नई दिल्ली. RSS प्रमुख मोहन भागवत ने संगठन की विचारधारा को लेकर होने वाली आलोचनाओं पर अपनी बात रखी है। लंदन में RSS के 100 साल पूरे होने के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि यह दावा कि संगठन के काम की बुनियाद ‘तीव्र नफरत’ है, RSS की बताई गई विचारधारा के बिल्कुल उलट है। भागवत ने कहा कि संघ के काम का आधार ‘Shuddha Saatvika Prem’ यानी शुद्ध और सात्विक प्रेम है।
‘अपनापन’ को बताया समाज की ताकत
लंदन में हुए सभ्यतागत संवाद के दौरान मोहन भागवत ने कहा कि RSS की सोच में ‘अपनापन’ यानी belonging और oneness की भावना बेहद महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक यह भावना सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि परिवार, समुदाय, समाज और पूरी मानवता तक जाती है। उन्होंने कहा कि इसी सोच के कारण व्यक्ति खुद को व्यापक सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा मानता है।
प्रकृति से जुड़ाव पर भी दिया जोर
भागवत ने कहा कि हिंदू परंपरा में प्रकृति के साथ संबंध को भी महत्वपूर्ण माना गया है। उन्होंने कहा कि हिंदू केवल प्रकृति की पूजा ही नहीं करते, बल्कि उससे प्रेम भी करते हैं। उनके अनुसार समाज और प्रकृति को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए।
100 साल बाद भी विचारधारा में बदलाव नहीं
RSS प्रमुख ने कहा कि संघ की स्थापना को 100 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन ‘शुद्ध सात्विक प्रेम’ की भावना आज भी संगठन के मूल में बनी हुई है। उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवकों के व्यवहार और संगठन के वातावरण में इस विचार को देखा जा सकता है। भागवत ने इसी संदर्भ में RSS में गाए जाने वाले गीत का उल्लेख करते हुए इसे संगठन के काम का आधार बताया।
हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर क्या बोले भागवत?
मोहन भागवत ने Hindu Rashtra की अपनी अवधारणा को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि हिंदू सभ्यता की सोच विविधता को स्वीकार करने के साथ-साथ उसके पीछे मौजूद एकता को पहचानने पर आधारित है। उनके मुताबिक दुनिया में अलग-अलग रूप और विचार दिखाई देते हैं, लेकिन अस्तित्व मूल रूप से एक है।
अलग-अलग विचार और पूजा पद्धतियों का सम्मान
भागवत ने कहा कि हिंदू शब्द को केवल किसी एक धर्म या पूजा पद्धति तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि भारत की भूमि से नास्तिकता से लेकर बहुदेववाद तक अलग-अलग विचार सामने आए हैं। उनका कहना था कि अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों को अपनी-अपनी राह पर चलने और दूसरे की राह का सम्मान करने की भावना रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को दूसरे को अपने विचार में बदलने या उसकी मान्यताओं को खत्म करने की जरूरत नहीं है। उनके अनुसार अलग-अलग रास्ते अपनाने के बावजूद लोग एक ही लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं।
‘विविधता स्वाभाविक, एकता ही सत्य’
Hindu Rashtra की अवधारणा समझाते हुए भागवत ने कहा कि इसका संदेश यह है कि विविधता प्राकृतिक है, जबकि एकता सत्य है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग संस्कृतियों, विचारों और परंपराओं को स्वीकार करते हुए उनके बीच मौजूद एकता को समझना जरूरी है।
‘जियो और जीने दो’ से आगे की बात
मोहन भागवत ने समाज, विकास और पर्यावरण के बीच संबंध को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अगर समाज हर चीज को दुश्मनी और competition के नजरिए से देखेगा तो टकराव बढ़ेगा। इसके बजाय लोगों को यह सोच रखनी चाहिए कि सभी की जरूरतें पूरी हों और एक व्यक्ति की प्रगति दूसरे के लिए बाधा न बने।
उन्होंने पर्यावरण का उदाहरण देते हुए कहा कि इंसान प्रकृति का हिस्सा है, इसलिए विकास ऐसा होना चाहिए जो प्रकृति की प्रगति में भी मदद करे। विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे के विरोध में नहीं देखा जाना चाहिए।
दुनिया के लिए संतुलन का संदेश
भागवत ने ‘Live and Let Live’ की सोच को आगे बढ़ाते हुए कहा कि सिर्फ खुद जीना और दूसरों को जीने देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि दूसरों को आगे बढ़ने में मदद करने की भावना भी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदू विचार परंपरा दुनिया को इसी तरह का संतुलन देने की दिशा में काम कर सकती है।
न्यूयॉर्क और टोरंटो के बाद लंदन पहुंचे भागवत
टोरंटो में ‘Hindu Vishwa Bandhu’ सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें कनाडा की 175 से अधिक संस्थाओं के 2,000 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसके बाद मोहन भागवत 2 सितंबर को लंदन पहुंचे, जहां RSS के शताब्दी outreach कार्यक्रम के तहत सभ्यतागत संवाद में उन्होंने अपनी विचारधारा और Hindu Rashtra की अवधारणा पर बात रखी।
लंदन का यह कार्यक्रम मोहन भागवत के तीन शहरों के अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम का अंतिम चरण था। इससे पहले उन्होंने न्यूयॉर्क और टोरंटो में कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था। RSS के मुताबिक, न्यूयॉर्क में 29 अगस्त को हुए multi-faith leaders’ meeting में 175 लोगों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद Madison Square Garden में आयोजित ‘Universal Oneness’ कार्यक्रम में 6,000 से अधिक प्रतिनिधि पहुंचे थे।
