नई दिल्ली. केंद्र सरकार डिजिटल मीडिया के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच वास्तविक पत्रकारों और खुद को पत्रकार बताने वाले सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के बीच अंतर करने के लिए कुछ मानदंड तय करने पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव के तहत पत्रकारिता को आय का प्राथमिक स्रोत बनाने, YouTube चैनल या डिजिटल पोर्टल के जरिए नियमित पत्रकारिता करने और सोशल मीडिया पर एक निश्चित स्तर की फॉलोइंग जैसे पहलुओं पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, इस संबंध में चर्चा अभी शुरुआती चरण में है और किसी अंतिम निर्णय की जानकारी सामने नहीं आई है।
एक की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले तीन महीनों में दिल्ली और अन्य जगहों पर हुए Gen Z प्रदर्शनों के दौरान बड़ी संख्या में सोशल मीडिया रील्स और वीडियो सामने आने के बाद सरकार इस मुद्दे पर विचार कर रही है। अधिकारियों की चिंता है कि कई इन्फ्लुएंसर्स खुद को पत्रकार बताते हैं और प्रदर्शन स्थलों पर रिपोर्टिंग करने का दावा करते हैं। ऐसे में पत्रकारों की पहचान और उन्हें मिलने वाली अतिरिक्त सुविधाओं को लेकर स्पष्ट मानदंड तय करने की जरूरत महसूस की जा रही है।
CJP के प्रदर्शनों के बाद बढ़ी सरकार की चिंता
रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में Cockroach Janata Party (CJP) की ओर से NEET-UG पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन शुरू होने के बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में वीडियो सामने आए। इन प्रदर्शनों के दौरान कई इन्फ्लुएंसर्स ने मौके से वीडियो बनाए, नारे दिए और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को रिकॉर्ड किया।
कुछ दिन पहले जंतर-मंतर और अन्य स्थानों पर हुई हिरासत की घटनाओं के दौरान भी ऐसे वीडियो प्रसारित हुए। इस दौरान हिरासत में लिए गए कुछ लोगों ने खुद को पत्रकार बताया और आरोप लगाया कि उन्हें अपना काम करने से रोका जा रहा है। इन घटनाओं के बाद पत्रकारों और इन्फ्लुएंसर्स की पहचान को लेकर सरकारी स्तर पर चर्चा तेज होने की बात कही जा रही है।
पत्रकारिता को आय का मुख्य स्रोत बनाने का प्रस्ताव
रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सरकार डिजिटल पत्रकारों की पहचान के लिए कुछ बुनियादी मानदंड तय करने पर विचार कर रही है। इनमें यह देखा जा सकता है कि संबंधित व्यक्ति के लिए पत्रकारिता आय का प्राथमिक स्रोत है या नहीं, उसका YouTube चैनल या डिजिटल पोर्टल नियमित रूप से पत्रकारिता करता है या नहीं और उसके दर्शकों या फॉलोअर्स की संख्या एक निर्धारित स्तर पर है या नहीं।
एक प्रस्ताव यह भी है कि डिजिटल माध्यम से मिलने वाले एक्रिडिटेशन यानी मान्यता के अनुरोधों की जांच इन मानदंडों के आधार पर की जाए। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इन मानदंडों को किस रूप में लागू किया जाएगा या डिजिटल पत्रकारों के लिए एक्रिडिटेशन की मौजूदा व्यवस्था में क्या बदलाव होंगे।
पहचान पत्र होने भर से पत्रकार नहीं माना जाएगा?
सरकारी सूत्रों के अनुसार, चिंता इस बात को लेकर भी है कि कुछ इन्फ्लुएंसर्स पत्रकार होने के दावे को मजबूत करने के लिए किसी तरह का पहचान पत्र रखते हैं। इससे वास्तविक पत्रकारों को भी काम के दौरान प्रतिबंधों या कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
सूत्रों का कहना है कि कैमरा या मोबाइल फोन लेकर वीडियो बनाने वाला हर व्यक्ति स्वतः पत्रकार नहीं माना जा सकता। पत्रकारों को उनके पेशे के कारण मिलने वाली कुछ अतिरिक्त सुविधाएं सभी लोगों को अपने आप नहीं मिलनी चाहिए। हालांकि, हर नागरिक को कानून के तहत मिलने वाले बुनियादी अधिकार समान रूप से प्राप्त रहेंगे। किसी व्यक्ति को क्या रिकॉर्ड करने या कहां जाने की अनुमति है, यह लागू कानूनों और संबंधित परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
सोशल मीडिया रील्स ने बदला रिपोर्टिंग का तरीका
अधिकारियों की चिंता का एक बड़ा कारण सोशल मीडिया पर रील्स और छोटे वीडियो का तेजी से प्रसार है। रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के प्रदर्शनों के दौरान कई वीडियो वायरल हुए, जिनसे सरकार के खिलाफ व्यापक जनआक्रोश की धारणा बनी। कुछ वीडियो में पुलिस की ओर से प्रदर्शनकारियों पर सख्ती किए जाने के दृश्य भी सामने आए।
इन वीडियो में प्रदर्शन कर रहे युवाओं के नारे और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल भी शामिल था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने CJP के नेतृत्व वाले प्रदर्शनों के समाप्त होने के बाद जारी अपने एक वीडियो में युवाओं की भाषा को लेकर चिंता जताई थी।
सूत्रों के अनुसार, सोशल मीडिया पर प्रसारित इन वीडियो ने सरकार के प्रदर्शन प्रबंधन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नकारात्मक धारणा बनने में भी भूमिका निभाई। उनका कहना है कि रील्स और वीडियो के इस नए दौर ने पारंपरिक टेलीविजन और प्रिंट मीडिया से अलग तरह की चुनौती पैदा की है।
डिजिटल पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की चुनौती
सरकार की ओर से विचाराधीन प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि वास्तविक पत्रकारों की पहचान स्पष्ट करने के साथ नागरिकों के सूचना साझा करने और शांतिपूर्ण विरोध को रिकॉर्ड करने के अधिकारों पर अनावश्यक असर न पड़े। डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार ने समाचार जुटाने और प्रसारित करने के तरीके बदल दिए हैं। कई स्वतंत्र पत्रकार और छोटे डिजिटल पोर्टल भी सोशल मीडिया के जरिए खबरें लोगों तक पहुंचाते हैं।
ऐसे में यदि पत्रकारिता के लिए आय, फॉलोअर्स या किसी अन्य मानदंड को आधार बनाया जाता है, तो उसके दायरे और लागू करने की प्रक्रिया पर स्पष्टता जरूरी होगी। फिलहाल सरकार की ओर से इस प्रस्ताव पर कोई अंतिम नियम घोषित नहीं किया गया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि डिजिटल पत्रकारों की पहचान के लिए किन मानदंडों को अपनाया जाता है और पत्रकारिता के अधिकारों तथा कानून-व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है।
