाना चाहिए।
जस्टिस ओका ने सुझाव दिया कि एक ही वकील को लगातार कई कार्यकाल देने के बजाय नियुक्तियों को अधिक व्यापक बनाया जा सकता है, ताकि दूसरे वकीलों को भी अवसर मिले। उन्होंने यह भी कहा कि जब NALSA ने अनुबंधों का नवीनीकरण नहीं करने का फैसला लिया है, तो मौजूदा समय में इन वकीलों के जरिए पैरवी करा रहे आरोपियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।
कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि LADCS और निजी वकीलों की व्यवस्था एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के आंकड़ों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में हर महीने करीब 24 लाख आपराधिक मामले दर्ज होते हैं। ऐसे में कानूनी सहायता वाले वकीलों का पैनल निजी वकीलों की जगह लेने के बजाय जरूरतमंद लोगों के लिए एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है।
मुकदमे के अंतिम चरण में है आरोपी, परिवार के पास फीस देने के पैसे नहीं
कोलकाता का एक मामला इस फैसले के संभावित असर को समझाता है। यहां 34 वर्षीय एक व्यक्ति को वर्ष 2016 में हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उसके पिता की एक छोटी दुकान थी और उन्होंने निजी वकील की फीस चुकाने के लिए अपनी बचत खर्च कर दी। वकील प्रति सुनवाई 5,000 रुपये लेता था। आरोपी के छोटे भाई के अनुसार, परिवार ने शुरुआती वर्षों में ही करीब तीन लाख रुपये खर्च कर दिए थे। जमानत के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया गया, लेकिन राहत नहीं मिली। इसके बाद परिवार के पास वकील की फीस देने के लिए पैसे नहीं बचे।
वर्ष 2019 में आरोपी के पिता का निधन हो गया। कोरोना महामारी के दौरान सुनवाई रुकने के कारण परिवार को लंबे समय तक कानूनी मदद के बिना रहना पड़ा। वर्ष 2023 में आरोपी को जेल में LADCS के बारे में पता चला और अदालत ने उसे पैनल का वकील उपलब्ध कराया। तब से वही वकील उसके मुकदमे की पैरवी कर रहा है। अब मामले में अंतिम गवाह से पूछताछ की जा रही है।
आरोपी के भाई का कहना है कि तब से परिवार को कानूनी फीस नहीं देनी पड़ी। परिवार को भरोसा है कि आरोपी को गलत तरीके से फंसाया गया है और उसे बरी कर दिया जाएगा। हालांकि, लंबे समय तक लंबित रहे मुकदमे ने पूरे परिवार की जिंदगी प्रभावित की। भाई को 18 साल की उम्र में कॉलेज छोड़कर काम करना पड़ा। उसे इस बात की जानकारी भी नहीं थी कि कानूनी सहायता की यह योजना बंद होने की ओर बढ़ रही है। मौजूदा वकील का अनुबंध वर्ष 2027 तक है। इसके बाद परिवार अदालत से किसी अन्य वकील की व्यवस्था करने की गुहार लगाने की सोच रहा है, क्योंकि वे निजी वकील का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं।
योजना के भविष्य पर टिकी हजारों परिवारों की नजर
LADCS के अनुबंधों का नवीनीकरण नहीं होने का मुद्दा अब केवल वकीलों की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर उन आरोपियों और उनके परिवारों पर पड़ सकता है, जो पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों के बीच मुकदमे का सामना कर रहे हैं। यदि मुकदमे के बीच वकील बदलना पड़ता है, तो नए वकील को मामले की जानकारी हासिल करने और पहले की कार्यवाही समझने में समय लग सकता है। इससे न्याय मिलने की प्रक्रिया और लंबी होने की आशंका भी है।
LADCS से जुड़े वकीलों और कर्मचारियों के एक संगठन के साथ असम, मेघालय और नागालैंड के जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों ने NALSA के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। अब इस विवाद में आगे क्या निर्णय होता है, इस पर नजर रहेगी। सबसे अहम सवाल यह है कि क्या सरकार और विधिक सेवा प्राधिकरण मौजूदा लाभार्थियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाएंगे, ताकि किसी भी आरोपी को केवल आर्थिक कमजोरी या वकील का अनुबंध समाप्त होने के कारण उचित कानूनी प्रतिनिधित्व से वंचित न होना पड़े।
