नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) आज भारतीय समाज और राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले संगठनों में शामिल है। इसकी स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन महाराष्ट्र के नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। शुरुआत कुछ युवाओं के साथ हुई थी, लेकिन समय के साथ संगठन का विस्तार देश के विभिन्न हिस्सों में हुआ। वर्ष 2026 में RSS अपनी स्थापना के 101 वर्ष पूरे कर रहा है। ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि संघ की स्थापना क्यों की गई, इसके पीछे क्या विचार थे और शुरुआती वर्षों में संगठन ने किस तरह काम करना शुरू किया।
कौन थे RSS के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार?
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म नागपुर में हुआ था। वह पेशे से डॉक्टर थे और अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े रहे। उनके राजनीतिक विचारों पर बाल गंगाधर तिलक की विचारधारा का प्रभाव था। इसके अलावा, उनका संबंध बंगाल में सक्रिय क्रांतिकारी राष्ट्रवादी संगठन अनुशीलन समिति से भी बताया जाता है।
बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में भारत में राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता आंदोलन और हिंदू-मुस्लिम संबंधों को लेकर व्यापक बहस चल रही थी। इसी दौर में हेडगेवार ने यह विचार विकसित किया कि हिंदू समाज को आंतरिक मतभेदों से ऊपर उठकर संगठित होने की जरूरत है। उनका मानना था कि समाज में एकता, अनुशासन और सामूहिक शक्ति विकसित किए बिना देश को मजबूत आधार नहीं दिया जा सकता।
हेडगेवार की सोच में यह सवाल प्रमुख था कि यदि अंग्रेज भारत छोड़कर चले भी जाएं, तो देश अपनी स्वतंत्रता और एकता की रक्षा कैसे करेगा? RSS की आधिकारिक वेबसाइट पर उनके विचारों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि वह हिंदुओं को एक संगठित राष्ट्र के रूप में तैयार करने की आवश्यकता पर जोर देते थे।
खिलाफत आंदोलन और कांग्रेस की रणनीति से क्यों बढ़ी असहमति?
RSS की स्थापना के पीछे उस समय का राजनीतिक माहौल भी एक महत्वपूर्ण कारण था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ था। इसका उद्देश्य तुर्की के उस्मानी खलीफा की स्थिति और अधिकारों की रक्षा करना था। महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन को असहयोग आंदोलन से जोड़ने का समर्थन किया, ताकि हिंदू और मुस्लिम समुदायों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक साझा आंदोलन में शामिल किया जा सके।
हालांकि, कांग्रेस के कुछ नेताओं और राष्ट्रवादियों ने इस रणनीति से असहमति जताई। इनमें महाराष्ट्र के कुछ नेता भी शामिल थे। हेडगेवार भी गांधी की राजनीतिक रणनीति और हिंदू-मुस्लिम सहयोग को लेकर कांग्रेस के दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत नहीं थे।
असहयोग आंदोलन के तरीके को लेकर भी कांग्रेस के भीतर मतभेद थे। बाल गंगाधर तिलक के सहयोगी जीएस खापर्डे ने 1920 में आंदोलन की रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इससे सहनशक्ति विकसित हो सकती है, लेकिन राजनीतिक संघर्ष के लिए जरूरी ऊर्जा, संसाधन जुटाने की क्षमता और व्यावहारिक समझ विकसित होना अलग बात है।
इन बहसों ने हेडगेवार की राजनीतिक सोच को प्रभावित किया। धीरे-धीरे वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि समाज को संगठित करने के लिए केवल राजनीतिक आंदोलनों पर निर्भर रहने के बजाय लंबे समय तक चलने वाले सामाजिक प्रयास की जरूरत है।
RSS की स्थापना के पीछे क्या था मुख्य उद्देश्य?
हेडगेवार का मानना था कि भारत में ब्रिटिश शासन लंबे समय तक इसलिए बना रह सका, क्योंकि भारतीय समाज में एकजुट होकर संगठित कार्रवाई करने की क्षमता पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुई थी। उनके विचार में समाज को भीतर से मजबूत बनाना राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की दिशा में आवश्यक कदम था।
इसी सोच के आधार पर RSS की स्थापना की गई। संगठन का शुरुआती उद्देश्य हिंदू समाज में एकता, अनुशासन और सामूहिक पहचान को मजबूत करना था। हेडगेवार चाहते थे कि ऐसे स्वयंसेवक तैयार हों, जो नियमित गतिविधियों के माध्यम से संगठनात्मक क्षमता विकसित करें और समाज में काम करने के लिए प्रशिक्षित हों।
RSS की कार्यशैली में शुरुआत से ही दैनिक गतिविधियों और स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण पर जोर दिया गया। संगठन ने केवल बड़े नेताओं या राजनीतिक हस्तियों पर निर्भर रहने के बजाय युवाओं को तैयार करने की पद्धति अपनाई, ताकि वे आगे चलकर स्वयं संगठन के विस्तार में भूमिका निभा सकें।
क्या थी RSS की शाखा और इसका महत्व?
