नई दिल्ली. रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की ओर से संभावित अतिरिक्त टैरिफ के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को प्राथमिकता देने का संकेत दिया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि देश अपनी 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अलग-अलग स्रोतों से कच्चे तेल की खरीद जारी रखेगा। मंत्रालय ने यह भी कहा कि प्रस्तावित अमेरिकी कदमों के भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर संभावित असर को लेकर वॉशिंगटन के साथ चर्चा की गई है।
अमेरिकी संसद में पास हुआ रूस-ईरान प्रतिबंध वाला बिल
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को 262-159 मतों से पारित किया है। इससे पहले अगस्त में सीनेट भी इस विधेयक को मंजूरी दे चुकी थी। अब यह बिल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास हस्ताक्षर के लिए जाएगा।
इस कानून में रूस की ऊर्जा और रक्षा गतिविधियों से जुड़े कई प्रावधान हैं। इसके तहत राष्ट्रपति को उन देशों के सामान पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो तय मानदंडों के तहत रूसी तेल या गैस की खरीद जारी रखते हैं। अधिकतम अतिरिक्त टैरिफ की सीमा 100 प्रतिशत तक रखी गई है। हालांकि, बिल के कानून बन जाने भर से भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ स्वतः लागू नहीं होगा; अंतिम फैसला अमेरिकी प्रशासन के पास रहेगा।
भारत ने कहा- ऊर्जा सुरक्षा रहेगी सबसे अहम
विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ऊर्जा सुरक्षा के लिए विविध स्रोतों से कच्चे तेल की खरीद करता रहेगा और उसकी खरीद संबंधी नीति बाजार की बदलती परिस्थितियों पर आधारित होगी। मंत्रालय के मुताबिक, इस मुद्दे पर पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर बातचीत हुई है और भारत ने प्रस्तावित कदमों के संभावित प्रभावों को भी सामने रखा है।
भारत ने यह भी कहा है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। सरकार का रुख यह है कि ऊर्जा की उपलब्धता, कीमत और आपूर्ति की स्थिरता देश की प्रमुख जरूरतों में शामिल हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है रूसी कच्चा तेल?
रूस पिछले कुछ वर्षों में भारत के कच्चे तेल आयात का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है। Global Trade Research Initiative के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में भारत ने रूस से करीब 40.8 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा, जो कुल 134.7 अरब डॉलर के crude imports का लगभग 30.3 प्रतिशत था। जुलाई 2026 तक मीडिया रिपोर्टों के अनुसार रूसी तेल की हिस्सेदारी भारत के आयातित कच्चे तेल में करीब 51 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।
हालांकि भारत ने इस दौरान दूसरे देशों से भी तेल खरीद बढ़ाई है। ऐसे में नई दिल्ली की नीति एक ही स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग आपूर्तिकर्ताओं से खरीद बनाए रखने की रही है। विदेश मंत्रालय ने भी अपनी हालिया प्रतिक्रिया में diversified sourcing का उल्लेख किया है।
संभावित टैरिफ से भारत को किन क्षेत्रों में असर पड़ सकता है?
प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ व्यवस्था का असर केवल तेल खरीद तक सीमित नहीं रह सकता। अगर रूसी कच्चे तेल की खरीद अतिरिक्त लागत या प्रतिबंधों के कारण कम होती है, तो भारत को दूसरे स्रोतों से अधिक तेल खरीदना पड़ सकता है। इससे खरीद लागत और आयात मिश्रण पर असर पड़ने की संभावना है।
दूसरी ओर, अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने की स्थिति में भारतीय निर्यातकों पर भी दबाव बढ़ सकता है। Reuters के मुताबिक, नई व्यवस्था भारत-अमेरिका के बीच चल रही व्यापारिक बातचीत को भी प्रभावित कर सकती है।
वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ सकता है असर
भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में शामिल है और उसकी घरेलू जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। ऐसे में रूसी कच्चे तेल की उपलब्धता या कीमत में बड़ा बदलाव वैश्विक तेल बाजार पर भी असर डाल सकता है।
Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने लगातार स्थिर और किफायती ऊर्जा आपूर्ति तक पहुंच बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया है। मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में किसी बड़े आपूर्ति व्यवधान का असर कई देशों के तेल आयात और कीमतों पर पड़ सकता है।
भारत-अमेरिका संबंधों पर भी नजर
रूसी तेल खरीद को लेकर अमेरिका की नई कानूनी व्यवस्था ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार और आर्थिक मुद्दों पर बातचीत जारी है। भारत पहले ही वॉशिंगटन को बता चुका है कि रूसी ऊर्जा खरीद को निशाना बनाने वाले कदमों का असर द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
अब गेंद अमेरिकी प्रशासन के पाले में है। बिल पर राष्ट्रपति की मंजूरी और उसके बाद प्रशासन इस अधिकार का इस्तेमाल किस तरह करता है, इससे आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल भारत ने अपनी तरफ से ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों को प्राथमिकता देने की बात दोहराई है।