RSS की सबसे प्रमुख संगठनात्मक व्यवस्था उसकी शाखा बनी। शाखा में स्वयंसेवक नियमित रूप से एकत्र होते थे। यहां शारीरिक व्यायाम, खेल, अनुशासन संबंधी अभ्यास, सामूहिक गतिविधियां और वैचारिक चर्चा की जाती थी।
शाखा का उद्देश्य केवल शारीरिक प्रशिक्षण तक सीमित नहीं था। इसके माध्यम से स्वयंसेवकों में सामूहिकता, संगठन के प्रति जिम्मेदारी और साझा पहचान विकसित करने का प्रयास किया जाता था। इस व्यवस्था ने संगठन को नियमित और दोहराई जा सकने वाली कार्यप्रणाली दी, जिसके जरिए अलग-अलग क्षेत्रों में शाखाएं स्थापित करना और नई पीढ़ियों को जोड़ना संभव हुआ।
हेडगेवार ने शिक्षित मध्यमवर्गीय युवाओं, शिक्षकों, कर्मचारियों और अन्य लोगों को संगठन से जोड़ने पर जोर दिया। विचार यह था कि स्वयंसेवक केवल गतिविधियों में हिस्सा लेने तक सीमित न रहें, बल्कि आगे चलकर संगठन के कार्यकर्ता और आयोजक भी बनें।
नागपुर में कैसे हुई RSS की शुरुआत?
RSS की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, संगठन की औपचारिक शुरुआत 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर के शुक्रवारि इलाके में डॉ. हेडगेवार के घर से हुई थी। इस मौके पर उन्होंने संघ की स्थापना की घोषणा की और स्वयंसेवकों को शारीरिक, बौद्धिक तथा अन्य क्षेत्रों में खुद को प्रशिक्षित करने का संदेश दिया।
शुरुआती दिनों में संगठन की गतिविधियां सीमित स्तर पर संचालित होती थीं। RSS की वेबसाइट के अनुसार, रविवार को स्वयंसेवकों को ड्रिल और मार्च जैसे अभ्यास कराए जाते थे। गुरुवार और रविवार को राष्ट्रीय विषयों पर चर्चा भी होती थी। इन गतिविधियों के जरिए स्वयंसेवकों में अनुशासन और संगठनात्मक समझ विकसित करने का प्रयास किया गया।
शुरुआत में संघ के साथ कुछ ही युवा जुड़े थे, लेकिन नियमित शाखाओं और प्रशिक्षण की व्यवस्था ने संगठन को धीरे-धीरे विस्तार करने का आधार दिया।
1926 में कैसे चुना गया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम?
संघ की स्थापना के समय उसके नाम को लेकर विचार-विमर्श हुआ था। RSS की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, 17 अप्रैल 1926 को डॉ. हेडगेवार के घर पर हुई बैठक में संगठन के नाम पर चर्चा की गई।
इस दौरान चार नाम प्रस्तावित किए गए थे—जरिपटका मंडल, भारत उद्धारक मंडल, हिंदू स्वयंसेवक संघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। विचार-विमर्श के बाद ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम को चुना गया। इसी नाम से संगठन आगे बढ़ा और बाद में RSS के संक्षिप्त नाम से व्यापक रूप से पहचाना जाने लगा।
स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े अभियानों से क्यों अलग रहा RSS?
RSS की शुरुआती रणनीति मुख्य रूप से सामाजिक संगठन और स्वयंसेवकों के दीर्घकालीन प्रशिक्षण पर केंद्रित थी। इसी कारण संगठन ने कांग्रेस के नेतृत्व में चलाए गए सविनय अवज्ञा आंदोलन में एक संगठन के रूप में भाग नहीं लिया। हेडगेवार के उत्तराधिकारी एमएस गोलवलकर के कार्यकाल में भी संघ ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संगठन के रूप में हिस्सा नहीं लिया।
इस रणनीति को लेकर आलोचना भी हुई। स्वतंत्रता आंदोलन में सीधे ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष को देशभक्ति की कसौटी मानने वाले लोगों ने संघ की भूमिका पर सवाल उठाए। दूसरी ओर, RSS की कार्यपद्धति में सामाजिक संगठन, अनुशासन और लंबे समय तक चलने वाले प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी गई।
इस तरह संघ की स्थापना के शुरुआती इतिहास में सामाजिक संगठन और राजनीतिक संघर्ष के तरीकों को लेकर उस समय चल रही बहसों की झलक मिलती है।
100 साल बाद भारतीय समाज और राजनीति में RSS की भूमिका
1925 में नागपुर में कुछ युवाओं के साथ शुरू हुआ RSS आज देशभर में फैले संगठन के रूप में जाना जाता है। उसकी शाखा आधारित व्यवस्था, स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण और सामाजिक गतिविधियां उसके विस्तार के प्रमुख आधार रहे हैं। समय के साथ संघ की विचारधारा और भारतीय राजनीति में उसकी भूमिका पर सार्वजनिक बहस भी होती रही है।
RSS के 101वें वर्ष में उसकी स्थापना के इतिहास को समझना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि संगठन किस राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में बना, उसके संस्थापक की सोच क्या थी और उसने अपने विस्तार के लिए किस तरह की कार्यपद्धति अपनाई।
